नयी दिल्ली, 24 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार एक बहुमूल्य संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसका प्रयोग स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम जैसे विशेष कानून से जुड़े मामलों में जमानत देने के लिए नहीं किया जा सकता है, खासकर जहां बरामदगी व्यावसायिक मात्रा में हो।
हेरोइन की व्यावसायिक मात्रा की बरामदगी से जुड़े एक मामले में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा दो व्यक्तियों को दी गई जमानत को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित त्वरित सुनवाई का अधिकार निःसंदेह एक अनमोल संवैधानिक अधिकार है। यद्यपि, एनडीपीएस अधिनियम जैसे विशेष अधिनियम से जुड़े मामलों में, विशेषकर जहां बरामदगी व्यावसायिक मात्रा में हो, अनुच्छेद 21 के तहत उक्त अधिकार का प्रयोग धारा 37 के दायरे में ही किया जाना चाहिए और केवल विलंब के आधार पर इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय का उक्त आदेश मामले के रिकॉर्ड पर पर्याप्त विचार न करने को दर्शाता है, क्योंकि आरोपी ने स्वयं स्वीकार किया है कि ‘‘वर्तमान मामले के अलावा उसके खिलाफ एक और प्राथमिकी दर्ज है।’’
भाषा शफीक अविनाश
अविनाश
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