(फोटो के साथ)
(कुणाल दत्त)
नयी दिल्ली, 20 जनवरी (भाषा) अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने मंगलवार को कहा कि मौजूदा समय में ‘अंतरिक्ष दौड़’ चल रही है, लेकिन प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि इंसान चंद्रमा पर वापस लौटे और यह ‘सार्थक, लोकतांत्रिक तरीके’ से हो।
यहां ‘अमेरिकन सेंटर’ में आयोजित लगभग एक घंटे के संवाद सत्र में शामिल होने से पहले, विलियम्स ने अपने संक्षिप्त प्रारंभिक संबोधन में यह भी कहा कि भारत वापस आना घर वापसी जैसा महसूस हुआ, क्योंकि यह वह देश है जहां उनके पिता का जन्म हुआ था।
गहरे नीले रंग के अंतरिक्ष परिधान और इसी थीम वाले कैनवास के जूतों में विलियम्स (60) भारतीय युवाओं से भरे सभागार में जोरदार तालियों के बीच दाखिल हुईं और बाद में सहजता से दर्शकों के साथ बातचीत की।
अमेरिकी नौसेना की पूर्व कैप्टन विलियम्स का जन्म 19 सितंबर, 1965 को अमेरिका के ओहियो के यूक्लिड में हुआ था। उनके पिता दीपक पंड्या गुजराती थे और मेहसाणा जिले के झुलासन के रहने वाले थे, जबकि उनकी मां उर्सुलिन बोनी पंड्या स्लोवेनिया की थीं।
बातचीत के दौरान, उन्होंने उस समय के अपने अनुभवों को भी साझा किया जब वह अंतरिक्ष में फंस गई थीं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए आठ दिवसीय मिशन विलियम्स के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन गया था क्योंकि उनकी बोइंग अंतरिक्ष उड़ान में समस्याएं उत्पन्न हो गई थीं, जिसके कारण कक्षा में उनका प्रवास नौ महीने से अधिक तक बढ़ गया था।
उस अवधि के कुछ दृश्य स्क्रीन पर दिखाए गए, जिसमें आईएसएस के बहुसांस्कृतिक दल को थैंक्सगिविंग, क्रिसमस और एक दल के सदस्य का जन्मदिन मनाते हुए दिखाया गया।
विलियम्स ने कहा, ‘हम बहुत अच्छे गायक तो नहीं हैं, लेकिन हम अंतरिक्ष केक बना सकते हैं।’’ उनकी यह बात सुनकर दर्शक हंस पड़े।
उन्होंने कहा, ‘आप एक समय में लगभग 12 लोगों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर देख सकते थे।’
विलियम्स ने कहा, ‘आईएसएस पर रूस, जापान, यूरोप, कनाडा…और कई अन्य देशों के साथी थे। (ग्रुप) कैप्टन (शुभांशु) शुक्ला मेरे कुछ समय बाद आए थे। मुझे बहुत अफसोस है कि मैं वहां रहते हुए उनसे नहीं मिल पाई; हम कुछ कहानियां साझा कर सकते थे।’
इस बातचीत के दौरान, उनसे मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के तरीकों से लेकर अंतरिक्ष मलबे के प्रबंधन और अंतरिक्ष क्षेत्र के व्यावसायीकरण से लेकर अंतरिक्ष मिशन में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के सहयोग तक, कई तरह के सवाल पूछे गए।
जब उनसे पूछा गया कि क्या अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र की बढ़ती दिलचस्पी वास्तव में अंतरिक्ष दौड़ को जन्म दे सकती है, जिससे यह विज्ञान कथा से निकलकर वास्तविकता में बदल जाए, तो उन्होंने कहा, ‘अंतरिक्ष दौड़ चल रही है।’
उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि अंतरिक्ष दौड़ चल रही है। लोग इस बारे में बात कर रहे हैं। हम…आप जानते हैं, हम चंद्रमा पर वापस जाना चाहते हैं।’’
विलियम्स ने कहा, ‘हम चंद्रमा पर वापस जाना चाहते हैं, ताकि नियमों और कार्यशैली पर बातचीत शुरू कर सकें, और यह तय कर सकें कि हम चंद्रमा पर कैसे काम करेंगे, और अन्य देशों के साथ मिलकर कैसे काम करेंगे।’
उन्होंने कहा, ‘यह सुनिश्चित करने की होड़ लगी है कि हम इसे सार्थक और लोकतांत्रिक तरीके से करें। ठीक अंटार्कटिका की तरह। मेरा मतलब है, यह बिल्कुल वैसा ही मामला है। हम चंद्रमा पर वापस जाना चाहते हैं ताकि हम सभी एक ही समय में वहां मौजूद होकर मिलकर काम कर सकें।’
अमेरिकी नील आर्मस्ट्रांग 1969 में अपोलो 11 मिशन के तहत चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति थे। नासा का चंद्रमा पर अंतिम मानवयुक्त मिशन 1972 में था।
भाषा आशीष माधव
माधव
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