नयी दिल्ली, 20 जनवरी (भाषा) निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) संबंधी उसका आदेश विधायी प्रकृति का है, जिसमें मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं और आवश्यक दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है।
ये दलीलें आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष उन याचिकाओं के समूह पर अंतिम सुनवाई के दौरान दीं, जिनमें बिहार सहित कई राज्यों में एसआईआर को चुनौती दी गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “हमारा एसआईआर आदेश विधायी प्रकृति का है। इसमें निर्धारित सिद्धांतों और दस्तावेजों का एक संपूर्ण सेट दिया गया है। यह एक सामान्य आदेश है जो असम मामले को छोड़कर पूरे देश पर लागू होता है।”
गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ द्वारा दायर की गई प्रमुख याचिका सहित इन याचिकाओं में निर्वाचन आयोग की शक्तियों के दायरे, चुनावी उद्देश्यों के लिए नागरिकता के निर्धारण और मतदान के मौलिक अधिकार से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।
द्विवेदी ने मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन तथा चुनावों के संचालन को विनियमित करने वाली कानूनी योजनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62 का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता पंजीकरण विशिष्ट वैधानिक शर्तों के अधीन है। द्विवेदी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 से 326 तथा अधिनियम 1950 की धारा 19 को एक साथ पढ़ने पर निर्वाचन आयोग का यह संवैधानिक दायित्व बनता है कि मतदाता सूची में केवल नागरिकों का ही नाम दर्ज हो।
‘अधिनियम 1950’ भारत में 1950 में पारित विभिन्न महत्वपूर्ण कानूनों को संदर्भित करता है, जिनमें मुख्य रूप से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 शामिल है।
उन्होंने कहा, “संविधान निर्माताओं का यही उद्देश्य था।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि एसआईआर प्रक्रिया इस धारणा पर आधारित नहीं है कि प्रत्येक मतदाता को दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
द्विवेदी ने कहा, “यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें किसी भी तरह की कोई पूर्वधारणा बिल्कुल ही न जोड़ी गई हो।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं के नाम पिछली मतदाता सूचियों में, विशेष रूप से जून 2025 तक की सूचियों में दर्ज थे, उन्हें अनुमानित वैधता दी गई थी यदि वे पिछली सूचियों में अपने माता-पिता के नामों के साथ संबंध स्थापित कर सकते थे।
द्विवेदी ने कहा, “केवल जहां इस तरह का संपर्क उपलब्ध नहीं है, वहां इस न्यायालय के निर्देशों में आधार सहित 11 निर्दिष्ट दस्तावेजों को प्रस्तुत करने की आवश्यकता बताई गई है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एसआईआर जांच की प्रकृति सामान्य सत्यापन कवायदों से मौलिक रूप से भिन्न है।
आयोग के अनुसार यदि कोई मतदाता पहले के मतदाताओं से अपने वंश का प्रमाण दे सकता था, तो किसी दस्तावेज की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा कि केवल उन्हीं मामलों में दस्तावेज मांगे जाते थे जहां वंशावली का प्रमाण नहीं मिल पाता था।
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