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Wednesday, 17 July, 2024
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वेब टेलीस्कोप से जुड़े होमोफोबिया और ओमिक्रॉन पर अध्ययन- साल 2022 में विज्ञान की दुनिया के बड़े विवाद

शोधकर्ताओं द्वारा ओमिक्रॉन के स्रोत का पता लगाने के लिए किये गए एक अध्ययन को वापस लिए जाने से लेकर कोविड की वजह से हुई अतिरिक्त मौतों पर डब्ल्यूएचओ के साथ मोदी सरकार की तकरार तक, साल 2022 में वैश्विक वैज्ञानिक बिरादरी कई सारे विवादों से घिरी रही.

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नई दिल्ली: ओमिक्रॉन वैरिएंट की उत्पत्ति पर एक सहकर्मी-समीक्षित अध्ययन वापस ले लिया गया  एक पूर्व नासा प्रशासक, जिनके नाम पर जेम्स वेब टेलीस्कोप का नामकरण किया गया था – के एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के खिलाफ भेदभाव का आरोप लगाए जाने के बाद भी नासा ने इस टेलीस्कोप का नाम बदलने से इनकार कर दिया, और एक फ्रांसीसी शोधकर्ता,  जिसने कोविड -19 का इलाज खोजने का दावा किया गया था,  को उसके अपने शोध पत्रों में कथित तौर पर किये गए नैतिक उल्लंघनों के लिए काफी अधिक निंदा का सामना करना पड़ा.

साल 2022 में कुछ सबसे बड़े विज्ञान विवाद देखे गए.

इसके अलावा भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बीच तकरार भी हुई, जब डब्ल्यूएचओ ने दावा किया गया कि भारत में साल 2020 में हुई कोविड से जुड़ी 8 लाख अतिरिक्त मौतें हुईं और साल 2021 में ऐसी मौतों की संख्या 47 लाख से अधिक थी.

दिप्रिंट आपके लिए विज्ञान संबंधी विवादों की एक सूची लेकर आया है जो इस साल सुर्खियां बटोर चुके हैं.

नासा और जेम्स वेब विवाद

नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने गहरे अंतरिक्ष में मानव जाति की पहुंच की सीमाओं को विस्तारित करके अंतरिक्ष विज्ञान में मानवीय प्रयासों का नेतृत्व किया. हबल स्पेस टेलीस्कोप के उत्तराधिकारी के रूप में, इसने हमारी इस दुनिया को ब्रह्मांड को और करीब से देखने की अनुमति दी. लेकिन इसका नाम इस साल विवादों में उलझ गया, क्योंकि नासा के पूर्व प्रशासक जेम्स वेब – जिनके नाम पर इस  टेलीस्कोप का नामकरण किया गया था – कथित रूप से तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन की होमोफोबिक (समलैंगिक लोगों के प्रति प्रबल घृणा करने वाली) नीतियों का समर्थन करने में शामिल थे.

वेब 14 फरवरी 1961 से लेकर 7 अक्टूबर 1968 तक नासा के प्रशासक रहे थे, और उन्हें 1961 में अमेरिका से अंतरिक्ष में पहली मानव उड़ान की देखरेख करने का श्रेय दिया जाता है.

हालांकि, वेब पर नासा में बिताए गए अपने कार्यकाल के दौरान एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के खिलाफ .विच हंट. में शामिल होने का भी आरोप लगाया गया था.

अपनी साल 2004 की पुस्तक ‘द लैवेंडर स्केयर’ में, इतिहासकार डेविड के. जॉनसन ने उन साक्ष्यों को उजागर किया था जो कथित तौर पर इंगित करते थे कि वेब, उस समय के अमेरिकी विदेश विभाग के नेतृत्व दल में शामिल अन्य लोगों के साथ,  ऐसी सरकारी चर्चाओं में शामिल हुआ करते थे, जो अंततः एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय को कार्यबल में शामिल होने से रोकने के उद्देश्य वाली नीतियों के अपनाये जाने का कारण बनीं.

इसके बाद, इस  टेलीस्कोप का नाम बदलने के लिए वैज्ञानिक समुदाय द्वारा किये गए आह्वान के जवाब में, नासा ने 50,000 से अधिक दस्तावेजों की समीक्षा करते हुए एक आंतरिक जांच की.

हालांकि,  इस साक नवंबर में प्रकाशित एक प्रेस विज्ञप्ति में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि उसे इस बात का संकेत देने वाला कोई सबूत नहीं मिला है कि वेब सरकारी कर्मचारियों को उनके सेक्सुअल ओरिएंटेशन (यौन उन्मुखता) के लिए बर्खास्त करने के किसी प्रयास के नेतृत्वकर्ता अथवा प्रस्तावक थे.

इस जांच के परिणामस्वरूप, एजेंसी ने अपने टेलीस्कोप का नाम बदलने से इनकार कर दिया.


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कोविड के ओमिक्रॉन संस्करण की उत्पत्ति पर अध्ययन वापस लिया गया

इस साल नवंबर में, प्रतिष्ठित जर्नल ‘साइंस’ में प्रकाशित एक पीयर-रिव्यू स्टडी (सहकर्मी-समीक्षित अध्ययन) में दावा किया गया था कि कोरोनावायरस के ओमिक्रॉन वैरिएंट (संस्करण) – जो इस साल जनवरी में दुनिया भर में तेजी से फैल गए थे- का पूर्वज इसका पता चलने से पहले ही कई  महीनों से पूरे अफ्रीका में घूम रहा था.

यूके, फ्रांस और कनाडा के शोधकर्ताओं सहित शोधकर्ताओं के अंतरराष्ट्रीय दल के अनुसार, नवंबर में दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना के शोधकर्ताओं द्वारा चेतवानी दिए जाने से कम-से-कम तीन महीने पहले, यानि कि अगस्त 2021 से, ही यह वेरिएंट अफ़्रीकी महाद्वीप में घूम रहा था. इस दल ने साल 2021 के मध्य और 2022 की शुरुआत के बीच कोविड -19 से संक्रमित लोगों से लिए गए तक़रीबन 13,000 वायरस के ऐसे नमूनों का अध्ययन किया था, जिन्हें संग्रह के समय अनुक्रमित (सेक्वेंसेड) नहीं किया गया था.

इसके बाद इस दल ने BA.1 ओमिक्रॉन वैरिएंट और डेल्टा वैरिएंट की पहचान करने के लिए एक रैपिड टेस्ट विकसित किया, और फिर निष्कर्ष निकाला कि ओमीक्रॉन वैरिएंट का महीनों तक किसी को पता नहीं चला था.

अध्ययन के लेखकों ने यह भी प्रस्तावित किया कि इसके बिना रोकटोक संचरण ने इस वैरिएंट के  प्रतिरक्षा शक्ति से बच निकलने की क्षमता के  विकास  में योगदान दिया था.

हालांकि, कई वैज्ञानिकों ने सोशल मीडिया पर यह कहते हुए चिंता जताई कि ये नमूने ऐसे नहीं लग रहे थे जैसे वे एक ही विकासवादी श्रृंखला का हिस्सा थे – यानी, वे अनुक्रमिक क्रम के अपेक्षित पैटर्न में नहीं आते थे.  इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि कई नमूनों ने अप्रत्याशित रूप से इस प्रकार उत्परिवर्तन (इवोलुशन) दिखाया जो डेल्टा वैरिएंट की विशेषता था.

इसके बाद, जब अनुसंधान दल ने उन्हीं नमूनों का फिर से विश्लेषण किया, तो उन्हें यह एहसास हुआ कि वे ओमिक्रॉन संस्करण के जीनोमिक अंशों से दूषित हो गए थे. फिर, 20 दिसंबर को, लेखकों ने अपने लेख को वापस ले लिया और वरिष्ठ लेखक फेलिक्स ड्रेक्सलर ने कहा, ‘हमने गलती की और वह बहुत ही कड़वी (बात )थी..

इज़राइली लेखक युवल नोआह हरारी: ‘असली ‘नकली या विद्वान’

इज़राइली लेखक युवल नूह हरारी, जिन्होंने एक खूब बिकने वाले किताब ‘सेपियन्स’ भी लिखी है, अपनी नवीनतम पुस्तक ‘अनस्टॉपेबल अस’ के विमोचन से पहले बेहवियरल न्यूरोसाइंटिस्ट (व्यवहार संबंधी तंत्रिका विज्ञानी) दर्शना नारायणन द्वारा यह कहे जाने के बाद सोशल मीडिया पर ढेर सारी आलोचनाओं का केंद्र बन गए थे कि उन्होंने सनसनीखेज बनने के लिए विज्ञान का परित्याग कर दिया था,  और यह कि उनका काम त्रुटियों से भरा हुआ है..

ये पुस्तकें मानव विकास, दर्शन, जीव विज्ञान और संस्कृति से संबंधित वैज्ञानिक अवधारणाओं और मानव व्यवहार और प्राकृतिक विज्ञान के संगम का पता लगाती हैं.

विकासवादी जीवविज्ञानी, मानवविज्ञानी, और कई अन्य विशेषज्ञों ने इस ओर इशारा किया है कि किसी भी प्रजाति के पास सहस्राब्दियों पहले की भावनाओं की सामूहिक स्मृति नहीं होती है, न ही वह विकासवादी वृक्ष पर अंडर डॉग (छुपा रुस्तम) होने के मकसद से किसी उद्देश्यपूर्ण ढंग से व्यवहार करती है.

इससे पहले, साल 2015 में, दर्शन और इतिहास के अध्ययन में विशेषज्ञता वाली एक अकादमिक संस्था, कमिटी ऑफ़ सोशल थॉट  के एक पूर्व छात्र, जॉन सेक्स्टन, ने वैज्ञानिक समुदाय में शामिल कई लोगों की बातों को प्रतिध्वनित करते हुए लिखा था कि ‘सेपियन्स’ मौलिक रूप से गंभीर नहीं थी और इतनी व्यापक प्रशंसा और ध्यान आकर्षित करने के योग्य भी नहीं थी.


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‘नैतिक उल्लंघन’ के लिए फ्रांसीसी वैज्ञानिक को कटघरे में खड़ा किया गया

साल 2020 की शुरुआत में, फ्रांसीसी वैज्ञानिक डिडिएर राउल्ट ने तब ढेर सारी सुर्खियां बटोरीं थीं जब उन्होंने दावा किया था कि कम लागत वाली दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन (एचसीक्यू) – जिसका मलेरिया के इलाज हेतु व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है – कोविड 19 को ठीक कर सकती है. समुचित नैदानिक परीक्षण के बिना दिए गए उनके इस बयान से इस दवा की मांग में भारी वृद्धि हुई और कोरोना संक्रमण के खिलाफ निवारक उपाय के रूप में इस एंटीवायरल दवा का अंधाधुंध उपयोग भी हुआ.

हालांकि, बाद में किये गए कई परीक्षणों से पता चला कि इस दवा ने कोविड के खिलाफ काम नहीं किया, जिसके कारण डब्लूएचओ ने इसके परीक्षण को बीच में ही रोक दिया. एचसीक्यू के खिलाफ बढ़ते वैज्ञानिक साक्ष्यों के बावजूद राउल्ट ने कोविड के खिलाफ इस दवा के इस्तेमाल की पैरवी जारी रखी. उनके कृत्यों और बयानों ने इस बात पर भी चिंता पैदा की कि उन्होंने अपने रोगियों को यह दवा किस प्रकार से दी थी.

इस साल, राउल्ट के सहकर्मी-समीक्षित शोध पत्रों में से 49 को प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पीएलओएस’ द्वारा इनमें शामिल नैतिक उल्लंघनों के लिए चिह्नित किया गया. यह पत्रिका में छपे 100 से अधिक शोध पत्रों को फ़िलहाल चल रही जांच का एक हिस्सा था, जिनमें से सभी में सब्जेक्ट्स (जिन पर ये अध्ययन किये गए थे) के रूप में फ्रांस में रह रहे बेघर लोगों का उपयोग करते हुए किये गए शोध शामिल थे.

यह कुछ व्हिसलब्लोअर्स (मामले का भंडाफोड़ करने वालों) द्वारा यह दावा किए जाने के बाद हुआ था कि राउल्ट के कई पेपरों (शोध पत्रों) ने एक ही तरह के नैतिक अनुमोदन कोड (एथिकल अप्रूवल कोड) का पुनरुपयोग किया था.

इसी साल, राउल्ट मार्सिले स्थित अस्पताल और अनुसंधान संस्थान आईएचयु मेदितेरेने इन्फेक्शन, जिसकी उन्होंने साल 2011 के बाद से देखरेख की थी, के निदेशक के रूप में भी सेवानिवृत्त हो गए थे. यह कदम फ्रांस की नेशनल एजेंसी फॉर द सेफ्टी ऑफ मेडिसिन्स एंड हेल्थ प्रोडक्ट्स द्वारा किए गए एक निरीक्षण के बाद उठाया गया था, जिसमें आईएचयु मेदितेरेने, और साथ ही मार्सिले के एक अन्य अस्पताल में भी, गंभीर कमियों और मनुष्यों को शामिल करके किये गए अनुसंधान के लिए निर्धारित नियमों का पालन न किये जाने की बात पायी गयी थी.

कोविड से हुई मौतों पर डब्ल्यूएचओ और भारत के बीच की तकरार

इसी साल भारत सरकार और डब्लूएचओ के बीच कोविड से संबंधित मौतों के अनुमानों पर तब एक बड़ा विवाद छिड़ गया जब डब्लूएचओ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें कहा गया था कि भारत में साल 2020 में कोविड से जुड़ी 8 लाख अतिरिक्त मौतें हुईं और साल 2021 में ऐसी मौतों की संख्या 47 लाख से अधिक थी. यह भारत के अपने डेटा के बिल्कुल विपरीत था जिसमें साल 2020 में हुई अतिरिक्त मौतों का अनुमान 4,74,806 था, जबकि साल 2021 के लिए कोई डेटा जारी नहीं किया गया था.

डब्ल्यूएचओ के ये अनुमान कोविड-19 मृत्यु दर के आकलन के लिए तकनीकी सलाहकार समूह द्वारा किये गए काम और संबंधित देशों की सरकारों के साथ परामर्श द्वारा समर्थित वैश्विक सहयोग का परिणाम थे.  इस समूह में दुनिया के कई प्रमुख विशेषज्ञ शामिल थे, जिन्होंने डेटा के अपूर्ण या अनुपलब्ध होने पर भी तुलनीय मृत्यु दर अनुमान उत्पन्न करने हेतु एक नई पद्धति विकसित की थी.

मोदी सरकार ने भारत के लिए इस अनुमान आधारित मॉडल के उपयोग पर आपत्ति जताई, जबकि उसने उसी सप्ताह के शुरू में अतिरिक्त मौतों का डेटा उपलब्ध कराया था.

भारत की आपत्ति खास तौर पर इस बात से थी कि इसे उन देशों के साथ वर्गीकृत किया गया था जिनकी मौतों देने की प्रणाली को डब्ल्यूएचओ द्वारा दमदार नहीं माना गया था.

जैसे ही डब्ल्यूएचओ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी रिपोर्ट जारी की, स्वास्थ्य मंत्रालय ने उसी के साथ इसका खंडन भी जारी कर दिया.

डब्ल्यूएचओ के द्वारा ये अनुमान जारी किये जाने के लगभग एक महीने पहले, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने यह खबर छापी थी कि भारत सरकार डब्ल्यूएचओ की कार्यप्रणाली पर आपत्तियां जताते हुए इस वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी द्वारा कोविड मृत्यु के अनुमानों को सार्वजनिक करने के प्रयासों को रोक रही हैं.

(अनुवाद: राम लाल खन्ना | संपादन: ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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