नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह सुधार के नाम पर किसी धर्म को नष्ट नहीं कर सकता और आस्था एवं अंतरात्मा की आवाज से जुड़े मामलों को न्यायिक बहस के अधीन नहीं लाया जा सकता।
केरल के शबरिमला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही नौ न्यायधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि कुछ चीजें समय के साथ-साथ स्थापित हो गई हैं और धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति एहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
पीठ ने सुनवाई के 10वें दिन पूछा कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में वह किसी धर्म की “अभिन्न प्रथा” को पूरी तरह से नकारते हुए समानता के सिद्धांत को लागू कर सकती है।
शीर्ष अदालत ने सामाजिक सुधार के तहत देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की संवैधानिक आकांक्षा का जिक्र किया और पूछा कि अगर राज्य कानून बनाने में नाकाम रहता है, तो क्या न्यायपालिका ऐसा कर सकती है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि विभिन्न राज्यों ने नागरिकों के विवाह एवं उत्तराधिकार अधिकारों को विनियमित करने के लिए समान नागरिक संहिता लागू की है और जब समाज इसके लिए तैयार होगा, तब संसद इसे लागू करेगी।
शबरिमला मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा जताने वाली दो महिलाओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने पीठ को बताया कि हर राज्य ने मंदिरों में प्रवेश संबंधी कानून बनाए हैं और अगर कोई अपने अधिकार का दावा जताना चाहता है, तो उसे कानून का पालन करना होगा।
न्यायमूर्ति बागची ने जयसिंह से कहा कि गैर-हिंदू धार्मिक संस्थानों के मामले में ऐसा कोई कानून नहीं है और क्या न्यायालय नागरिकों के बीच समानता बनाए रखने के अपने उत्साह में गैर-हिंदू संस्थानों के लिए समान निर्देश लागू कर सकता है या फिर उसे यह फैसला विधायिका पर छोड़ देना चाहिए।
जयसिंह ने दलील दी कि यूसीसी के मुद्दे को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (डीपीएसपी) में रखा गया है और यह एक नीतिगत मामला है।
उन्होंने कहा, “भारत में अखिल भारतीय समान नागरिक संहिता नहीं है। लेकिन हमारे पास हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे केंद्रीय कानून हैं। यह राज्य की ओर लिया जाने वाला नीतिगत फैसला है। वे जब चाहें, इसे बदलने के लिए स्वतंत्र हैं। मैं इस बात का खंडन नहीं कर रही हूं। लेकिन अगर समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो इसकी संवैधानिक वैधता पर विचार करना पड़ सकता है।”
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “हमारा सवाल यह नहीं है कि यूसीसी को किस रूप में लाया जाए। यूसीसी की संवैधानिक आकांक्षा स्वीकार की जाती है और अनुच्छेद 25 (2) (ख) में वर्णित सामाजिक सुधारों को डीपीएसपी की संवैधानिक आकांक्षाओं से जोड़ा जाना चाहिए, जो यूसीसी लाएगा।”
उन्होंने कहा, “सवाल यह है कि अगर राज्य ऐसा करने में नाकाम रहता है, तो क्या न्यायालय धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में क्रमिक समानता के प्रावधान ला सकता है और क्या हम किसी धर्म की अभिन्न प्रथा को नकारते हुए समानता की कसौटी को लागू कर सकते हैं?”
पीठ ने कहा कि वह सुधार के नाम पर धर्म को नष्ट नहीं कर सकती और आस्था एवं अंतरात्मा की आवाज के मामलों को न्यायिक बहस के अधीन नहीं लाया जा सकता है।
जयसिंह ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत व्यक्तियों को गारंटीकृत धार्मिक स्वतंत्रता धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों पर हावी होगी और अदालत धार्मिक मामलों में पूरी तरह से निष्क्रिय दृष्टिकोण नहीं अपना सकती है, क्योंकि न्यायिक समीक्षा एक अंतर्निहित संवैधानिक शक्ति है।
उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म का पूर्ण विभाजन संभव नहीं है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक संप्रदाय को दूसरे संप्रदाय के मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया जाए। वरना हर संप्रदाय खुद के अद्वितीय होने का दावा करेगा।”
जयसिंह ने कहा कि अस्तित्व बनाए रखने के लिए हर धर्म को अपने भीतर सुधार करना होगा।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने जयसिंह से कहा, “सुधार के नाम पर धर्म को खोखला मत कीजिए… सदियों से चली आ रही परंपराओं और अनुष्ठानों पर बहस नहीं की जानी चाहिए। यह एक धर्म को नष्ट करने जैसा होगा, जिसका हम हिस्सा नहीं बनना चाहते। अंतरात्मा की आवाज के मामले धर्मनिरपेक्ष अदालत में बहस का विषय नहीं हो सकते।”
जयसिंह ने दलील दी कि अगर किसी धार्मिक प्रथा किसी महिला के अधिकार को नुकसान पहुंचा रही है, तो इसका उपाय क्या है और मंदिर को ऐसी प्रथा का धार्मिक आधार दिखाना होगा।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने वरिष्ठ अधिवक्ता से कहा कि (शबरिमला) मंदिर की यह प्रथा है कि 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को वहां नहीं जाना चाहिए।
जयसिंह ने दावा किया कि ऐसी प्रथा का कोई धार्मिक आधार नहीं है।
न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने पूछा कि क्या कोई व्यक्ति किसी देवता के केवल कुछ पहलुओं को स्वीकार करके उनके पास जा सकता है और क्या कोई व्यक्ति अचानक उन परंपराओं एवं रीति-रिवाजों पर सवाल उठा सकता है, जो लंबे समय से प्रचलित हैं।
उन्होंने कहा, “सदियों से चली आ रही कुछ परंपराएं और रीति-रिवाज समय के साथ-साथ विकसित होकर एक अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। आप इतिहास को यूं ही नहीं भूल सकते। समय बीतने के साथ यह एक मूलभूत तत्व में परिवर्तित हो गया है।”
पीठ ने कहा कि उत्तर भारत का कोई नास्तिक व्यक्ति शबरिमला मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है और मंदिरों में प्रवेश के अधिकार से संबंधित मुद्दे पर फैसला करते समय उसे यह भी देखना होगा कि यह अधिकार कोई श्रद्धालु मांग रहा है या गैर-श्रद्धालु।
सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से पारित फैसले में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने पर लगी रोक हटा दी थी। उसने कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।
भाषा पारुल माधव
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