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Thursday, 20 June, 2024
होमदेश‘तनाव का एक और कारण नहीं चाहता’— SC ने मणिपुर में लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की समय सीमा तय की

‘तनाव का एक और कारण नहीं चाहता’— SC ने मणिपुर में लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की समय सीमा तय की

सीजेआई की अगुवाई वाली पीठ ने अदालत द्वारा नियुक्त पैनल की रिपोर्ट के बाद कहा कि कथित सिविल सेवा संगठन मणिपुर झड़पों में मारे गए लोगों के परिवारों को शवों पर दावा करने से रोक रहे थे.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मणिपुर हिंसा में मारे गए लोगों के शवों को लेकर गतिरोध खत्म करने का आदेश दिया और परिवारों के लिए एक समय सीमा तय की कि वे या तो उन पहचाने गए शवों को स्वीकार करें जिन पर अभी तक किसी ने दावा नहीं किया गया है या राज्य सरकार को उनका उनके धर्म के हिसाब से अंतिम संस्कार करने दें.

अदालत ने कहा कि वह इस तनावपूर्ण स्थिति में शवों को लेकर “उबाल” बनाए रखना नहीं चाहती, जहां मई में मैतेई और कुकी समुदाय के लोगों के बीच जातीय हिंसा भड़क उठी थी.

तीन न्यायाधीशों की पीठ का आदेश अदालत द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट पर आया है जिसमें आरोप लगाया गया था कि जातीय संघर्ष के बाद मणिपुर में काम कर रहे सिविल सेवा संगठन (CSOs) मारे गए लोगों के परिवारों को उनके शवों पर दावा करने से रोक रहे थे.

जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली समिति को मणिपुर में राहत और पुनर्वास की देखरेख का काम सौंपा गया है. जैसा कि अदालत के आदेश में कहा गया है, “पैनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 175 में से 169 शवों की पहचान की गई थी, जिनमें से 81 पर दावा किया गया था, जबकि 88 पर दावा नहीं किया गया है.”

जिन याचिकाकर्ताओं की याचिका पर पैनल का गठन किया गया था, उन्होंने इस रिपोर्ट की जानकारी के लिए अदालत का रुख किया था.

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में पीठ ने न्यायमूर्ति मित्तल समिति की रिपोर्ट की एक प्रति उपलब्ध कराने के याचिकाकर्ताओं के अनुरोध को खारिज कर दिया.

सीजेआई ने कहा: “हम जो समझ सकते हैं वह यह है कि पानी को उबलते रहने देना चाहिए. यह रुकावट के अलावा और कुछ नहीं है. हम नहीं चाहते कि शवों के चलते एक बार फिर माहौल खराब हो.”

याचिकाकर्ताओं में से एक ने दावा किया कि मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार पर विवाद सोमवार को एक बैठक के दौरान सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया था. उनका दावा था कि पैनल शायद इसके बारे में अनभिज्ञ था.

हालांकि, जब मणिपुर सरकार ने इस बात से इनकार किया कि अंतिम संस्कार कहां किया जाए, इस पर कोई सर्वसम्मत प्रस्ताव नहीं है, तो पीठ ने पहचाने गए और अज्ञात दोनों शवों के अंतिम संस्कार के निर्देश दिए.

पीठ ने कहा कि मणिपुर के नगर पालिका अधिनियम में शवों, खासकर लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का प्रावधान है. इसमें कहा गया है कि कानून नागरिक एजेंसी को अपने खुद के पैसे से ऐसे शवों को दफनाने या दाह संस्कार करने की अनुमति देता है.

समिति के अनुसार, राज्य ने नौ दफनाने या अंतिम संस्कार करने वाले जगहों की पहचान कर ली है जहां दंगा पीड़ितों के शवों का अंतिम संस्कार या दफनाया जा सकता है. उन्होंने परिवारों से अंतिम संस्कार करने के लिए इनमें से किसी एक को चुनने के लिए कहा है.

यह ध्यान में रखते हुए कि हिंसा मई में हुई थी, समिति ने यह भी बताया कि जिन शवों की पहचान नहीं की गई है या उसपर दावा नहीं किया गया है, उन्हें अनिश्चित काल तक मुर्दाघरों में रखना किसी भी प्रकार से उचित नहीं होगा.

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने मृतक का अंतिम संस्कार करने के लिए एक एसओपी तैयार किया था.

अदालत ने कहा कि पहचाने गए शवों के लिए सरकार 4 दिसंबर या उससे पहले नौ दफनाने वाले जगहों के बारे में परिवारों को सूचित करेगी ताकि वे उनमें से किसी एक को चुन सकें. अदालत ने कहा कि परिवार किसी भी तीसरे पक्ष की बाधा के बिना किसी भी चिन्हित स्थल पर अंतिम संस्कार करने के लिए स्वतंत्र होंगे.

लेकिन लावारिस शवों के संबंध में अदालत ने कहा कि राज्य सरकार 4 दिसंबर को या उससे पहले परिवारों को नौ दफनाने वाले जगहों के बारे में बताएगी और उन्हें एक सप्ताह के भीतर अंतिम संस्कार करने का विकल्प दिया जाएगा.

यदि इसका पालन नहीं किया जाता है, तो राज्य सरकार को धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इनका अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जाएगी. राज्य को इस पर सार्वजनिक नोटिस जारी करने के लिए भी कहा है.

इंफाल के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को उचित कानूनी व्यवस्था उपलब्ध करने की स्वतंत्रता दी गई.

याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर कि शवों से डीएनए नमूने लिए जाने चाहिए क्योंकि इससे पुलिस को दंगों की घटनाओं की जांच में मदद मिलेगी, अदालत ने राज्य से उस स्थिति में ऐसा करने को कहा जब शव परीक्षण के समय ऐसा नहीं किया गया था.

इस आशंका पर प्रतिक्रिया देते हुए कि इंफाल में कई शव पड़े हैं और वहां की संवेदनशील स्थिति के कारण रिश्तेदारों के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से इकट्ठा करना असंभव है, अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव से यह सुनिश्चित करने के लिए उचित निर्देश देने को कहा कि मृतकों के परिवार उन तक पहुंच सकें.


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वकीलों में नोकझोंक

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्वेस के बीच जमकर बहस हुई.

मणिपुर सरकार की ओर से पेश होते हुए, मेहता ने गोंसाल्वेस के क्लाइंट – एक आदिवासी संगठन – पर परिवारों को शवों के साथ-साथ मुआवजा स्वीकार करने के खिलाफ उकसाने का आरोप लगाया.

मेहता ने कहा, “शव के परिजन, जो मुर्दाघर में रखे हैं, उसे नौ स्थानों में से एक में दफनाने के लिए सहमत हैं. किसी और को इस पर आपत्ति क्यों होगी?”

वकील ने न्यायमूर्ति मित्तल समिति के निष्कर्षों का समर्थन किया और कहा कि नागरिक समाज संगठन उन परिवारों को धमकी दे रहे हैं जो शव ले जाने या सरकार से मुआवजे का दावा करने के लिए सहमत हैं.

दफनाने वाली जगहों को प्रचारित करने के अदालत के सुझाव पर, मेहता ने कहा कि यह संभव नहीं है क्योंकि प्रचार करने का मतलब इन स्थलों पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन को आमंत्रित करना होगा.

मेहता ने लगातार गोंसाल्वेस को अदालत को संबोधित करने में बाधा डाली, आपत्ति जताई और दावा किया कि वह पीड़ितों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. इस पर गोंसाल्वेस ने मेहता पर “हत्यारों” का प्रतिनिधित्व करने का आरोप लगाया.

गोंसाल्वेस ने अदालत को बताया कि उनका क्लाइंट कुकी- ज़ो रीति-रिवाज के अनुसार मृतकों का अंतिम संस्कार करना चाहता था. उन्होंने कहा, “हम उन्हें अपने रीति-रिवाजों के अनुसार एक ही सामूहिक स्थल पर दफनाएंगे. वे एक जनजाति के रूप में सामूहिक रूप से मरे और उन्हें एक साथ दफनाया जाना चाहिए. मैं एक निर्विवाद साइट के लिए सहमत हूं.”

मेहता के इस बयान पर कि उन्होंने पीड़ितों के लिए बात नहीं की, गोंसाल्वेस ने पलटवार करते हुए कहा: “मैं सभी 94 निकायों (जिनमें से 6 अज्ञात हैं) का प्रतिनिधित्व करता हूं. मैं आपको उन सभी के लिए वकालतनामा दे सकता हूं.”

हालांकि, पीठ इस विवाद में नहीं पड़ी, लेकिन परिवारों को सरकार से अनुग्रह भुगतान स्वीकार करने से रोके जाने पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की. अदालत को न्यायमूर्ति मित्तल रिपोर्ट से पता चला कि, 169 पहचाने गए मामलों में से, 73 मामलों में परिजनों को अनुग्रह भुगतान किया गया था. सभी भुगतान लाभार्थियों के खातों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के रूप में किए गए हैं.

बताया जाता है कि 58 मामलों के संबंध में अनुग्रह सहायता के लिए सत्यापन चल रहा है. लेकिन अदालत को पता चला कि 38 परिवारों ने अनुग्रह राशि लेने से मना कर दिया है. समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, “दुर्भाग्य से यह नागरिक समाज संगठनों के दबाव के कारण है, जिसमें ITLF (स्वदेशी जनजातीय नेता मंच), JPO (संयुक्त परोपकारी संगठन), KIM (कुकी इंपी मणिपुर) आदि शामिल हैं.”

अदालत ने कहा कि अब वह इस मामले की सुनवाई सोमवार को करेगी.

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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