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Tuesday, 28 May, 2024
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संकट में होने के बावजूद क्यों आबादी बढ़ाने से बच रही टोटो जनजाति – महिलाएं छुपकर करवाती हैं गर्भपात

टोटो साहित्य और भाषा के संरक्षण पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता धनीराम टोटो पद्मश्री से सम्मानित होने वाले अपने समुदाय के पहले व्यक्ति होंगे. 

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केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस 2023 के अवसर पर पद्म सम्मान का एलान किया है. इसके तहत कला, संस्कृति, खेल, सामाजिक कार्य आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम करने वाले 106 व्यक्तियों को इससे सम्मानित किया जाएगा. इनमें पश्चिम बंगाल के धनीराम टोटो को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा.

60 वर्षीय धनीराम टोटो पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिला स्थित टोटोपाड़ा में रहने वाली टोटो जनजाति से हैं. इस जनजाति के करीब 1600 लोग भूटान सीमा के पास देश के केवल आठ वर्ग किलोमीटर के दायरे में सीमित हैं. बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते बरसात के दिनों में इनका संपर्क मुख्य बाजार यानी मदारीहाट से कट जाता है.

घटती आबादी

पिछले कई दशकों के दौरान न केवल इनकी संख्या कम हो रही है, बल्कि इनकी संभ्यता और संस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. इस संकट को भांपते हुए ही धनीराम टोटो साल 2005 से टोटो भाषा (डेंग्का) की लिपि पर काम कर रहे हैं. अब तक इस भाषा की कोई लिपि नहीं थी. टोटो भाषा में केवल मौखिक लोक कथा और गान हैं. साल 2009  में यूनेस्को ने इस भाषा संकटग्रस्त घोषित किया था.

टोटो जनजाति के लिए यह संकट केवल भाषा तक सीमित नहीं है. यह समुदाय अपनी घटती आबादी और इससे पैदा होने वाली अन्य समस्याओं से जूझ रही है. धनीराम टोटो ने हमसे बातचीत में बताया था, ‘कम वोटर (करीब 800) होने की वजह से हमारे समुदाय से कोई प्रतिनिधि संसद और विधानसभा के लिए नहीं चुने जाते. अब स्थिति यह है कि ग्राम पंचायत के चुनाव में भी एक-दो टोटो ही निर्वाचित हो पाते हैं. पिछले साल हुए स्थानीय चुनाव में नेपाली समुदाय की एक महिला ग्राम प्रधान के पद पर चुनी गई थीं.’

यानी कम आबादी की वजह से स्थानीय स्तर पर भी टोटो जनजाति की ताकत कम होती हुई दिख रही है. टोटो जनजाति के लोगों की मानें तो समय के साथ नेपाली और बंगाली समुदाय के लोग भी बड़ी तादाद में टोटोपाड़ा में बस गए हैं. इसके अलावा वक्त के साथ नेपालियों की संख्या टोटो समुदाय की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है.

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टोटो जनजाति का पारंपरिक पेय इयू (देसी शराब) | हेमंत कुमार पाण्डेय/ दिप्रिंट

टोटोपाड़ा स्थित उत्तर बंगाल क्षेत्रीय बैंक के मैनेजर भक्त टोटो ने हमें बताया, ‘पहले नेपाली लोग यहां पर भूटान से संतरा लाता था. उस दौरान ही कई लोग हम लोगों का जमीन में बस गया. अब उन लोगों को हटाया नहीं जा सकता है.’


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परिवार नियोजन

टोटो जनजाति की आबादी, भाषा और संस्कृति पर मंडरा रहे संकट को देखते हुए पश्चिम बंगाल की सरकार इस समुदाय में परिवार नियोजन पर रोक लगाई हुई है. इसके बावजूद टोटो जनजाति अपनी आबादी सीमित रखने पर जोर दे रहे हैं. इसके लिए इस समुदाय की अधिकतर महिलाएं चोरी-छिपे सरकारी और निजी अस्पतालों में अपना नाम बदलकर इसे अंजाम देती हैं.

समुदाय के एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इसके लिए नेपाली नाम से आईडी कार्ड बनाया जाता है. उन्होंने बताया कि जाली आईडी कार्ड बनाने से लेकर ऑपरेशन कराने तक इस काम में 10,000 रुपये तक लग जाते हैं. इसके अलावा वे गर्भनिरोधकों का भी इस्तेमाल करती हैं.

टोटो समुदाय में पहली बार स्नातक करने वाली महिला 34 वर्षीय रीता टोटो ने हमें बताया था कि महिलाएं अपने परिवार के भविष्य को सोचते हुए ही चोरी-छिपे परिवार नियोजन कराने का फैसला ले रही हैं. उनकी मानें तो आज के समय में बच्चों को अच्छी शिक्षा देने और पालन-पोषण करने में काफी अधिक खर्च हो रहा है, इसलिए वे अधिक बच्चे पैदा करना नहीं चाहते हैं.

रीता टोटो ने आगे चिंता जाहिर की कि अगर बच्चों की अच्छी पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई तो उन्हें सरकारी या प्राइवेट नौकरी मिलने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. वे बताती हैं कि राज्य में टोटो को प्राथमिक जनजाति घोषित किए जाने के बाद भी उनके लिए अलग से कोई आरक्षण नहीं मिला है. उन्हें अन्य अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों से मुकाबला करना पड़ता है, जो अंग्रेजी, हिंदी और बांग्ला भाषा में आगे होते हैं. इसकी वजह से टोटो पिछड़ जाते हैं. टोटोपाड़ा में नेपालियों की संख्या अधिक होने से नेपाली भाषा आम बोलचाल की भाषा बन चुकी है.

रीता टोटो | फोटो: हेमंत कुमार पाण्डेय/दिप्रिंट

एक पुलिसकर्मी गौतम टोटो ने बताया कि उनकी जनजाति में वैसे लोगों की संख्या करीब 30 है, जिनके पास सरकारी नौकरी है. इनमें आंगनबाड़ी सहित अन्य स्थायी और अस्थायी कर्मी शामिल हैं.

घटती आबादी पर गौतम ने कहा, ‘जमीन को लेकर तो अब लोगों में हिस्सेदारी बढ़ गया. ज्यादा पॉपुलेशन करने से भी कोई फायदा नहीं है. बच्चों को अच्छा स्कूल में पढ़ाना चाहिए. अधिक बच्चा होगा तो पढ़ाई भी ठीक नहीं मिलेगा. जब छोटा परिवार वाला अच्छा करता है तो उसे देखकर दूसरा भी अपने परिवार को छोटा रखने की कोशिश करता है.’

हालांकि, ऐसा नहीं है कि टोटो समुदाय में अपने अस्तित्व पर मंडराने वाले खतरों को लेकर सचेत नहीं है. इस समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अपनी संस्कृति और परंपरा को कायम रखने के लिए अन्य समुदाय के साथ वैवाहिक संबंध बनाने से बचता है. इसके लिए कोई भी टोटो अपनी माता के कुल के लड़के-लड़की जैसे, मौसेरे या ममेरे भाई-बहन से शादी कर सकता है. हालांकि हाल के समय में कुछ टोटो युवक और युवतियों ने अन्य समुदायों के लोगों से विवाह किया है. इस बारे में विनोद टोटो ने कहा, ‘हमारे समुदाय में भी लड़कों के दूसरे समुदाय की लड़कियों से लव मैरेज करने का मामला सामने आया है. बाहर काम करने वाले ऐसा अधिक करते हैं. लड़कियां कम करती हैं.’

तलाक और दहेज का चलन नहीं

स्थानीय लोगों की मानें तो टोटो समुदाय में न तो दहेज का चलन है और न ही तलाक का. यानी एक बार विवाह होने पर इसे आजीवन निभाना होता है. माना जाता है कि इस परंपरा की वजह से कई विवाहित महिलाओं ने पारिवारिक तनाव की वजह से खुदकुशी भी की है. विनोद टोटो ऐसे दो-तीन मामले सामने आने की बात करते हैं. वैसे पत्नी या पति में से किसी एक की मौत के बाद महिला और पुरुष दोनों को एक साल बाद फिर से विवाह करने की इजाजत भी है.

वहीं, इसके अलावा टोटो समुदाय में शादी से पहले भी लड़के-लड़की के बीच शारीरिक संबंध मान्य है. इसमें महिलाओं के यौन शोषण की आशंका रहती है. हालांकि, विनोद का कहना था कि ऐसा न के बराबर ही होता है. उन्होंने बताया कि कि अगर कोई गलत करता है तो उसे समुदाय के प्रधान खुद सजा देते हैं.

(लेखक फ्रीलांसर हैं)

(संपादन: अलमिना खातून)


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