नयी दिल्ली, पांच दिसंबर (भाषा) संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) भारत ने बढ़ती डिजिटल हिंसा से महिलाओं की रक्षा के लिए तत्काल, अधिकार-आधारित सुरक्षा उपायों का आह्वान किया है और चेतावनी दी है कि प्रौद्योगिकी के जरिये होने वाली लैंगिक हिंसा (टीएफजीबीवी) अब एक ‘‘मानवाधिकार संकट” बन चुकी है।
‘इंडियाएआई इम्पैक्ट समिट’ 2026 से पहले नयी दिल्ली में आयोजित एक उच्च-स्तरीय बहु-पक्षीय बैठक में, यूएनएफपीए ने सरकार के अधिकारियों, वैश्विक विशेषज्ञों, प्रौद्योगिकी कंपनियों और नागरिक समाज के लोग एकसाथ आये। बैठक का उद्देश्य ऑनलाइन हानियों में तेज वृद्धि की समीक्षा करना और उद्योग व नीति में मजबूत कदम उठाने पर चर्चा करना था।
यूएनएफपीए के एक बयान के अनुसार, मेलबर्न विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ पॉपुलेशन एंड ग्लोबल हेल्थ के साथ संयुक्त रूप से आयोजित इस परामर्श – ‘डिजिटल युग में अधिकारों की सुरक्षा: भारत में प्रौद्योगिकी के जरिये होने वाली लिंग-आधारित हिंसा’ में टीएफजीबीवी पर नवीनतम क्षेत्रीय शोध को प्रदर्शित किया गया और मंच-स्तरीय नवाचारों और सुरक्षा-द्वारा-डिजाइन दृष्टिकोणों पर प्रकाश डाला गया।
गूगल, स्नैपचैट, हर सर्कल, एसओएचयूएम और द क्वांटम हब के प्रतिनिधियों ने साइबरस्टॉकिंग, प्रतिरूपण, गैर-सहमति वाली छवि साझाकरण और डीपफेक-आधारित दुर्व्यवहार को रोकने के लिए रणनीतियों की रूपरेखा तैयार की।
आईटी फॉर चेंज, सेंटर फॉर कम्युनिकेशन गवर्नेंस, ब्रेकथ्रू ट्रस्ट, फेमिनिज्म इन इंडिया और डिजिटल फ्यूचर्स लैब सहित डिजिटल अधिकार संगठनों ने ऑनलाइन हिंसा को सक्षम करने वाले संरचनात्मक कारकों पर जोर दिया और इस क्षेत्र से उभर रहे समाधानों की रूपरेखा प्रस्तुत की।
यूएनएफपीए भारत प्रतिनिधि आंद्रिया एम वोजनार ने कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी के जरिये दुरुपयोग ‘केवल एक डिजिटल मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक मानवाधिकार संकट है,’ जो महिलाओं, युवा उपयोगकर्ताओं और अन्य समुदायों को अधिक नुकसान पहुंचा रहा है।
उन्होंने डीपफेक से लेकर लक्षित उत्पीड़न तक ऑनलाइन खतरों के तेजी से बढ़ने का उल्लेख किया और ऐसी प्रणालियों का आह्वान किया जो समावेशन या नवाचार से समझौता किए बिना उपयोगकर्ताओं की रक्षा करें।
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अमित रंजन
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