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Sunday, 5 April, 2026
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सोशल मीडिया यूक्रेन में फंसे विद्यार्थियों के बहुत काम आया

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(विशु अधाना)

नयी दिल्ली, नौ मार्च (भाषा) युद्ध प्रभावित यूक्रेन के सूमी में फंसे विद्यार्थियों ने एक वीडियो में भारतीय झंडे लेकर यह धमकी दी कि वे पैदल ही रूस की सीमा के लिए कूच करेंगे। उनके इसी वीडियो से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हल्ला मच गया और फिर भारतीय अधिकारी उन्हें वहां से अति शीघ्र निकालने में जुट गये।

बुधवार तक यूक्रेन के इस उत्तरपूर्वी शहर से सभी फंसे हुए भारतीय विद्यार्थियों को निकाल लिया गया। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि सोशल मीडिया ने रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में फंस गये लोगों की मदद की।

जब से रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण शुरू किया है, सोशल मीडिया मंचों पर इस पूर्वी यूरोपीय देश में फंसे लोगों, सैनिकों एवं नेताओं के वीडियो की बाढ़ आ गयी है।

मेडिकल छात्रा जिसना जिजी ने कहा, ‘‘ हम अधिकारियों को यथाशीघ्र निकालने का अनुरोध कर रहे थे क्योंकि हमारे संसाधन खत्म होने लगे थे और गोलाबारी लगातार हो रही थी लेकिन अनुरोधों का बहरे कानों पर कोई असर नहीं हुआ। कोई जवाब नहीं मिलने से परेशान होकर हमने सोशल मीडिया पर वीडियो डालने का फैसला किया। वह फैल गया और घंटों के अंदर हमें सरकार से जवाब मिला, हमें निकाला जा रहा है।’’

जिसना उन 700 मेडिकल विद्यार्थियों का हिस्सा है जिन्होंने पैदल ही सीमा तक पहुंचने का फैसला किया था।

मेडिकल छात्र औसफ हुसैन अपने दोस्तों के साथ मेट्रो बंकर में फंसे थे। उनका राशन पानी तेजी से खत्म हो रहा था। उसने अपने इंस्टाग्राम पेज का इस्तेमाल करने का फैसला किया। उसने पीटीआई भाषा से कहा कि वह बंकर में अपनी जिंदगी का ब्योरा तैयार करने लगा ताकि लोग वीडियो देख पायें और मदद के लिए आगे आए।

केरल के निवासी हुसैन ने कहा कि सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करने से लोगों को उन मुद्दों से वाकिफ करने में मदद मिली, जिनसे वे जूझ रहे हैं।

उसने कहा, ‘‘इससे हमें अपने माता-पिता तक नवीनतम सूचना पहुंचाने में मदद मिली क्योंकि ढेरों फर्जी खबरें चल रही हैं । हमने सोशल मीडिया से सच्चाई पेश की।

विद्यार्थी समन्वयक सीमेश शशिधरण के लिए कीव में फंसे 800 विद्यार्थियों के समूह को संभावना मुश्किल था। लेकिन वह टेलीग्राम की मदद से ग्रुप तक जरूरी सूचना पहुंचा पाये और उनके संपर्क में रह पाये।

शशिधरण ने कहा, ‘‘ सभी जगह बमबारी हो रही थी और मेरे पास 800 विद्यार्थी थे। हमने उन्हें 40-50 के समूहों में बांट दिया और हर समूह के प्रबंधन की जिम्मेदारी दो वरिष्ठ विद्यार्थियों को दे दी। विद्यार्थी इधर उधर फैले हुए थे क्योंकि निकलने के चार मार्ग थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ इंटरनेट ने हमें विद्यार्थियों के बीच तालमेल में सहयोग किया। हमने उन्हें बताया कि कौन सा रास्ता लेना है और कौन सा नहीं। हमने 800 विद्यार्थियों का टेलीग्राम ग्रुप बनाया और मैं उन्हें ट्रेन की समयसारिणी के बारे में बताता रहा।’’

पिछले सप्ताह भारत लौटे मेडिकल के पहले वर्ष के छात्र कनिष्क ने कहा कि जो हमसे पहले यूक्रेन से निकल आये थे, उन्होंने हमें निकलने के मार्ग के बारे में सोशल मीडिया के मार्फत बताया।

इतना ही नहीं, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की समेत वहां के अधिकारी भी रूस के मीडिया के दुष्प्रचार को खारिज करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। जेलेंस्की ने कई वीडियो पोस्ट कर स्वयं और सरकारी अधिकारियों को दिखाया और कहा कि वह कीव से नहीं भागे हैं।

हालांकि सोशल मीडिया का दूसरा पक्ष भी है, विद्यार्थियों को ट्रोलिंग एवं फर्जी खबरों से जूझना पड़ा। हुसैन ने कहा, ‘हमें बुरी तरह ट्रोल किया गया क्योंकि हजारों मील दूर बैठे लेाग विदेश में जाकर पढ़ने को लेकर हमें गालियां दे रहे हैं।

भाषा राजकुमार नरेश

नरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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