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Wednesday, 11 March, 2026
होमदेशकोमा में पड़े व्यक्ति के पिता ने कहा:कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे।

कोमा में पड़े व्यक्ति के पिता ने कहा:कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे।

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लखनऊ, 11 मार्च (भाषा) गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘इच्छा मृत्यु’ की इजाजत दिए जाने के बाद उनके पिता ने कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे।

उच्चतम न्यायालय ने 12 साल से ज्यादा समय से कोमा में जीवन-रक्षक प्रणाली (वेंटिलेटर) के सहारे सांस ले रहे हरीश राणा को वेंटिलेटर से हटाकर ‘इच्छा मृत्यु’ की अनुमति दे दी है।

हरीश राणा 20 अगस्त 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गये थे जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को हरीश राणा के लिये इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को निर्देश दिया कि वह प्रक्रिया में गरिमा सुनिश्चित करते हुए उपचार वापस लेने के लिए एक योजना तैयार करे।

गाजियाबाद में अपने आवास के बाहर पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत में हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने फैसले के भावनात्मक दर्द को स्वीकार करते हुए अदालत का आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि उनका परिवार लगभग तीन साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने उनकी याचिका सुनने और मानवीय आदेश देने के लिए उच्चतम न्यायालय को धन्यवाद दिया।

उन्होंने कहा कि इस फैसले से परिवार को कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होगा लेकिन इसे भारी मन से स्वीकार किया गया है।

उन्होंने मीडियाकर्मियों से कहा, ‘एक पिता के रूप में, यह बेहद दर्दनाक है। कोई भी माता-पिता अपने बेटे को ऐसी हालत में नहीं देखना चाहेंगे।’

अशोक राणा ने कहा कि परिवार को उम्मीद है कि इस फैसले से ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करने वाले अन्य लोगों को मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा, ”हमारा मानना है कि व्यापक जनहित में, इस फैसले से कई लोगों के परिवारों को मदद मिल सकती है, जो हरीश जैसी स्थिति में हो सकते हैं।”

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ” वैसे हमने अभी तक इस पर फैसला नहीं किया है, क्योंकि हम परिवार के सदस्यों के आने का इंतजार कर रहे हैं। साथ ही, यह (स्थानांतरण प्रक्रिया) आधिकारिक सहमति आने पर निर्भर करती है।”

उन्होंने कहा, ‘जब शिफ्टिंग होगी तो हम आपको सूचित करेंगे।’

बाद में एक बयान में, परिवार ने कहा कि उन्होंने यह महसूस करने के बाद उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया कि उनके बेटे की स्थिति लाइलाज और अपरिवर्तनीय है और उन्होंने केवल जीवन-निर्वाह उपचार को वापस लेने के दिशानिर्देशों को लागू करने की मांग की।

उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि यह निर्णय ‘सक्रिय इच्छामृत्यु’ के बराबर नहीं है बल्कि इसमें फीडिंग ट्यूब को वापस लेना और प्रशामक देखभाल प्रदान करना शामिल है ताकि मौत की प्राकृतिक प्रक्रिया गरिमा के साथ हो सके।

परिवार ने फैसले को बेहद कठिन बताया, लेकिन कहा कि यह हरीश के सर्वोत्तम हित में लिया गया है और उम्मीद जताई कि इस फैसले से समान परिस्थितियों का सामना करने वाले अन्य परिवारों को मदद मिलेगी।

उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद गाजियाबाद की ‘ब्रह्म राज एम्पायर सोसायटी’ के बाहर भीड़ जमा हो गई जिनमें मुख्य रूप से पत्रकार और टीवी कैमरामैन शामिल थे। इसी सोसायटी में हरीश का परिवार रहता है।

इस आवासीय परिसर में सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षा कड़ी कर दी और बाहरी लोगों को परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया।

जिला मजिस्ट्रेट रवींद्र कुमार मदंद और नगर निगम आयुक्त विक्रमादित्य मलिक दोपहर 3.15 बजे उनके आवास पर गए और कम से कम 15 मिनट तक वहां रहे। उन्होंने मीडिया से कोई बात नहीं की।

स्थानीय निवासियों ने इस बात की पुष्टि की कि परिवार ने अपने बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया था।

कुछ स्थानीय लोगों ने संवाददाताओं को बताया कि अशोक राणा और उनकी पत्नी निर्मला राणा ने अपने बेटे के इलाज का खर्च उठाने के लिए दिल्ली में अपना घर बेच दिया था।

उन्होंने बताया कि पूर्व में एक आतिथ्य संस्था में काम करने वाले अशोक राणा को हर महीने लगभग 3,600 रुपये पेंशन मिलती है।

सासायटी के एक अन्य निवासी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि अशोक राणा अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए सुबह के समय पास के क्रिकेट मैदानों में सैंडविच बेचते हैं।

उच्चतम न्यायालय में अपने लिखित बयान में परिवार ने कहा था कि हरीश राणा 12 साल से ज्यादा समय से कोमा में हैं और सिर्फ़ एक नली के जरिये दिए जाने वाले आहार पर जिंदा हैं।उनके मस्तिष्क पर लगी गंभीर चोट ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।

परिवार ने याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का जिक्र करते हुए कहा कि कानून उन मामलों में इलाज रोकने की इजाज़त देता है जिनमें मरीज ऐसी हालत में हो जिसे ठीक नहीं किया जा सकता हो और उपचार से सिर्फ उसकी तकलीफ ही बढ़ती हो।

उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बने दो मेडिकल बोर्ड ने पाया कि राणा की हालत ऐसी है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता।

परिवार ने शीर्ष अदालत को बताया कि उन्होंने इच्छा मृत्यु की अर्जी इस भरोसे के साथ डाली है कि ऐसी हालत में जीना हरीश राणा के भले के लिए नहीं है।

भाषा मनीष सलीम जफर राजकुमार

राजकुमार

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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