Sunday, 5 December, 2021
होमदेशRiemann Hypothesis: गणित का 161 साल पुराना रहस्य जिसे सुलझाने का दावा साबित करने के इंतजार में है ये फिजिसिस्ट

Riemann Hypothesis: गणित का 161 साल पुराना रहस्य जिसे सुलझाने का दावा साबित करने के इंतजार में है ये फिजिसिस्ट

डॉ कुमार ईश्वरन ने पहली बार 2016 में रीमन हाइपोथिसिस के बारे में अपना समाधान प्रकाशित किया था. लेकिन उन्हें इस लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं ही मिली. दूसरी ओर इस गणितीय पहेली का अंतिम समाधान निकालने वाले व्यक्ति को एक मिलियन अमेरीकी डॉलर का इनाम मिलेगा.

Text Size:

हैदराबाद: प्रसिद्ध अमेरिकी गणितज्ञ जॉन नैश के जीवन पर आधारित एक बायोपिक ‘ए ब्यूटीफुल माइंड ‘ में नायक यह कहता दिखता है कि वह गणित के सबसे बड़े रहस्य: द रीमन हाइपोथिसिस को सुलझाने की दिशा में वो आगे बढ़ रहा है.

इस अमेरिकी दिग्गज गणितज्ञ की तरह, कई अन्य महान गणितीय दिमागों ने भी इस ‘बड़ी पहेली’ को हल करने के लिए एक शताब्दी से भी अधिक समय तक अनेकों प्रयास किये हैं और हाल के वर्षों में इसका अंतिम समाधान निकालने वाले के लिए एक मिलियन अमेरिकी डॉलर के पुरस्कार की घोषणा के बाद इन प्रयासों को और बल मिला है.

अब, हाइपोथिसिस को पेश किये जाने के 161 साल बाद, हैदराबाद के सैद्धांतिक (थ्योरीटिकल फिजिसिस्ट) भौतिक विज्ञानी डॉ कुमार ईश्वरन का कहना है कि उनके पास इस अनसुलझी समस्या को हल करने का महत्वपूर्ण सबूत है और इस दावे ने दुनिया भर के गणितज्ञों और भौतिकविदों को चकित कर दिया है.

यह हाइपोथिसिस इस बारे में भविष्यवाणी करती है कि एक संख्यात्मक स्पेक्ट्रम के साथ अभाज्य संख्याओं (प्राइम नंबर्स) को कैसे खोजा जाये. लेकिन अभी तक यह सिर्फ एक कयास ही बना हुआ है.

साल 2000 में इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड स्थित क्ले मैथमैटिक्स इंस्टीट्यूट (सीएमआई) ने इसे एक ‘मिलेनियम प्रॉब्लम‘ (सहस्त्राब्दी की समस्या) के रूप में नामित किया और इस हाइपोथिसिस को साबित करने वाले किसी भी व्यक्ति को $1 मिलियन का इनाम देने की घोषणा की.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

हैदराबाद के श्रीनिधि इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के 74 वर्षीय प्रोफेसर ईश्वरन कहते हैं कि उन्होंने इस समस्या पर कड़ी मेहनत की है जो अक्सर दिन में 18 घंटे से भी अधिक हो जाती थी. इस भौतिक विज्ञानी ने दिप्रिंट को बताया, ‘मैंने पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र में जो बहुत सी चीजें सीखी हैं वो भी काम में आयी.’

ईश्वरन कहते हैं कि उन्होंने इसे पहली बार 2016 में ही हल कर लिया था और अपना काम ऑनलाइन प्रकाशित भी किया. उनके काम का अंतिम संस्करण तीन साल बाद पोस्ट किया गया था.

हालांकि, प्रोफेसर के ‘समाधान’ के बारे में पीर रिव्यू कुछ अस्पष्ट रही है- कुछ ने इसे ‘ह्युरिस्टिक’ (अनुमान आधारित) कहा है, जबकि अन्य ने कहा कि यह ‘काफी विस्तृत’ था.


यह भी पढ़ें: नए खतरों के खिलाफ सुरक्षा बढ़ाने के लिए भारतीय सेना खरीदेगी एंटी-ड्रोन सिस्टम


आखिर क्यों सुर्खियों में हैं डॉ ईश्वरन?

डॉ ईश्वरन के निर्णायक अथवा अंतिम कार्य को 2019 में रिसर्चगेट पर प्रकाशित हुए दो साल बीत चुके हैं.

सीएमआई के नियमों के अनुसार, ‘प्रस्तावित समाधान’ एक ‘क्वालिफाइंग आउटलेट’ (यहां इसका अर्थ मान्यता प्राप्त प्रकाशन से है) में प्रकाशित होना चाहिए और इसके ‘प्रकाशन के बाद से कम से कम दो साल का समय बीत जाना चाहिए..’

नियम यह भी कहते हैं कि प्रस्तावित समाधान को वैश्विक गणित समुदाय में सामान्य रूप से स्वीकृति प्राप्त होनी चाहिए.

ईश्वरन के फॉर्मूले को मान्यता दिलवाने के प्रयासों के एक हिस्से के रूप में एक विशेषज्ञ समिति ने लगभग 1,200 वैश्विक गणितज्ञों को ईश्वरन के काम की ‘खुली समीक्षा’ करने के लिए आमंत्रित किया. भौतिक विज्ञानी ईश्वरन ने दिप्रिंट को बताया कि उनमें से सिर्फ चार के जवाब मिले.

उनमें से 85 वर्षीय पोलिश गणितज्ञ व्लादिस्लाव नारकिविज़ भी थे, जिन्होंने ईश्वरन के साथ मेल पर एक संक्षिप्त चर्चा के बाद कहा कि उनके तर्क की प्रकृति ‘अनुमान आधारित’ (‘ह्युरिस्टिक’) थी, ईश्वरन ने बताया कि नारकिविज़ उनके काम से न तो पूरी तरह सहमत थे और न ही पूरी तरह असहमत.

उन्होंने आगे कहा, ‘फिर भी, मैं वास्तव में उनका इस बात के लिए आभारी हूं कि उन्होंने मेरे काम की समीक्षा करने की जहमत उठाई. यह गणित के प्रति उनके अपार प्रेम को प्रदर्शित करता है.’

हालांकि मद्रास विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एम. सीतारमन, ईश्वरन के काम की काफी प्रशंसा करते हैं. उन्होंने कहा कि अब इस समाधान को सिद्ध माना जाना चाहिए क्योंकि यह ‘विस्तृत, स्पष्ट और विश्लेषणात्मक रूप से समझाया गया’ है.

ईश्वरन इस बात से भी खुश हैं कि जुलाई के पहले सप्ताह में उनके काम के प्रति दिलचस्पी बढ़ी है और यह लेख रिसर्चगेट पर 22,000 बार पढ़ा गया है.

हालांकि, सीएमआई ने दावा किया है कि यह हाइपोथिसिस ‘अभी भी अप्रमाणित है और यह अभी भी सबके लिए खुली हुई है’.

सीएमआई के अध्यक्ष मार्टिन ब्रिडसन ने दिप्रिंट को बताया कि भौतिक विज्ञानी ईश्वरन का पेपर कई गंभीर जर्नल्स (पत्रिकाओं) द्वारा खारिज कर दिया गया था.

इस पर ईश्वरन ने जवाब दिया, ‘मैं चर्चा के लिए बिल्कुल तैयार हूं और मैं आपको बता सकता हूं कि मुझे वास्तव में पूरा विश्वास है कि मेरा काम रीमन हाइपोथिसिस को साबित करता है.’

ईश्वरन अपने प्रमाण को ‘सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी का प्रमाण’ मानते हैं. वे कहते हैं, ‘यह विशुद्ध रूप से संख्या सिद्धांत (नंबर थ्योरी) पर ही आधारित नहीं है. इसमें सांख्यिकी, यादृच्छिक चाल (रैंडम वाक), संभाव्यता (प्रोबेबिलिटी) और जटिल चर (काम्प्लेक्स वेरिएबल्स) भी शामिल हैं.’

उन्होंने कहा, ‘वास्तव में, नंबर थ्योरी मेरे प्रमाण में केवल एक छोटी सी भूमिका- 20 प्रतिशत निभाता है और वह भी केवल प्राथमिक स्तर पर ही. अन्य विषय, जो प्रमाण का शेष 80 प्रतिशत बनाते हैं, पूरी तरह से एक सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी के ज्ञान के दायरे में आते हैं.’


यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र के नेताओं की मोदी की पसंद पर फडणवीस की मुहर, पूर्व CM के राजनीतिक दबदबे को दिखाती है


रीमन हाइपोथिसिस- होली ग्रेल या दोधारी तलवार?

यह हाइपोथिसिस प्रसिद्ध जर्मन गणितज्ञ जॉर्ज फ्रेडरिक बर्नहार्ड रीमन द्वारा 1859 में एक पेपर में पेश किया गया एक अनुमान है. यह अभाज्य संख्याओं (प्राइम नंबर्स) के ड्रिस्टिब्यूशन से संबंधित है, जो ऐसे पूर्णांक होते हैं जो केवल अपने आप से और 1 से विभाज्य होते हैं.

रीमन हाइपोथिसिस एक अन्य प्रसिद्ध गणितज्ञ (जो रीमन के शिक्षक भी थे) कार्ल फ्रेडरिक गॉस के काम को आगे बढ़ाती है. गॉस ने शून्य और किसी दी गई संख्या के बीच की अभाज्य संख्याओं का अनुमान लगाने पर काम किया था.

उन्होंने अभाज्य संख्याओं की संख्या का अनुमान लगाने का एक तरीका खोजा और उनकी गणना 30,00,000 तक की. लेकिन कोई नहीं जानता था कि अगला अभाज्य अंक कहां आएगा. यह माना जाता है कि अभाज्य संख्याओं की गिनती अनंत (इनफिनाइट) हैं.

प्राइम नंबर थ्योरम के सिद्धांत पर आगे काम करते हुए रीमन हाइपोथिसिस अभाज्य संख्याओं के वितरण के स्वरूप (पैटर्न) पर सटीक भविष्यवाणियां करती है. लेकिन अभी के लिए यह केवल एक अटकल मात्र है.

यह हाइपोथिसिस ‘जेटा फंक्शन’ और शून्य से संबंधित है. एक जेटा फंक्शन काम्प्लेक्स वेरिएबल्स (वास्तविक और काल्पनिक (इमेजनरी) वेरिएबल्स का संयोजन) का एक फंक्शन होता है.

यह फंक्शन सभी ऋणात्मक सम पूर्णांकों (निगेटिव इवन इंटीजर्स), जिन्हें ट्रीवीअल जीरो कहा जाता है- पर शून्य अथवा जीरो हो जाता है लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अन्य बिंदुओं पर भी शून्य हो जाता है (जिन्हें नॉन- ट्रीवीअल जीरो कहा जाता है).

इस अनुमान में कहा गया है कि जेटा फ़ंक्शन के सभी नॉन-ट्रीवीअल जीरो, काम्प्लेक्स प्लेन की एक सीधी रेखा- क्रिटिकल लाइन पर होते हैं.

इस समस्या की जटिलता इतनी अधिक है कि इसे ‘गणित की होली ग्रेल’ माना जाता है.

हालांकि, अगर रीमन हाइपोथिसिस साबित हो जाती है तो यह आधुनिक बैंकिंग प्रणाली के लिए गंभीर खतरा हो सकती है.

बड़ी अभाज्य संख्याएं, जिन्हें अंकगणित का एटम माना जाता है, आधुनिक क्रिप्टोग्राफी और ई-कॉमर्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

ई-बैंकिंग और क्रेडिट कार्ड के लेन-देन में कोड बड़ी अभाज्य संख्याओं (प्राइम नंबर्स) को गुणा करने की यांत्रिक प्रक्रिया पर आधारित होते हैं.

यदि रीमन हाइपोथिसिस सिद्ध हो जाती है, तो अभाज्य संख्याओं (प्राइम नंबर्स) का पता लगाने के लिए और भी तेज़ तरीके खोजे जा सकते हैं. यह क्रिप्टोग्राफिक सिस्टम और उनके कोड के लिए एक संकट के जैसा होगा जिससे वे असुरक्षित हो जाएंगे.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: सुशील मोदी शामिल नहीं, RS प्रसाद भी बाहर- टीम मोदी में बिहार BJP के पुराने नेताओं को क्यों नहीं मिली जगह


 

share & View comments