नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) अवशिष्ट उत्सर्जन से निपटने के लिए रणनीति बनाए जाने का आह्वान करते हुए वैज्ञानिकों ने कहा कि शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उन्हें कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीकों द्वारा संतुलित किए जाने की आवश्यकता होगी।
अवशिष्ट उत्सर्जन उन्हें कहते हैं जो ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन को खत्म करने के प्रयासों के बाद भी बने रहते हैं। उदाहरण के लिए उत्सर्जन को समाप्त करने की दिशा में ठोस प्रयासों के बावजूद कृषि और जहाजरानी उद्योगों द्वारा वातावरण में जीएचजी उत्सर्जित करते रहने का अनुमान है।
बफेलो विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क (अमेरिका) में पर्यावरण की सहायक प्रोफेसर हॉली जीन बक ने कहा, ‘2050 तक पृथ्वी के तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोकने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए हमारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं।’
बक और उनकी अंतरराष्ट्रीय टीम ने अपने अध्ययन में अवशिष्ट उत्सर्जन की बेहतर समझ के संबंध में दलील दी है। उनका यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न देशों की दीर्घकालिक रणनीतियों के अनुसार, 2050 तक अवशिष्ट उत्सर्जन का औसत स्तर मौजूदा स्तर का 18 प्रतिशत होगा। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इन 50 देशों में से केवल 28 देशों ने 2050 तक अपेक्षित अवशिष्ट उत्सर्जन की मात्रा को निर्धारित किया है।
बक और उनके सहयोगियों ने शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अहम अवशिष्ट उत्सर्जन के प्रबंधन की समस्या से निपटने के जरूरी कई कदमों की पहचान की है।
उन्होंने कहा कि इस संबंध में पहला कदम अवशिष्ट उत्सर्जन की मात्रा के संबंध में स्पष्ट अनुमान विकसित करना है। मात्रा, स्रोत और गैस के प्रकार की पहचान करना भी अहम है ताकि उपयुक्त रणनीति तैयार की जा सके।
भाषा अविनाश माधव
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