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Tuesday, 6 October, 2026
होमदेशपंजाब CMO के अधिकारी CBI जांच के घेरे में, ED के भ्रष्टाचार आरोपों पर पुलिस के जवाब से HC असंतुष्ट

पंजाब CMO के अधिकारी CBI जांच के घेरे में, ED के भ्रष्टाचार आरोपों पर पुलिस के जवाब से HC असंतुष्ट

जनहित याचिका में कहा गया था कि ईडी ने नितिन गोहल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की थी. गोहल सरकारी मदद चाहने वाले लोगों और सीएम मान के ओएसडी राजबीर घुमन के बीच ‘बिचौलिए’ के तौर पर काम करता था.

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चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय के आसपास काम कर रहे अधिकारियों और निजी लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को एफआईआर दर्ज करने और जांच करने का आदेश दिया है.

यह आदेश सोमवार को दिए गए एक फैसले में आया. यह मामला हाई कोर्ट के वकील निखिल सराफ की ओर से जनहित याचिका (पीआईएल) के तौर पर दायर किया गया था. सराफ ने कहा था कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नितिन गोहल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की थी. गोहल सरकारी मदद चाहने वाले लोगों और मुख्यमंत्री भगवंत मान के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी राजबीर सिंह घुमन के बीच बिचौलिए के तौर पर काम करता था.

मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर के 66 पेज के फैसले में कहा गया कि पहली नजर में ये आरोप ऐसे अपराधों से जुड़े हैं, जिनमें पुलिस को मामला दर्ज कर जांच करने का अधिकार है. इनमें एक महत्वपूर्ण सरकारी पद भी शामिल है. अदालत ने यह भी कहा कि ईडी की ओर से दिए गए दस्तावेजों और जानकारी पर राज्य पुलिस का जवाब पर्याप्त नहीं था. सीबीआई को दो महीने के अंदर रिपोर्ट देने को कहा गया है. मामले की अगली सुनवाई सात दिसंबर को होगी.

आरोप अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग, गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ तक पहुंच, सरकारी टेंडर, नीतिगत फैसले, हथियारों के लाइसेंस, जमीन से जुड़े अप्रूवल और दूसरी सरकारी सुविधाओं से जुड़े थे. हालांकि, ईडी ने एफआईआर दर्ज करने के लिए पंजाब पुलिस को पर्याप्त सबूत दिए थे, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की. सराफ ने जांच को आगे बढ़ाने की मांग की थी.

अपने फैसले में अदालत ने दर्ज किया कि ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून की धारा 66(2) के तहत पंजाब पुलिस के साथ यह सामग्री साझा की थी और एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी. ईडी का 30 जुलाई का पत्र राज्य पुलिस प्रमुख के कार्यालय को मिला था, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई. 7 अगस्त को एक रिमाइंडर भेजा गया, लेकिन उसका भी कोई जवाब नहीं दिया गया.

फैसले में कहा गया, “हम इस मामले में पंजाब पुलिस ने अब तक जिस तरह से कार्रवाई की है, उससे भी प्रभावित नहीं हैं. इसलिए हमें इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपना उचित लगता है.”

ईडी की जांच

गोहल और उसके साथियों के खिलाफ आरोप पहली बार 2024 में ईडी की एक जांच के दौरान सामने आए थे. यह जांच अजय सहगल और इंडियन कोऑपरेटिव हाउसिंग बिल्डिंग सोसाइटी से जुड़े लोगों से संबंधित थी. इसमें जमीन के इस्तेमाल में बदलाव से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की भी जांच की गई थी.

इस साल 7 से 10 मई के बीच ईडी ने सहगल, गोहल और अन्य लोगों के ठिकानों पर छापे मारे थे. ईडी के मुताबिक, इन जगहों से दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री बरामद की गई थी. यह तलाशी अभियान तब नाटकीय हो गया, जब कथित तौर पर बहुमंजिला इमारत की ऊपरी मंजिलों में से एक पर स्थित गोहल के घर से नकदी से भरे बैग बाहर फेंके गए.

जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि व्हाट्सऐप चैट, कॉल रिकॉर्ड और दूसरी सामग्री की जांच से पता चला कि गोहल सरकारी मामलों में मदद चाहने वाले लोगों के लिए बिचौलिए के तौर पर काम कर रहा था.

ईडी ने सितंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच ट्रांसफर और पोस्टिंग में कथित दखल के 21 मामलों का हवाला दिया. इनमें पुलिस, पंजाब सिविल सर्विसेज, फूड एंड सिविल सप्लाइज, पंजाब स्टेट कोऑपरेटिव सप्लाई एंड मार्केटिंग फेडरेशन (मार्कफेड) और ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (जीएमएडीए) के अधिकारी शामिल थे.

ईडी ने नीतियां बनाने, विभागीय नियमों में बदलाव, टेंडर की शर्तों, लाइसेंस और प्रशासनिक मंजूरियों से जुड़ी चैट का भी हवाला दिया. दूसरी सामग्री से कथित तौर पर पता चला कि दस्तावेजों पर हस्ताक्षर होने से पहले ही गोहल को गोपनीय सरकारी प्रस्तावों और फैसलों के ड्राफ्ट तक पहुंच थी.

ईडी ने यह भी आरोप लगाया कि गोहल जमीन के लेन-देन, सीएलयू से जुड़े मामलों, संपत्ति विवादों और जीएमएडीए की मंजूरियों में शामिल था. एजेंसी ने खास तौर पर मोहाली के फेज 7 में प्लॉट डी-156 से जुड़े एक संपत्ति लेन-देन का जिक्र किया. इसमें बिक्री के दस्तावेजों में दिखाई गई रकम से ज्यादा नकद भुगतान किए जाने का आरोप लगाया गया. ईडी ने आगे आरोप लगाया कि गोहल ने घुमन और पूर्व मंत्री बीर देविंदर के हवाई टिकट और होटल में ठहरने का खर्च भी उठाया.

ईडी ने कहा कि गोहल के पास से 20.98 लाख रुपये की नकदी बरामद की गई. एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि गोहल ने डॉ. रोमी राजा महाजन और घुमन के जरिए अपने भाई जितिन गोहल को मुख्यमंत्री कार्यालय में नौकरी दिलाने में मदद की. इसके लिए 23 जनवरी 2026 की एक व्हाट्सऐप बातचीत का हवाला दिया गया.

अदालत में क्या हुआ

पंजाब सरकार की अदालत में मुख्य दलील थी कि जनहित याचिका सुनवाई के लायक नहीं है और याचिकाकर्ता के पास एफआईआर दर्ज कराने की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. हालांकि, अदालत के जोर देने पर राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ईडी की ओर से दी गई सामग्री पूरी तरह पढ़ने लायक नहीं थी और जिस पंजाब ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (पीबीआई) को यह सामग्री भेजी गई थी, उसे यह तय करने से पहले इसकी जांच करने के लिए समय चाहिए कि आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए या नहीं.

अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने एक पूरा घटनाक्रम अदालत के सामने रखा. इसमें बताया गया कि पीबीआई ने ईडी की सामग्री की जांच की, कई लोगों को नोटिस भेजे, 29 विभागों से जानकारी मांगी और आखिर में ईडी से ज्यादा साफ प्रतियां और उनसे जुड़े इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मांगे.

अदालत इससे प्रभावित नहीं हुई. उसने कहा, “ऊपर दिए गए नोट को ध्यान से पढ़ने पर जितने सवालों के जवाब मिलते हैं, उससे ज्यादा सवाल खड़े होते हैं.”

अदालत ने सवाल किया कि अगर दस्तावेज कथित तौर पर पढ़ने लायक नहीं थे, तो पुलिस ने कई हफ्तों तक उनकी जांच और लोगों को नोटिस भेजने में समय क्यों लगाया. अदालत ने बताया कि पुलिस ने करीब एक महीने तक विचार-विमर्श करने के बाद 28 अगस्त को ही साफ प्रतियां मांगी थीं.

फैसले में कहा गया, “पंजाब पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई की ऊपर दी गई जानकारी साफ दिखाती है कि ईडी ने पंजाब पुलिस के साथ जो जानकारी साझा की थी, उससे ऐसा सफर शुरू हुआ जिसमें पूरा रास्ता तय किया गया, लेकिन मंजिल तक नहीं पहुंचा गया. पंजाब पुलिस के स्तर पर जो करना जरूरी था, वह था ईडी की ओर से दी गई जानकारी की जांच करना और अगर उससे ऐसे अपराध का पता चलता था, जिसमें मामला दर्ज किया जाना चाहिए, जैसा कि हमारी सोच के मुताबिक इसमें होता है, तो एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए थी और जांच आगे बढ़नी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.”

अदालत ने आगे कहा कि घटनाओं का यह क्रम “याचिकाकर्ता की इस दलील को सही ठहराता है कि दोषियों को बचाने और उपलब्ध सबूतों से छेड़छाड़ करने की रणनीति बनाने के लिए सिर्फ समय लिया जा रहा है”.

अदालत ने यह भी कहा कि घुमन मुख्यमंत्री कार्यालय में ओएसडी होने के बावजूद शुरुआती जांच में शामिल नहीं किए गए और न ही उनसे उनका जवाब मांगा गया. जबकि ईडी की सामग्री में जिन कई दूसरे लोगों के नाम थे, उनसे पूछताछ की गई थी.

अदालत ने यह भी कहा कि जब ईडी अपने पास मौजूद सामग्री के आधार पर यह राय बनाता है कि किसी दूसरे कानून का उल्लंघन हुआ है, तो वह “जरूरी कार्रवाई” के लिए यह जानकारी संबंधित एजेंसी के साथ साझा करता है. अदालत ने कहा कि इसका मकसद आपराधिक जांच की प्रक्रिया शुरू करना है.

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ईडी की ओर से भेजी गई सामग्री सिर्फ एजेंसी की राय नहीं थी, बल्कि उस राय का आधार बनने वाली सामग्री भी उसमें शामिल थी. इसमें व्हाट्सऐप चैट और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के प्रमाण के साथ दी गई दूसरी जानकारी भी शामिल थी.

आदेश में कहा गया, “आरोपों को पहली नजर में सही मानकर देखा जाए तो वे गंभीर हैं और संबंधित पुलिस को उनकी जांच करनी जरूरी थी…ट्रांसफर के बदले नकद पैसे लेने, अनुकूल नीतियां बनवाने के लिए नकद पैसे लेने, टेंडर के लिए नकद पैसे लेने और ऊंचे सरकारी पदों पर भ्रष्टाचार से जुड़ी ऐसी ही दूसरी गैरकानूनी गतिविधियों के घोटालों से जुड़े पहली नजर में आरोपों को ईडी ने कई व्हाट्सऐप चैट और दूसरी जानकारी के आधार पर साबित किया है.”

हाई कोर्ट ने कहा कि ईडी की ओर से भेजी गई सामग्री “बहुत ज्यादा” थी. अदालत के आदेश में ईडी की ओर से दर्ज किए गए गोहल के बयान के कुछ हिस्से भी शामिल किए गए. जब गोहल से पूछा गया कि अधिकारी ट्रांसफर और पोस्टिंग के मामलों में उसके पास क्यों आ रहे थे, जबकि उसके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था, तो गोहल ने कहा कि वह घुमन को 22 साल से जानता है और अधिकारी और विधायक अपनी मांगें उसके पास भेजते थे. उसने अपनी भूमिका बताते हुए कहा कि वह एक्सेल में सूचियां तैयार करता था और उन्हें संबंधित व्यक्ति को भेज देता था.

एक और बातचीत में गोहल ने माना कि उसे खाद्यान्न नीति से जुड़ी एक गोपनीय सरकारी प्रस्तुति मिली थी और उसने उसे आगे भेजा था. उसने ईडी को बताया कि उसे गोपनीय सरकारी दस्तावेज देखने की अनुमति नहीं थी, लेकिन “अधिकारियों से मेरे संबंधों के कारण” उसे यह दस्तावेज मिला था.

ईडी ने गोहल से घुमन, बीर देविंदर और दूसरे लोगों के यात्रा टिकटों की बुकिंग और एक ट्रैवल एजेंसी की लेजर में दर्ज नकद भुगतान के बारे में भी पूछताछ की. गोहल ने माना कि उसने उनके टिकट और होटल बुक किए थे. हालांकि, उसने इस बात से इनकार किया कि ये भुगतान रिश्वत के तौर पर थे. उसने कहा कि कई मामलों में संबंधित लोगों ने सीधे भुगतान किया था.

विपक्ष ने इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन यह भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार के लिए अच्छी खबर नहीं है, जो 2027 के विधानसभा चुनाव में दूसरी बार सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रही है. आम आदमी पार्टी पहले आरोप लगा चुकी है कि केंद्र की एजेंसियों का इस्तेमाल राज्य सरकार को निशाना बनाने और बदनाम करने के लिए किया जा रहा है. अब हाई कोर्ट की निगरानी में पूरी तरह सीबीआई जांच शुरू होने के बाद सरकार के पास कानूनी रास्ता ही बचा है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष परगट सिंह ने एक्स पर लिखा, “अब जांच निष्पक्ष, बिना किसी पक्षपात के, पारदर्शी और तय समय में होनी चाहिए. इसमें कोई देरी, राजनीतिक दबाव या जांच को कमजोर करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. पंजाब के सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, चाहे वह कितना भी ताकतवर या प्रभावशाली क्यों न हो.”

कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने हाई कोर्ट के फैसले को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि यह मामला मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ा है. वहीं विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष, बिना पक्षपात के और तय समय में होगी.

बीजेपी ने भी इस आदेश को लेकर मान सरकार पर हमला करने में देर नहीं की. पार्टी ने मुख्यमंत्री कार्यालय के कामकाज और उसकी जवाबदेही पर सवाल उठाए और पंजाब सरकार से जवाब मांगा.

जिन अकालियों ने मामले में सीबीआई जांच की मांग को लेकर पंजाब के राज्यपाल से मुलाकात की थी, उन्होंने कहा कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का कथित नकद लेकर पोस्टिंग देने के मामले को सीबीआई को सौंपने का फैसला, जिसमें “गुरु-दोखी” यानी अकाल तख्त की ओर से घोषित खालसा का गद्दार मुख्यमंत्री भगवंत मान के ओएसडी भी शामिल हैं, इस सरकार का “असली चेहरा” सामने लाता है.

शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने एक्स पर लिखा, “अगर प्रवर्तन निदेशालय ने पहले ही एफआईआर दर्ज करने को कहा था, तो पंजाब पुलिस ने कार्रवाई करने से इनकार क्यों किया? सीबीआई जांच सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका को दखल क्यों देना पड़ा?

“और फिर भी, यही वह सरकार है जिसने खुद को ईमानदार दिखाने के लिए अपनी तारीफ वाले विज्ञापनों पर जनता के करोड़ों रुपये खर्च किए हैं. ‘क्या गुरु-दोखी मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में ईमानदारी ऐसी ही दिखती है? पंजाब प्रचार और चुप्पी से बेवकूफ नहीं बनेगा — लोग जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.’”

शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने कहा कि अब समय आ गया है जब आम आदमी पार्टी में हर व्यक्ति का पर्दाफाश होगा. मजीठिया ने एक्स पर लिखा, “भ्रष्टाचार को छिपाने की कोशिश में मुख्य सचिव की भूमिका की भी जांच की जाएगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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