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Thursday, 30 April, 2026
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न्यायालय ने उप्र सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई, कहा- कर्मचारी को एक लाख रुपये का हर्जाना दिया जाए

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नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक कर्मचारी को उसके गृह राज्य में पसंदीदा पदस्थापन के लिए 2011 से लगातार भटकाए जाने पर बुधवार को नाराजगी व्यक्त की और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह उसे एक लाख रुपये का हर्जाना प्रदान करे।

अदालत ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह कर्मचारी को तत्काल उत्तराखंड राज्य में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को सुगम बनाएं।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कर्मचारी द्वारा दायर उस अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अप्रैल 2018 के फैसले को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने कर्मचारी की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड में उसके कैडर में परिवर्तन करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था, क्योंकि उसने 1995 में संयुक्त निम्न अधीनस्थ सेवा परीक्षा में भाग लेते समय ‘पर्वतीय क्षेत्र’ में तैनाती का विकल्प चुना था।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘मामले को समाप्त करने से पहले, हम यह उल्लेख करना चाहेंगे कि इस मामले से निपटने में हमें गहरी पीड़ा हुई। अपीलकर्ता 1997 में नियुक्ति के लिए पात्र हो गया था, लेकिन वास्तव में उसे 2011 में नियुक्त किया गया, और आज 2026 में भी अपने अधिकारों के लिए उसका संघर्ष जारी है।’’

इसने कहा कि एक बार जब उच्च न्यायालय ने 2004 में उसकी नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, तो उसे कम से कम नियुक्त किया जाना चाहिए था।

पीठ ने उल्लेख किया कि अपील 2009 में खारिज कर दी गई थी, फिर भी औपचारिक नियुक्ति 2011 में ही हो पाई।

इसने कहा, ‘‘2011 से उसे अपने गृह राज्य में तैनाती की आवश्यकताओं/वरीयता को पूरा करने के लिए दर-दर भटकाया जा रहा है। यह किसी भी तरह से, किसी भी रूप में, राज्य की ओर से उदासीनता के अलावा कुछ और नहीं है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘उस व्यक्ति की नियुक्ति जून 1997 से प्रभावी हुई थी और आज हम अप्रैल 2026 में हैं। अब जाकर उसे वह चीज मिलेगी जिसे उसने शुरू से ही चुना था।’’

इसने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता के बेटे को संज्ञानात्मक रूप से दिव्यांग घोषित किया गया था और उसकी स्थिति में सुधार की बहुत कम या नगण्य संभावना थी।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘अपने बेटे के पालन-पोषण में परिवार के करीब रहने से उसे बहुत सहारा मिल सकता था, लेकिन वह कम से कम 2011 से परिवार से दूर ही रहा है।’’

इसने अपीलकर्ता को एक लाख रुपये का हर्जाना प्रदान किए जाने का आदेश दिया, जिसका भुगतान उत्तर प्रदेश सरकार को चार सप्ताह के भीतर करना होगा।

पीठ ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से लंबे समय से लंबित ऐसे मामलों की संख्या का पता लगाने और उन्हें विभिन्न पीठों में वितरित करके शीघ्रता से निपटाने का प्रयास करने का अनुरोध किया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उन पर जल्दी सुनवाई हो और उनका फैसला हो जाए।

न्यायालय ने गौर किया कि उसे अंततः 11 जून, 1997 से स्कूल उपनिरीक्षक के पद पर नाममात्र के लिए नियुक्त किया गया था और उसने 26 जुलाई, 2011 को उत्तर प्रदेश के कांशीराम नगर में कार्यभार ग्रहण किया था।

उसने 2012 में अधिकारियों को अभ्यावेदन प्रस्तुत कर अनुरोध किया कि उसे मूल अनुरोध के अनुसार ‘पर्वतीय कैडर’ प्रदान किया जाए।

पीठ ने गौर किया कि उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि एक बार जब उसे उत्तर प्रदेश सेवा आवंटित कर दी गई, तो उत्तराखंड में स्थानांतरण का कोई सवाल ही नहीं उठता।

न्यायालय ने तबादले और कैडर में बदलाव के बीच अंतर का उल्लेख किया।

इसने कहा कि जिस परीक्षा में वह उपस्थित हुआ था, वह राज्यों के पुनर्गठन से पहले की तारीख में हुई थी और अपनी वरीयता देते समय उसने ‘पर्वतीय कैडर’ की मांग की थी।

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को उत्तराखंड में कर्मचारी के स्थानांतरण की सुविधा प्रदान करने का निर्देश देते हुए पीठ ने कहा कि उसकी वरिष्ठता और सभी संबंधित लाभों की रक्षा की जाएगी।

भाषा

नेत्रपाल अविनाश

अविनाश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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