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Friday, 24 May, 2024
होमफीचरन काली, न केला, न सोला - अपमानजनक नामों के खिलाफ राजस्थान के गांवों में दलित लड़ रहे लड़ाई

न काली, न केला, न सोला – अपमानजनक नामों के खिलाफ राजस्थान के गांवों में दलित लड़ रहे लड़ाई

क्या एक नाम किसी का भाग्य बदल सकता है? राजस्थानी दलितों को लगता है कि यह हो सकता है - उन्होंने खोई हुई गरिमा और सम्मान को फिर से पाने के लिए गरिमा भवन या हाउस ऑफ डिग्निटी की स्थापना की है.

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जब 23 साल के लालू राम और 20 साल की उनकी पत्नी कैलाशी ने एक साल पहले अपने दूसरी बच्ची को जन्म दिया, तो वह अपनी नवजात बेटी का नाम रखने के लिए एक पंडित के पास गए. राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में भील जनजाति का एक ड्राइवर, वह काली और बेरी जैसे नामों के साथ घर लौटा – ये दोनों ही माता-पिता को बेतुके लगे. एक सांवले रंग का अपमान करने के लिए होता है; दूसरे का कोई अर्थ नहीं है—परन्तु नाम को उपहास का पात्र बना देता है

करजली गांव में आस-पड़ोस के सभी लोगों ने काली चमड़ी वाली बच्ची को ‘काली’ कहना शुरू कर दिया – जब तक कि चार दलित कार्यकर्ताओं के एक समूह ने हस्तक्षेप करके उस व्यवस्था का विरोध करना नहीं शुरू कर दिया जिसमें दलितों और आदिवासियों को ‘अपमानजनक’ नाम दिया जाता है. कार्यकर्ताओं ने गरिमा भवन या ‘हाउस ऑफ डिग्निटी’ का निर्माण किया, जिसकी दीवारें बी.आर. अम्बेडकर की तस्वीरों और अन्य वैकल्पिक नामों व उनके अर्थों की एक लंबी सूची से ढकी हुई थीं.

Inside Chittorgarh's Garima Bhawan | Jyoti Yadav/ThePrint
चित्तोडगढ़ के गरिमा भवन के अंदर | ज्योति यादव/दिप्रिंट

और यहीं पर काली बाई रिया कुमारी बन गईं. हालांकि, वह अकेली नहीं हैं. दादाम बाई के बेटे का नाम हिम्मत रखा गया, उगा बाई की बेटी वर्षा कुमारी हुई, उदी बाई अब अपनी बेटी को अनीता कुमारी कहती हैं.

उम्मेदपुरा गांव के मेघवाल समुदाय के मैकेनिक 50 वर्षीय लक्ष्मी लाल कहते हैं, “वे दिन गए जब हम नोसी बाई या रोड़ी देवी या टोलू राम थे. हम गौरव, हर्षित, चिराग, निहाल बनेंगे.” लाल ने समता संगठन के साथ हाथ मिलाया, जिसने करजली और चित्तौड़गढ़ जिले के 11 अन्य गांवों में गरिमा भवन की स्थापना की. इन सबका एक ही लक्ष्य है- इलाके के दलितों और आदिवासियों को ‘गरिमापूर्ण’ नाम देना.


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जहां नाम ही पहचान है

समता संगठन ने 2021 में पहल शुरू की. तब से, 40 बच्चों को, जिनमें से 26 लड़कियां हैं, ‘गरिमापूर्ण’ नाम दिए गए हैं. इनमें से 30 अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से और 10 अनुसूचित जनजाति (एसटी) से थे.

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राजस्थान में, जहां आदमी की मूंछों से उसकी कीमत आंकी जाती है और युवक शादी की बारात में बाइक और घोड़े चढ़ते हैं, वहां नाम ही पहचान है.

‘उच्च जाति’ के लोग समता संगठन के प्रयासों का विरोध कर रहे हैं, और ब्राह्मण पुजारी इन बातों का बचाव करने की मुद्रा में हैं.

करजली गांव में रहने वाले एससी और एसटी समुदायों के पंडित राम लाल गर्ग कहते हैं, “हम नक्षत्र के आधार पर नाम देते हैं. मुझे नहीं लगता कि नामकरण जातिगत भेदभाव पर आधारित है.” वह 20 से अधिक वर्षों से बच्चों का नामकरण कर रहे हैं – और उनके नामकरण करने की पद्धति जो कुछ भी हो, पर यह राम लाल गर्ग ने जो कहा उसके विपरीत है. उन्होंने आगे कहा, “अगर किसी का नाम उदय है, तो वह उदय सिंह होगा अगर वह राजपूत है. और उदय लाल अगर वह निचली जाति से है. यह इस बारे में अधिक है कि समाज कैसे कार्य करता है,” .

लेकिन इस भेदभावपूर्ण प्रथा का खामियाजा खास तौर पर अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय की लड़कियों को भुगतना पड़ता है.

गरिमा भवन के सह-संस्थापक हरलाल बैरवा कहते हैं, “एक काले रंग वाली लड़की का नाम हमेशा काली रखा जाता है, और अवांछित लड़की को धापू और ढपली (जिसका अर्थ है ‘पर्याप्त’) जैसे कई भेदभावपूर्ण नामों से पुकारा जाएगा.”

लेकिन इस तरह का भेदभावपूर्ण नामकरण केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है. पड़ोसी हरियाणा में, एक अवांछित लड़की का नाम अक्सर भतेरी या भोता (अर्थ ‘पर्याप्त’), सार्तो (‘पर्याप्त से अधिक’) रखा जाता है. महाराष्ट्र में, लड़कियों को फसीबाई (‘धोखेबाज’) और नकोशी (‘अवांछित’) नाम दिया गया था. लेकिन पिछले एक दशक में, महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में 1,000 ग्राम पंचायतों में बड़े पैमाने पर अभियान चलाए हैं.

बैरवा कहते हैं, “भेदभाव जन्म से ही शुरू हो जाता है. इसलिए हमने नामकरण की प्रणाली को बदलने का फैसला किया, एक समय में एक नाम.”

Lalu Ram with his daughter Riya | Jyoti Yadav/ThePrint
अपनी बेटी रिया के साथ लालू राम | ज्योति यादव/दिप्रिंट

“रिया, रिया!” लालू राम अपनी बेटी को पुकारते हैं, और बच्चा खुशी से जवाब देता है.

लालू राम कहते, “मुझे यह नाम बहुत पसंद है. यह बहुत प्यारी है, मेरी मां, दादी और परदादी के नामों से बहुत अलग है.”


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नाम में क्या है?

भेदभावपूर्ण नामकरण प्रणाली राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में भी प्रचलित है. एक दलित या एक आदिवासी समुदाय के व्यक्ति को ओबीसी जाति के खेती-किसानी से संबंधित व्यक्तियों को “काकाजी” कहकर बुलाना होता है. राजपूत को ‘दाता’ कहा जाता है. यहां तक कि राजपूत बच्चों को सम्मान न भी हो तो संकोच से “कुंवर सा” कहकर संबोधित करना होता है. गांवों में, दलितों और आदिवासियों को उच्च जातियों के लोगों का पहला नाम लेने की अनुमति नहीं है. और उन्हें लगातार उनकी स्थिति की याद दिलाई जाती है.

उदाहरण के लिए, एससी समुदाय के एक सदस्य भंवर नाम के एक बुजुर्ग को भंवरिया कहकर उपहास किया जाता है. इसका कोई विशेष अर्थ नहीं है लेकिन इसका उपयोग कभी भी उपहास करने के लिए किया जाता है.

हरलाल कहते हैं, “यह हमें कमतर महसूस कराने के लिए सोची-समझी प्रक्रिया के तहत किया जाता है. हम ऐसे अजीब नामों से आसानी से पहचाने जाते हैं. हम राजस्थान और देश के किसी भी हिस्से में चले जाएं, हम जाति की पहचान से छुटकारा नहीं पा सकते क्योंकि यह हमारे नाम में गहराई तक समाया हुआ है.”

वह 41 वर्षीय जवाहरलाल मेघवाल के साथ मिलकर काम करते हैं, जिनका नाम छोटा करके ‘जवारिया’ कर दिया गया था. लेकिन जिस चीज ने उनके गुस्से को भड़काया वह उनके नाम को अजीब ढंग बुलाया जाना नहीं था बल्कि एक पड़ोसी गांव था जिसे ‘मेहतरो का खेड़ा’ कहा जाता था जो कि मेघवाल समुदाय के लिए एक अपमानजनक शब्द है.

जवाहरलाल कहते हैं, ”जब भी मैं शादी के निमंत्रण पत्र पर पड़ोसी गांव को ‘मेहतरो का खेड़ा’ कहे जाते हुए देखता हूं, तो मेरा खून खौल उठता है.” उन्होंने स्थानीय पंचायतों और ग्रामीणों को एकजुट किया और आखिरकार 14 अप्रैल 2022 को गांव का नाम भीम नगर कर दिया गया.

हरलाल ने भी चित्तौड़गढ़ के रायपुरिया गांव में उम्र बढ़ने के साथ ही अपने नाम का बोझ महसूस किया. जब वे चार वर्ष के थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई, और जब वे स्कूल में थे तब उनकी मां की मृत्यु हो गई. वंचित बच्चों को पढ़ाने वाले एक एनजीओ प्रयास से जुड़ने के बाद, हरलाल ने शिक्षा क्षेत्र में काम करना शुरू किया. इसके बाद उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा किया.

एक घटना ने नामकरण प्रणाली के बारे में उनकी धारणा बदल दी. हरलाल कहते हैं, “2004 में, मेरी बहन पंचायत समिति चुनाव के लिए चुनाव लड़ रही थी और हमें जाति प्रमाणपत्र के लिए कुछ दस्तावेजों की आवश्यकता थी. मैं राजस्व रिकार्ड देखने गया था. और वहां उनका नाम देखते ही मुझे सदमा सा लग गया. मैंने देखा कि मेरे पिता का नाम और भी अधिक नीचा करके दिखाया गया था. उसका नाम सोला राम से बदलकर सांवलिया कर दिया गया, मेरे चाचा केला राम कालिया थे, और दूसरे चाचा डोला राम का नाम डोलिया था.”

उनके माता-पिता ने उनका नाम लाला रखा था. वह आगे कहते हैं, “लेकिन स्कूल में, एक शिक्षक ने मेरा नाम बदलकर हरलाल रख दिया. यह अभी भी एक अच्छा नाम है. लेकिन मेरे गांव के कुछ लोगों ने मुझे ललिया कहना बंद नहीं किया.”

हरलाल और जवाहरलाल बताते हैं कि गरिमा भवन की पहल का बहुत महत्व है, यह देखते हुए कि दलितों पर अत्याचार के मामले में राजस्थान देश के शीर्ष राज्यों में से एक है.

2021 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि प्रत्येक 1 लाख दलितों पर राजस्थान और मध्य प्रदेश में 60 से अधिक अपराध दर्ज किए गए हैं. यह राष्ट्रीय औसत 25 के से दोगुना है और पिछले पांच वर्षों से यह संख्या बढ़ रही है.

पाली जिले में एससी समुदाय के सदस्य 28 वर्षीय जितेंद्र मेघवाल की कथित तौर पर मूंछें बढ़ाने के आरोप में हत्या और जालौर में कथित रूप से सवर्णों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले बर्तन से पानी पीने की वजह से नौ वर्षीय इंद्रा मेघवाल की हत्या ने 2022 में आंदोलन को गति दी.

जवाहर कहते हैं, “हम दिमाग से वह दृश्य नहीं निकालता है. ये दो घटनाएं हमारे विद्रोह के बारे में बहुत कुछ कहती हैं.” उन्होंने जातिगत उत्पीड़न और अंधविश्वास के खिलाफ अनुसूचित जाति और आदिवासियों को काफी लामबंद किया है.”

नाम को पसंद का हथियार बनाना

हालांकि गरिमा भवन आंदोलन ने केवल दो साल पहले जड़ें जमाईं, लेकिन हरलाल और अन्य कार्यकर्ताओं के मन में एक दशक से अधिक समय से बदलाव के बीज पड़ चुके थे. 2001 में, प्रयास ने चित्तौड़गढ़ की कपासन तहसील में एक शैक्षिक अभियान शुरू किया.

हरलाल कहते हैं, “वंचित समूहों के युवा शिक्षित पुरुषों को बच्चों को पढ़ाने के लिए बुलाया गया था. इस तरह जवाहरलाल, प्रेम, प्रभुलाल, महेश कुमार कंजर और मैं एक साथ आए.” वह उस समय उनकी उम्र करीब 20 साल थी. ये कार्यकर्ता किसान, मैकेनिक और शिक्षक के रूप में अपनी आजीविका कमाते हैं.

लेकिन नाम उनकी पसंद का हथियार बन गया.

2017 में, समता संगठन की स्थापना के बाद, उन्होंने चित्तौड़गढ़ के करजली, मेवाड़ा कॉलोनी, सूरजपुरा, भीम नगर, अमरपुरा, उम्मेदपुरा जैसे गांवों में केंद्र खोले. समुदाय के सदस्य हर महीने इन केंद्रों पर इकट्ठा होते हैं और लोगों को उनके संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाता है.

सदस्य राजस्थान के तीन जिलों – भरतपुर, करौली और ढोलपुर को देखते हैं. “इन जिलों में, दलित अपने उपनाम के रूप में सिंह का उपयोग करते हैं. सामाजिक न्याय और विकास समिति चलाने वाले भरतपुर के एक कार्यकर्ता, 61 वर्षीय गोपाल वर्मा का दावा है कि राजस्थान के बाकी हिस्सों में इसकी अनुमति नहीं है.”जब व्यक्तिगत राजनीतिक हो गया

क्या एक नाम किसी का भाग्य बदल सकता है? उम्मेदपुरा गांव के लक्ष्मी लाल को यकीन है कि ऐसा होता है. उन्होंने परंपरा के अनुसार अपनी बेटी का नाम कंकू रखा. वे कहते हैं, ”जब तक वह आठवीं कक्षा में थी, तब तक हम उसे कंकू बुलाते रहे.” एक दिन, उन्होंने अपनी बेटी के नाम को बदलने का फैसला लिया. वे स्कूल गए और शिक्षकों से अपनी बेटी का नाम बदलकर कल्पना रखने को कहा.

लाल याद करते हैं,”मैं एक अखबार पढ़ रहा था और सोचा था कि मेरी बेटी कल्पना हो सकती है – तो उसका नाम कंकू क्यों रखा जाए? जो कि पहले से ही एक उपहास जैसा था और जिसमें न कोई गरिमा थी और न ही जिसका कोई अर्थ था.

आंखों में गर्व के आंसू लिए लाल कहते हैं, ‘कल्पना वकील बनना चाहती हैं. वह अब उदयपुर के एक लॉ कॉलेज में एलएलबी द्वितीय वर्ष की छात्रा है.”

(संपादनः शिव पाण्डेय)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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