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Wednesday, 25 February, 2026
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100% सक्सेस रेट, एक भी असली सरोगेसी नहीं: कैसे दो DNA टेस्ट से उजागर हुआ ‘बच्चा तस्करी गिरोह’

डॉ. पचिपाला नम्रता के फर्टिलिटी क्लीनिक तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में करीब 3 दशकों तक चले. उनके मरीज़ों को किसी और का बच्चा मिल जाता था. पुलिस का कहना है कि उनके एजेंट को हर बच्चे के लिए 50 हजार रुपये मिलते थे.

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हैदराबाद: एक दशक से ज्यादा पहले, अमेरिका में रहने वाला एक एनआरआई कपल, जो ऑटिज्म से पीड़ित एक बच्चे की परवरिश कर रहा था और दोबारा कंसीव करने में दिक्कत झेल रहा था, अमेरिका से अपने घर हैदराबाद लौट आया. उस समय आंध्र प्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था. वहां उन्होंने गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. पचिपाला नम्रता से मदद ली. सेकंदराबाद में उनकी फर्टिलिटी क्लिनिक सफल इलाज के लिए जानी जाती थी.

अक्टूबर 2014 में कपल ने एक बेटे का स्वागत किया. उन्हें विश्वास था कि बच्चा इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ और सरोगेसी के जरिए पैदा हुआ है. बच्चे को बहुत प्यार मिला और जश्न मनाया गया. उसे पूरे परिवार से भव्य अन्नप्राशन समारोह में मिलवाया गया, जिसमें बच्चे को पहली बार ठोस खाना खिलाया जाता है.

पहला शक नौ महीने बाद हुआ. यह अस्पताल में नहीं बल्कि हैदराबाद स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के वेटिंग एरिया में हुआ. कपल अमेरिका लौटने की तैयारी कर रहा था और बच्चे का पासपोर्ट बनवाना था. क्योंकि बच्चा सरोगेसी से पैदा हुआ था, इसलिए अमेरिकी अधिकारियों ने डीएनए टेस्ट अनिवार्य किया.

रिपोर्ट मैच नहीं हुई.

जब उन्होंने नम्रता से सवाल किया, तो आरोप है कि उन्होंने इसे “बहुत आम” मेडिकल गलती बताया. पुलिस चार्जशीट के मुताबिक उन्होंने कहा कि बच्चा वापस कर दें और वह “फ्री ऑफ कॉस्ट” दूसरा बच्चा दे देंगी.

यह बातचीत और इसके बाद कपल के सालों के दर्द भरे अनुभव कोई अलग घटना नहीं थी. जांचकर्ताओं के अनुसार यह दो राज्यों में फैला एक दशक लंबा आपराधिक नेटवर्क था. इसमें दर्जनों एजेंट, सैकड़ों फर्जी दस्तावेज और अज्ञात संख्या में नवजात शामिल थे. गरीब परिवारों से बच्चों को अलग कर सरोगेसी के नाम पर दूसरे कपल्स को बेचा जाता था.

उस समय केस दर्ज हुआ था. लेकिन जुलाई 2025 में, दस साल बाद आई दूसरी डीएनए रिपोर्ट ने पूरे गिरोह का भंडाफोड़ कर दिया. इसके बाद के हफ्तों में हैदराबाद पुलिस ने नम्रता, उनके बेटे और 24 अन्य लोगों को गिरफ्तार किया. राजस्थान के झुंझुनू से एक दंपति ने भी इसी तरह की ठगी की शिकायत की थी.

डॉक्टर चार महीने तक हिरासत में रहीं और पिछले साल नवंबर में जमानत मिल गई. लेकिन इसी महीने प्रवर्तन निदेशालय ने मानव तस्करी से कमाई गई रकम को सफेद करने के आरोप में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया.

तेलंगाना पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम और ईडी अब पैसों के लेनदेन की जांच कर रही हैं. फंड के रास्ते का पता लगाया जा रहा है और उन दंपतियों और जैविक माता-पिता को खोजा जा रहा है जिनके बच्चों की कथित तौर पर तस्करी हुई.

नम्रता के वकील वाई. सोमा श्रीनाथ रेड्डी ने कहा कि उनकी टीम आवेदन दाखिल करने की प्रक्रिया में है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “हम कानून के अनुसार कदम उठा रहे हैं और उचित मंच पर उचित आवेदन दाखिल किए जाएंगे.”

केस दर्ज हुआ, प्रैक्टिस जारी रही

2015 की शिकायत के आधार पर नम्रता पर आईपीसी की धारा 406, 415, 420 और 506 के तहत केस दर्ज हुआ. ये सभी जमानती धाराएं थीं और उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया गया.

2016 में तेलंगाना स्टेट मेडिकल काउंसिल ने उनका लाइसेंस रद्द कर दिया. नम्रता ने इस फैसले को तेलंगाना हाई कोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने दोबारा विचार करने का निर्देश दिया. काउंसिल ने फिर निलंबन बरकरार रखा, जो 2020 तक चला.

30 मई 2018 को, जब कानूनी लड़ाई चल रही थी, कागजों पर उनकी क्लिनिक का नाम बदल गया. सृष्टि टेस्ट ट्यूब बेबी का नाम यूनिवर्सल सृष्टि फर्टिलिटी एंड रिसर्च सेंटर कर दिया गया. तब तक वह दो क्लिनिक चला रही थीं, एक सेकंदराबाद में और एक विशाखापट्टनम में.

2021 में, दूसरी तस्करी के केस में थोड़ी देर की गिरफ्तारी के एक साल बाद, नम्रता ने सेकंदराबाद क्लिनिक में सरोगेसी की अनुमति वापस कर दी. इसके बाद गिरोह का मुख्य ऑपरेशन विशाखापट्टनम शिफ्ट हो गया, पुलिस ने कहा.

हैदराबाद के एक जांच अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “प्रैक्टिस कभी रुकी नहीं. बल्कि और बढ़ गई.”

नम्रता का जन्म और परवरिश विजयवाड़ा में हुई. उन्होंने एमबीबीएस के लिए विशाखापट्टनम का रुख किया और कर्नाटक के दावणगेरे स्थित जे.जे.एम. मेडिकल कॉलेज से गायनेकोलॉजी में एमडी किया.

पुलिस ने कहा कि पूछताछ के दौरान नम्रता ने बताया कि उन्होंने 1998 में विजयवाड़ा में पहला फर्टिलिटी सेंटर खोला था. करीब 2007 में सेकंदराबाद में विस्तार किया और बाद में विशाखापट्टनम शिफ्ट हुईं.

सालों में उन्होंने कोलकाता और भुवनेश्वर में भी कंसल्टेंसी सेंटर खोले. लेकिन मुख्य ऑपरेशन सेंटर विशाखापट्टनम ही रहा.

Dr Pachipala Namratha and her son Jayanth Krishna | Photo: By special arrangement
डॉ. पचिपाला नम्रता और उनके बेटे जयंत कृष्णा | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

100% सक्सेस रेट, डेटाबेस और टारगेट

यह ऑपरेशन पूरी तरह संगठित और योजनाबद्ध था.

इसकी शुरुआत मार्केटिंग से होती थी. सोशल मीडिया और इंटरनेट पर 100 परसेंट सक्सेस रेट का वादा करने वाले विज्ञापन फैलाए गए, जिससे कपल्स—जिनमें से कई सालों से बेऔलाद थे—नम्रता के क्लिनिक में आने लगे. पुलिस को पता चला कि जब कोई कपल आगे बढ़ने के लिए राज़ी हो जाता, तो एक पैरेलल और पूरी तरह से अलग प्रोसेस शुरू किया जाता था.

जांच में शामिल एक पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “उसके सेंटर के स्टाफ और ड्राइवरों को कहा जाता था कि वे समाज के कमजोर और हाशिए पर रहने वाले वर्गों से गर्भवती महिलाओं को ढूंढें, ताकि उन संतानहीन कपल्स की जरूरत पूरी की जा सके जो 100 प्रतिशत सफलता के विज्ञापन और सोशल मीडिया अभियान से प्रभावित होकर क्लिनिक आते थे.”

जांचकर्ताओं का आरोप है कि नम्रता ने असल में कभी भी IVF या सरोगेसी के लिए कपल्स से इकट्ठा किए गए गैमेट्स का इस्तेमाल नहीं किया. इसके बजाय उनके एजेंट, जिनमें आशा कार्यकर्ता, क्लिनिक कर्मचारी और स्वतंत्र ठेकेदार शामिल थे, गर्भवती महिलाओं का डाटाबेस बनाए रखते थे. खासतौर पर विजाग और विजयवाड़ा के ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को निशाना बनाया जाता था. हैदराबाद के सरकारी अस्पतालों और ओपीडी से भी महिलाओं को चिन्हित किया जाता था.

पुलिस ने कहा कि पूरी प्रक्रिया समय के हिसाब से तय की जाती थी.

एक बार जब कोई कपल अपना कमिटमेंट कन्फर्म कर देता और बायोलॉजिकल सैंपल दे देता, तो नम्रता के क्लिनिक उस कपल की कमिटेड डिलीवरी डेट को प्रेग्नेंट महिलाओं के अपने डेटाबेस से मैच करते थे.

एक दूसरे पुलिस ऑफिसर ने बताया, “सैंपल इकट्ठा करने और एम्ब्रियो बनने की प्रोसेस पूरी होने के बारे में कपल से कन्फर्म करने के बाद, नम्रता अपने एजेंट्स को उन होने वाली महिलाओं के बारे में बताती थीं जो उस टाइमफ्रेम में बच्चे को जन्म दे सकती थीं, जब कपल को उनके बायोलॉजिकल बच्चे के जन्म का कमिटमेंट दिया जाता था.”

जब समय बहुत अहम होता था, तो इस महीने हैदराबाद की एक अदालत में ईडी की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार, प्रसव जल्दी कराने के लिए दवाएं दी जाती थीं ताकि वादा की गई तारीख से मेल हो सके.

कुछ मामलों में गरीब महिलाओं को धोखे से अपना बच्चा छोड़ने के लिए मजबूर किया गया.

2020 में जिस केस में नम्रता गिरफ्तार हुई थीं, उसमें विशाखापट्टनम के मोडुगुला गांव की एक महिला ने आरोप लगाया कि तटीय शहर की फर्टिलिटी क्लिनिक ने उसकी नवजात को बेच दिया.

चार्जशीट का हिस्सा बने अपने बयान में महिला ने पुलिस को बताया कि उसके पति की मौत के बाद गांव के एक व्यक्ति से उसका संबंध बना था और उसी से वह गर्भवती हुई. जब परिवार को यह पता चला तो विवाद हुआ.

गर्भावस्था के आठवें महीने में उसने आशा कार्यकर्ता कोडी वेंकट लक्ष्मी और बोट्टा अन्नपूर्णा को अपने पारिवारिक विवाद के बारे में बताया.

जांचकर्ताओं ने कहा कि लक्ष्मी और अन्नपूर्णा दोनों नम्रता की क्लिनिक के लिए पैसे लेकर एजेंट का काम भी करती थीं.

उनकी सलाह पर फरवरी 2020 में महिला को नम्रता के विशाखापट्टनम स्थित सेंटर लाया गया.

आरोप है कि नम्रता ने आशा कार्यकर्ता कोडी को निर्देश दिया कि महिला को 8 मार्च तक अस्पताल में रोके रखें और मुफ्त डिलीवरी देखभाल का बहाना दें. केस में दाखिल चार्जशीट के अनुसार बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसे कोलकाता के एक दंपति को सौंप दिया गया. इसमें जोड़ा गया कि स्थानीय महिला को इस लेनदेन की जानकारी नहीं थी, हालांकि कैसे नहीं थी यह नहीं बताया गया.

मोडुगुला की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने देखा कि महिला बिना बच्चे के गांव लौट आई है. उसने अधिकारियों को सूचना दी, तब पुलिस केस दर्ज हुआ.

इस केस की जांच के दौरान पुलिस ने 2015 वाले एनआरआई केस से समानताएं पाईं.

चार्जशीट में कहा गया, “जांच में खुलासा हुआ कि ए1 यानी नम्रता ग्रामीण इलाकों में मेडिकल कैंप लगाती थीं, जहां वह अपने अस्पताल की सफलता दर का प्रचार करती थीं और मासूम और उम्मीद से भरे दंपतियों को आकर्षित करती थीं. वह एजेंटों को आर्थिक लाभ देकर सक्रिय भी करती थीं.”

पुलिस ने कहा कि कुछ मामलों में बच्चों को सीधे गरीब परिवारों से खरीदा गया.

केस रिकॉर्ड के मुताबिक, बायोलॉजिकल माता-पिता को लड़की के लिए औसतन 3.5 लाख रुपये और लड़के के लिए 4.5 लाख रुपये दिए गए. कहा जाता है कि एजेंटों को हर नए जन्मे बच्चे के लिए लगभग 50,000 रुपये मिले. और जो कपल बच्चों के साथ घर गए, उन्होंने क्लीनिक को 30 लाख रुपये तक दिए.

एक कानून की अनदेखी, कागजों की पूरी तैयारी

भारत में, सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021, किसी दूसरे रिश्तेदार सरोगेट मां से जुड़ी कमर्शियल सरोगेसी पर बैन लगाता है और यह तय करता है कि सिर्फ़ ‘इच्छुक कपल’ का कोई करीबी रिश्तेदार ही सरोगेट बन सकता है, बशर्ते इसमें कोई पैसे का मुआवज़ा शामिल न हो.

शुरुआत में कानून ने डोनर स्पर्म या एग्स के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई थी. लेकिन 2024 में संशोधन के जरिए यह पाबंदी हटा दी गई, खासकर उन कपल्स के लिए जिनकी मेडिकल समस्या हो, और तलाकशुदा या विधवा महिलाओं के लिए.

नम्रता के गिरोह ने इन नियमों में से किसी का पालन नहीं किया.

जांचकर्ताओं ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि असली माता-पिता का कोई रिकॉर्ड न रहे, सीधे बच्चे पाने वाले दंपति के नाम से फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाए जाते थे और कभी कोई डीएनए टेस्ट नहीं किया जाता था.

सरोगेसी कानून के तहत जो पूरी प्रक्रिया जरूरी है, जैसे जिला मेडिकल बोर्ड से बांझपन का मेडिकल सर्टिफिकेट, स्थानीय मजिस्ट्रेट कोर्ट का आदेश, और दंपति व सरोगेट के लिए आवश्यक और पात्रता प्रमाण पत्र, ये सब फर्जी बनाए जाते थे.

एक दूसरे जांच अधिकारी ने कहा, “यह सरोगेसी और कानूनी प्रक्रिया के नाम पर चलाया जा रहा सीधा बच्चा तस्करी का रैकेट था. नतीजा पाने के लिए सरोगेसी की असली प्रक्रिया अपनाने की कोई मंशा नहीं थी. आरोपी उन गर्भवती महिलाओं की तलाश करते थे जिनकी डिलीवरी तारीख उस तारीख से मेल खाती हो जो उन्होंने कपल्स को वादा की थी, और फिर बिना किसी डीएनए टेस्ट के फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाकर नवजात को उनके हवाले कर देते थे.”

पुलिस ने बताया कि यह कानूनी ढांचा परिवार के अंदर ही बनाया गया था. पुलिस ने बताया कि नम्रता के बेटे और वकील पचिपाला एसएस. जयंत कृष्णा अपना ऑफिस सिकंदराबाद क्लिनिक वाली जगह से ही चलाते थे.

हैदराबाद के 49 साल के एक निजी क्षेत्र के कर्मचारी, जिनकी शादी 2017 में हुई थी और जिनकी पत्नी सालों तक गर्भधारण नहीं कर पा रही थी, जब क्लिनिक पहुंचे तो नम्रता ने भरोसा दिलाने के लिए अपने बेटे का नाम लिया. जांच के मुताबिक उन्होंने दंपति से कहा, “पूरी प्रक्रिया कानूनी है. मैं और मेरा बेटा जयंथ कृष्णा आपकी सारी सरोगेसी की कानूनी प्रक्रिया देख लेंगे.”

Graphic: Sonali Dub | ThePrint
ग्राफ़िक: सोनाली डब | दिप्रिंट

जमीन पर काम करने वाले एजेंट

पुलिस ने कहा कि कुछ एजेंट शुरुआत में नम्रता की क्लिनिक में डोनर थे.

पुलिस ने जिन मुख्य आरोपियों का नाम लिया उनमें से एक धनश्री संतोषी है. पिछले साल बनी एसआईटी ने हैदराबाद की एक अदालत को बताया कि संतोषी ने नम्रता की क्लिनिक को गर्भवती महिलाओं की सूची दी थी.

आरोप है कि संतोषी पहले क्लिनिक में अंडाणु डोनर थीं और 2024 में गिरोह से फील्ड एजेंट के रूप में जुड़ गईं. उसी साल महाराष्ट्र पुलिस ने उन्हें एक अलग बच्चा तस्करी केस में गिरफ्तार किया था, पुलिस ने कहा.

एसआईटी का आरोप है कि सीसीटीवी फुटेज में नेटवर्क में उनकी सक्रिय भूमिका दर्ज है.

जनवरी 2024 से नम्रता ने संतोषी को किस्तों में करीब 20 लाख रुपये ट्रांसफर किए. एक तीसरे जांच अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि यह पैसा जल्दी ही संतोषी के अन्य बैंक खातों या उन महिलाओं के खातों में भेज दिया जाता था जिन्होंने अपने नवजात देने पर सहमति दी थी.

एक अन्य आरोपी हर्षा रॉय हैं. हैदराबाद पुलिस ने उन्हें जुलाई 2025 में नम्रता के ऑपरेशन में कथित भूमिका के लिए गिरफ्तार किया था और जल्द ही जमानत मिल गई. कुछ महीनों बाद दिसंबर में उन्हें साइबराबाद पुलिस ने इसी तरह के एक अन्य बच्चा तस्करी केस में फिर गिरफ्तार किया.

जांचकर्ताओं के मुताबिक बलगम सरोज भी नम्रता की एक एजेंट थीं. आरोप है कि उन्होंने तीन गर्भवती महिलाओं को अपने नवजात छोड़ने के लिए राजी किया. इनमें करुणा नाम की एक महिला भी शामिल थी, जिसके नवजात को हैदराबाद के एक दंपति को सौंपा गया, एसआईटी ने पिछले साल अदालत को बताया.

इस कपल ने अगस्त 2025 में नम्रता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई.

हैदराबाद की कडूर रत्नम और कोना मीनाक्षी नाम की मां-बेटी की जोड़ी को भी एजेंट के रूप में पहचाना गया. जांचकर्ताओं ने नम्रता से उनके खातों में पैसे ट्रांसफर होने की बात कही.

एसआईटी ने कहा कि मीनाक्षी भी संतोषी की तरह शुरुआत में अंडाणु डोनर थीं और बाद में ज्यादा सक्रिय भूमिका में आ गईं. तेलंगाना के रंगारेड्डी जिले की शाहिना ने भी यही रास्ता अपनाया. उन्हें पहले सूर्यापेट ग्रामीण जिला पुलिस ने एक बार गिरफ्तार किया था और बाद में नम्रता केस में भी गिरफ्तार किया गया.

संदेह के घेरे में आए सभी एजेंट फिलहाल जमानत पर बाहर हैं.

The fertility clinic in Secunderabad | Photo: Mayank Kumar | ThePrint
सिकंदराबाद में फर्टिलिटी क्लिनिक | फोटो: मयंक कुमार | दिप्रिंट

24 केस, पैमाना अज्ञात

कुल मिलाकर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में नम्रता और उनके साथियों के खिलाफ कम से कम 24 पुलिस केस और एक मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज हैं.

जांचकर्ताओं का अनुमान है कि सिर्फ विशाखापट्टनम अस्पताल में ही कम से कम 286 डिलीवरी दर्ज हुई थीं. उन्हें शक है कि तस्करी की असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.

एक तीसरे पुलिस अधिकारी ने कहा, “नम्रता और उसके गिरोह ने पैसे के लिए कितने नवजातों की तस्करी की, इसका कोई पक्का आंकड़ा नहीं है. लेकिन जो अब तक सामने आया है, वह दुर्भाग्य से सिर्फ हिमखंड का ऊपरी हिस्सा है.”

अधिकारी ने कहा, “ऐसे मामलों में सबसे मुश्किल बात यह है कि पीड़ित सामने नहीं आते. वे शर्म या परिवार के दबाव का हवाला देते हैं. भले ही उन्हें सरोगेसी के नाम पर नम्रता से मिले बच्चे की असली वंशावली पर शक हो. इसलिए एक एफआईआर दर्ज होती है, फिर कुछ और होती हैं, और फिर बीच में लंबा सन्नाटा छा जाता है.”

अलग से, ईडी का केस करोड़ों रुपये की अचल संपत्ति पर आधारित है, जैसे फ्लैट, प्लॉट और कमर्शियल स्पेस, जिन्हें कथित तौर पर नम्रता ने जमा किया. एजेंसी ने अभी तक जब्ती का आदेश जारी नहीं किया है.

ईडी केस में नम्रता न्यायिक हिरासत में हैं और हैदराबाद की चंचलगुडा जेल में बंद हैं. 2025 के तस्करी केस में गिरफ्तार उनका बेटा जमानत पर बाहर है.

यह साफ नहीं है कि 2015 और 2025 में जिन बच्चों का डीएनए टेस्ट हुआ था, उनके साथ क्या हुआ. पुलिस ने कहा कि संभावना है कि कुछ बच्चों को शेल्टर होम भेजा गया हो, जबकि कुछ दंपतियों ने उन बच्चों को अपने पास रखने का फैसला किया हो जो जैविक रूप से उनके नहीं थे.

सिकंदराबाद की वह मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग, जहां कभी फर्टिलिटी क्लिनिक चलता था, अब सुनसान दिखती है—साइनबोर्ड फीका पड़ गया है, और उस पर लिखे अक्षर भी गायब हो गए हैं. जो परिवार इसके दरवाज़ों से गुज़रे, लेन-देन के दोनों तरफ, उन्हें नुकसान हुआ है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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