(अपर्णा बोस)
नयी दिल्ली, 19 अप्रैल (भाषा) दिल्ली में पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने लगा है और इसका सबसे ज्यादा असर झुग्गी बस्तियों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं पर पड़ रहा है, जिनमें चक्कर आना, बेचैनी, रातभर नींद न आना, सांस फूलना और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं अब आम होती जा रही हैं।
दक्षिणपुरी के संजय कैंप में रहने वाली 38 सप्ताह की गर्भवती रेखा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि वह रात में ठीक से सो नहीं पातीं। बार-बार नींद खुल जाती है क्योंकि गर्मी, उमस और गर्भावस्था की तकलीफों के कारण चैन से लेटना मुश्किल हो जाता है।
रेखा ने कहा, ‘‘मुझे अक्सर घबराहट होती है और नींद नहीं आती। गर्मी और उमस से परेशानी और बढ़ जाती है। कई बार सांस लेने में भी दिक्कत होती है, लेकिन डॉक्टर के पास जाना हमारे लिए आसान नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इतनी गर्मी में मैं पंखे के नीचे बैठकर थोड़ा आराम पाने की कोशिश कर सकती हूं।’’
रेखा अपने पति के साथ टिन की छत वाले छोटे और तंग कमरे में रहती हैं। उन्होंने बताया कि जब भी वह परेशानी बताती हैं, लोग घर बदलने की सलाह देते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती।
दक्षिणपुरी के मिनी सुभाष कैंप में रहने वाली 29 सप्ताह की गर्भवती शबनम ने कहा, ‘‘लगातार बेचैनी रहती है। दूसरी तिमाही (सेकेंड ट्राइमेस्टर) से ही मेरी नींद बहुत कम हो गई है।’’
उन्होंने बताया, ‘‘पिछले हफ्ते अचानक गर्मी और उमस बहुत बढ़ गई। मुझे बार-बार सिरदर्द, घबराहट और सांस फूलने की शिकायत होने लगी।’’
मिनी सुभाष कैंप की ही 28 वर्षीय आयशा ने भी यही चिंता जतायी। वह गर्भावस्था के तीसरे चरण (थर्ड ट्राइमेस्टर) में है। उन्होंने कहा, ‘‘रात के दो-तीन बजे तक गर्मी कम नहीं होती, तब तक सोना नामुमकिन है।’’
रेखा और शबनम की तरह आयशा भी गर्मी और उमस के कारण बेचैनी और तनाव से जूझ रही हैं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सामुदायिक औषधि केंद्र के प्रोफेसर डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने कहा कि गर्भवती महिलाओं में चक्कर आना, उल्टी होना और बेहोशी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘अब गर्मी पहले से जल्दी शुरू हो रही है और मई-जून में हालात क्या होंगे, कहना मुश्किल है। गर्भावस्था खुद एक संवेदनशील समय होता है, ऐसे में भीषण गर्मी मां और नवजात दोनों के लिए बड़ा खतरा है। लेकिन जरूरी बात यह है कि गर्मी से होने वाली बीमारियां और मौतें पूरी तरह रोकी जा सकती हैं।’’
उन्होंने बताया कि खासकर गर्भावस्था के दूसरे चरण में अधिक गर्मी का असर बच्चे के जन्मजात विकास पर पड़ सकता है। वहीं गर्भावस्था के अंतिम चरण में ज्यादा गर्मी समय से पहले प्रसव (37 सप्ताह से पहले) या मृत शिशु के जन्म का खतरा बढ़ा सकती है।
गर्मी का असर बच्चे के लंबे समय के विकास पर भी पड़ता है। यदि इसके साथ वायु प्रदूषण भी हो, तो खतरा और बढ़ जाता है।
डॉ. साल्वे ने कहा कि झुग्गियों में रहने वाली, खेतों या खुले में काम करने वाली महिलाएं अक्सर गर्भावस्था में भी काम जारी रखती हैं, जिससे वे गर्मी के असर के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि समुदायों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है, खासकर गर्भवती महिलाओं और विवाह योग्य युवतियों के बीच, ताकि वे समझ सकें कि गर्मी गर्भावस्था को कैसे प्रभावित करती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की चेतावनियां और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी झुग्गीवासियों तथा खुले में काम करने वालों तक पहुंचनी चाहिए। पानी पीते रहना, ठंडक के साधन उपलब्ध कराना और बचाव के उपाय जरूरी हैं।
उन्होंने कम लागत वाले उपायों का भी जिक्र किया, जैसे छत की सामग्री बदलना, कार्यस्थलों पर छाया की व्यवस्था करना, ताकि घरों और कार्यस्थलों का तापमान कम किया जा सके।
पर्यावरणविद भारती चतुर्वेदी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि गर्मी का असर महिलाओं पर ज्यादा पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाओं, जिनमें ऊष्म लहर भी शामिल है, में महिलाओं की मौत का खतरा 14 गुना ज्यादा होता है।
उन्होंने कहा, ‘‘गर्भवती महिला का शरीर पहले से ही दबाव में होता है। गर्मी के कारण दिल की धड़कन बढ़ जाती है, जिससे समय से पहले प्रसव, मृत शिशु जन्म और असामान्य रक्तचाप जैसी समस्याएं हो सकती हैं।’’
उन्होंने कहा कि गर्मी में सांस लेना कठिन हो जाता है, वायु प्रदूषण का स्वरूप बदल जाता है और ओजोन स्तर बढ़ जाता है। इन सबका संयुक्त असर महिलाओं पर पड़ता है।
भाषा गोला शोभना
शोभना
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.