बेंगलुरु: कर्नाटक के जेल विभाग के डीआईजी एम सोमशेखर को 2018 में उम्रकैद की सज़ा पाए एक कैदी को रिहा कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कथित तौर पर फर्जी बनाने में उनकी भूमिका के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. उस समय वह बेंगलुरु सेंट्रल जेल के चीफ सुपरिंटेंडेंट थे.
सोमवार को बेंगलुरु पुलिस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, सोमशेखर, जो फिलहाल डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी), प्रिजन्स एंड करेक्शनल सर्विसेज (नॉर्थ रेंज) के पद पर हैं, ने करीब आठ साल पहले ए. शंकर को रिहा कराने में कथित तौर पर मदद की थी.
बयान के मुताबिक, “20/05/2026 को बेंगलुरु सेंट्रल जेल के सुपरिंटेंडेंट (प्रभारी) ने परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई. इसमें बताया गया कि कैदी शंकर ए. को 13/11/2018 को सुप्रीम कोर्ट के कथित आदेश को फर्जी बनाकर रिहा कर दिया गया था.”
परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया. पुलिस ने कहा कि जांच के दौरान कथित गैरकानूनी काम सामने आए.
शंकर को बेंगलुरु के चिकपेट पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में 12 जुलाई 2004 को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा और 10,000 रुपये का जुर्माना दिया था. मामले की फाइल के मुताबिक, बेंगलुरु की फास्ट ट्रैक कोर्ट-1 ने शंकर को भारतीय दंड संहिता की धारा 364ए के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी. यह धारा फिरौती के लिए अपहरण से जुड़ी है. इसके साथ ही उस पर धारा 120बी के तहत आपराधिक साजिश का आरोप भी था.
पुलिस अब उस कैदी का पता लगाने और उसे फिर से गिरफ्तार कर जेल भेजने की कोशिश कर रही है, जो 2018 से जेल के बाहर है.
बेंगलुरु पुलिस के बयान के मुताबिक, “हालांकि, आरोपी ने सजा रद्द कराने के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई सजा को माननीय अदालतों ने बरकरार रखा.”
जांच के दौरान पता चला कि उस समय जेल में काम करने वाले श्रीकांत एस ने कथित तौर पर उस आदेश की एक कॉपी फर्जी बनाई थी, जो सेंट्रल जेल के कन्विक्ट प्रिजनर सेक्शन में सेकंड डिवीजन असिस्टेंट के तौर पर काम करते थे और फिलहाल फर्स्ट डिवीजन असिस्टेंट हैं. यह फर्जी आदेश कथित तौर पर कैदी शंकर ए. की आपराधिक अपील में सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी किया गया था.
फर्जी दस्तावेज में दिखाया गया था कि 13 नवंबर 2018 को शंकर को रिहा करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिया गया था.
बयान के मुताबिक, “फर्जी आदेश के आधार पर शंकर ए. को 13/11/2018 को सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया. जांच के दौरान कैदी की पत्नी से भी पूछताछ की गई. उसने बताया कि उस समय के चीफ सुपरिंटेंडेंट ने भी उसके पति को सेंट्रल जेल से रिहा कराने में मदद की थी.”
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि उस समय जेल और सुधार सेवा विभाग के चीफ सुपरिंटेंडेंट ने मामले की जांच के दौरान “जांच में सहयोग नहीं किया” और इससे जुड़ी जानकारी छिपाई.
सोमशेखर को रविवार को हिरासत में लिया गया. उन्हें अदालत में पेश किया गया और आगे की जांच के लिए पूछताछ के वास्ते पुलिस हिरासत में भेज दिया गया. जांच अभी जारी है.
बयान में कहा गया है कि डीआईजी के साथ एक और व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है, लेकिन उसका नाम नहीं बताया गया है. इसमें यह भी नहीं बताया गया कि शंकर को रिहा कराने में डीआईजी की कथित मदद के पीछे उस व्यक्ति की क्या वजह थी.
बेंगलुरु की सेंट्रल जेल से इस तरह की गड़बड़ियों की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं. पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं. यह आरोप भी लगे हैं कि कुछ पुलिसकर्मी बड़ी रकम के बदले कैदियों को ऐसी सुविधाएं दिलाने में मदद करते रहे हैं.
कुछ हफ्ते पहले पता चला था कि रेप के आरोपी और पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना कथित तौर पर जेल में एक स्मार्टफोन का खुले तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे. उस फोन में पोर्नोग्राफिक वीडियो और ओटीटी सामग्री थी. उन्होंने अपने विधायक पिता एच. डी. रेवन्ना को भी कई फोन कॉल किए थे.
गड़बड़ी के दूसरे मामले भी सामने आए हैं. इनमें हत्या के आरोपी कन्नड़ अभिनेता दर्शन थूगुदीपा को कथित तौर पर विशेष सुविधाएं दिए जाने, जाने-माने बदमाशों के जन्मदिन मनाए जाने और दूसरी गैरकानूनी गतिविधियों के आरोप शामिल हैं.
जुलाई 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने वी. के. शशिकला को कथित तौर पर दी गई विशेष सुविधाओं की जांच के लिए उच्च स्तरीय जांच का आदेश दिया था. शशिकला ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की पूर्व नेता थीं और आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल में थीं. उस समय की डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (जेल) डी. रूपा ने आरोप लगाया था कि जेल अधिकारियों ने शशिकला को विशेष सुविधाएं देने के लिए उनसे 2 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी.
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