scorecardresearch
Thursday, 25 April, 2024
होमदेशपेन, पेपर, फोन- भारतीय अब लाइव पढ़ रहे हैं और इसे कहते हैं स्टडीग्राम

पेन, पेपर, फोन- भारतीय अब लाइव पढ़ रहे हैं और इसे कहते हैं स्टडीग्राम

पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है? स्कूल-कॉलेज से लेकर एम्स तक के छात्र अब 'स्टडीग्राम' की तरफ जा रहे हैं, ताकि वह पढते हुए बोरियत या अकेलापन महसूस न करें.

Text Size:

एड-टेक प्लेटफॉर्म के प्रभाव से बहुत दूर, इंटरनेट की इस छोटी सी पुड़िया में एक जगह ऐसी भी मौजूद है जहां बच्चे अपनी मर्जी से पढ़ने के लिए आते हैं. ये छात्रों की अपनी दुनिया है और यहां आपको कोई टीचर नहीं मिलेगा. दरअसल यह भारत में उभरती एक डिजिटल उपसंस्कृति है, जो खूब फल-फूल रही है. यहां छात्र एक-दूसरे को मोटिवेट करते हुए अपने तरीके से पढ़ाई करते हैं. ऑनलाइन को-स्टडी की इस दुनिया में अब GenZ और मिलेनियल स्टूडेंट को अपने कमरे में किताबों को क्रैक करते समय बहुत अकेला या बोरिंग महसूस नहीं करना पड़ता. अब वे अन्य छात्रों को समानांतर दुनिया में अध्ययन करते हुए देख सकते हैं, नोट्स साझा कर सकते हैं और यहां तक कि अपना डेस्क और स्टेशनरी भी दिखा सकते हैं.

‘स्टडी वेब’ भले ही कोविड महामारी से पहले अस्तित्व में रहा हो, लेकिन इसकी तरफ लोगों का ध्यान इस महामारी के समय ही गया. लॉकडाउन ने सब कुछ बदल दिया. स्कूल गए बिना पढ़ाई, ऑफिस गए बिना काम, सब संभव हो गया. ऑनलाइन सबकल्चर ने सभी सीमाओं को तोड़ दिया.

घर में रहते हुए अपने बनाए टाइम टेबल के मुताबिक चलने के लिए 20 साल की वर्षा राणा ने डिस्कॉर्ड सर्वर पर ऑनलाइन स्टडी ग्रुप की तलाश शुरू कर दी. ग्रुप तो उन्हें मिल गए लेकिन उन्हें यहां मजा नहीं आया. हताश होकर उन्होंने दिसंबर 2020 में YouTube पर अपना खुद का ‘स्टडी विद मी सेशन’ की मेजबानी करने का फैसला किया.

मेरठ की रहने वाली राणा ने बताया, ‘इससे मुझे लगातार पढ़ाई करने और देरी से बचने में मदद मिली. मैं रोज सुबह उठकर अपना टाइम टेबल सेट करती थी. मैंने पोमोडोरो स्टडी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए तीन घंटे का सेशन तैयार किया. इसका मतलब था 50 मिनट पढ़ना और फिर 10 मिनट का ब्रेक.’ कुछ दिनों में उनका NEET की तैयारी का सेशन 12 घंटे तक पहुंच गया.

सोशल मीडिया पर ‘स्टडी विद मी सेशन’ आमतौर पर एक तरह का लाइव प्रसारण होता है जहां चैनल बनाने वाला या मालिक खुद स्टडी करता है और दूसरे लोग उसके साथ जुड़ सकते हैं.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

इस तरह का सोशल मीडिया ट्रेंड सबसे पहले दक्षिण कोरिया में देखा गया था. एक ऐसा देश जो हाई-प्रेशर एजुकेशन सिस्टम के लिए जाना जाता है. फिर 2018 में सोशल मीडिया पर पढ़ाई करने का ये तरीका महामारी के दौरान काफी लोकप्रिय हो गया.

हालांकि कुछ लोगों के लिए ये एक ऐसा जरिया है जो उन्हें अकेलेपन से दूर ले जाने में मदद करता है और स्टडी करने के तरीके को मजेदार भी बना देता है. लेकिन कई लोग ऑनलाइन अजनबियों के साथ होने वाली प्रतिस्पर्धा और तुलना को इसका स्याहपक्ष मानते हैं और इसके प्रति चेता रहे हैं.


यह भी पढ़ें: पुलवामा अटैक, कश्मीरी विरोधी दंगे और आर्टिकिल 370 का हटना, जम्मू-कश्मीर में कैसे बदली राजनीति


नाश्ता कर अपनी टेबल सेट की और पढ़ाई में जुट गए

पोर्टमैंट्यू हैशटैग यानी एक जैसे शब्दों वाले हैशटैग मसलन स्टडीग्राम (स्टडी+ इंस्टाग्राम), स्टडीब्लर (स्टडी+ टम्बलर), स्टडीट्व्ट (स्टडी+ट्विटर), स्टडीटोक (स्टडी+टिकटॉक) एक यूजर को पैरलल यूनीवर्स में ले आते हैं. यह अकाउंट से बनी दुनिया है जो रंगीन एनालॉग और डिजिटल स्टडी नोट्स और फैंसी स्टेशनरी और इमिटबल वर्कस्पेस सेटअप की तस्वीरों की पोस्ट से भरी होती है.

अगर लाखों लुभावनी तस्वीरें छात्र को पढ़ने के लिए मोटिवेट करने में विफल हो जाती हैं, तो छात्र YouTube पर लाइव स्टडी सेशन की मेजबानी कर सकते हैं या उनमें भाग ले सकते हैं या डिस्कॉर्ड पर ‘स्टडी सर्वर’ से जुड़ सकते हैं. डिस्कॉर्ड लोगों के एक बड़े ग्रुप के साथ चैट करने या कॉल करने के लिए रूम बनाने वाला एक बड़ा मंच है. ये स्टडी के अलावा और भी काफी सारे विकल्प देता है. गेमिंग कम्युनिटी और GenZ के बीच काफी लोकप्रिय है.

इंस्टाग्राम पर ऐसा ही एक अकाउंट है ‘वायटोफड‘. ये सुंदर पेस्टल रंग की ग्रिड से भरा हुआ है. जिसमें आपको एक लैपटॉप, कुछ पौधे, नोटबुक और स्टेशनरी के साथ एक डेस्क नजर आगा. इसे नवंबर 2020 में एम्स, दिल्ली में कैंसर बायोलॉजी पर शोध करने वाले पीएचडी छात्र मोनी बरुआ ने बनाया था.

पिछले साल महामारी की दूसरी लहर के दौरान अपने हॉस्टल में कैद बरुआ ने सक्रिय रूप से अपनी स्टडी पर फोकस करने के लिए इसे शुरू किया था. वह बताती हैं, ‘मैं नहीं चाहती था कि मेरा स्टडीग्राम बहुत गंभीर या उबाऊ हो. मैं नहीं चाहती थी कि मेरा पेज एक काम जैसा नजर आए. इसलिए मैने एक हल्का, मज़ेदार टेबल सेट-अप तैयार किया. इस पर मेरे लैपटॉप और/या कुछ किताबें थीं, जिन्हें मैं उस दिन पढ़ रही थी.’

ये सब तो सिर्फ अकाउंट पर दिखाने भर के लिए था. उनका असल मकसद तो सोफे से उठना, डेस्क पर बैठना और पढ़ाई करना था. एक बार जब टेबल सेट करने का मुश्किल हिस्सा पूरा हो गया और एक स्नैक या ड्रिंक- जो तस्वीर को और आकर्षक बनाने के लिए था – की व्यवस्था हो गई, तो बरुआ खुद से खुद को मोटिवेट करने और पढ़ने के लिए तैयार थीं.

‘स्टडी वेब’ एंटर करें

मोनी का अकाउंट भी उन इंस्टाग्राम के लाखों स्टडीग्राम अकाउंट्स में से एक है, जहां स्टडी टिप्स से लेकर विजुअल कंटेंट तक, कुछ भी पोस्ट किया जा सकता है. यह दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करता है. सितंबर 2022 की शुरुआत में अकेले #studygram के तहत प्लेटफॉर्म पर 16.4 मिलियन से ज्यादा पोस्ट थे.

स्टडीग्राम ऑनलाइन सेल्फ-स्टडी स्पेस के एक ग्रुप का हिस्सा है, जिसे ‘स्टडी वेब’ कहा जाता है. इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार पूर्व मार्केटिंग मैनेजर फाडेके एडगबुयी ने अपने लोकप्रिय न्यूजलेटर साइबरनॉट में किया था. स्टडी वेब को बड़े पैमाने पर महिलाएं ही चला रही हैं.

ऑनलाइन स्टडी की तरफ रुझान के शुरुआती निशान Tumblr पर पाए जा सकते हैं. 2010 के दशक की शुरुआत में ‘स्टडीब्लर’ कम्युनिटी , अपने साफ-सुथरी डेस्क और कभी-कभार कॉफी के साथ, इंटरनेट के इस कोने पर राज करता था. ये इंस्टाग्राम के एक बड़ा विजुअल प्लेटफॉर्म बनने से पहले की बात है.

कुछ लोग दावा करते हैं कि शुरुआती स्टडीब्लर ब्लॉग्स को कमोबेश लाइफस्टाइल ब्लॉग्स और ब्यूटी साइट्स से ‘चुराया’ गया था. लेकिन समय के साथ, ये अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चलन को आगे बढ़ाते हुए खुद की ताकत बन गए.

2012 में जब कनिका शर्मा अपनी 12वीं क्लास की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही थीं, तब उन्होंने ट्विटर पर मोटिवेशनल ट्वीट्स पढ़ते हुए पहली बार ‘स्टडीब्लर’ की खोज की थी. एक दशक बाद यानी 2022 में आज वह 28 साल की हो चुकी हैं और हिमाचल प्रदेश के एक सरकारी कॉलेज में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं. उन्होंने अपनी पीएचडी भी पूरी कर ली है. लेकिन आज भी उन्हें इस मंच से बेहद लगाव है.

इसने उनके पढ़ने के नजरिए को बदल दिया था.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘मुझे एहसास हुआ कि पढ़ाई को वास्तव में कैसे सेलिब्रेट किया जा सकता है. समय के साथ मैंने कई YouTube चैनलों को खोजा जो ‘स्टडी विद मी’ वीडियो पोस्ट करते हैं. मैंने महसूस किया कि पढ़ाई बोरिंग लोगों के लिए नहीं है.’

थका देने वाली पढ़ाई से दूर ले जाते हुए उसे रोचक बनाने तक

Tumblr यूजर चारुता जी. अपने अकाउंट @gaaandaaalf पर सक्रिय रूप से पोस्ट करती रहती हैं. उन्होंने 2017 में ‘स्टडीब्लर’ कम्युनिटी को ढूंढ़ा था. वह अपने अकाउंट को स्टडीब्लर और बुक ब्लॉग के बीच में रखती हैं. वह कहती हैं कि यहां कोई उनकी पहचान नहीं जानता और उन्हें Tumblr की ये खासियत बेहद पसंद है. वह कहती हैं, ‘प्लेटफ़ॉर्म पर AI -जनरेटेड एल्गोरिदम की अनुपस्थिति मुझे अपने अनुभवों के लिए इंस्टाग्राम की तुलना में कहीं अधिक लंबे समय तक बने रहने की इजाजत देती है.’

स्टडीग्राम भारत में उबाऊ पाठ्यपुस्तकों, रटने और परीक्षा के स्तंभों पर टिकी शिक्षा प्रणाली की एक प्रतिक्रिया है. दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास स्नातक चारुता ने कहा, ‘स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा आपको थका देने वाला महसूस करा सकती है, क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसे ही काम करती है. वह आगे कहती हैं, ‘लर्निंग प्रोजेक्ट में लगे लोगों को ढूंढ़ना अच्छा लगता है.’

कुछ पोस्ट सामने आने के बाद, उन्होंने टम्बलर पर दूसरों के साथ बातचीत करना शुरू कर दिया. वह बताती हैं ‘उन लोगों के बीच होना वाकई दिल को छू लेने वाला लगा, जो पढ़ाई को खुशी के साथ करने पर जोर दे रहे थे. जीवन के विभिन्न चरणों (अकादमिक या अन्य) में लोगों को केवल सीखने से प्यार करते हुए और उसके लिए जगह बनाते हुए देखना बहुत अच्छा लगता है.’

मेरठ में रहते हुए वर्षा ने विदेश में पढ़ाई करने के अपने सपने को साकार करने के लिए YouTube स्टडी सेशन की ओर रुख किया. उन्होंने इस साल NEET में 584वीं रैंक मिली है. लेकिन वर्षा ने स्कॉलरशिप पर एक इतालवी यूनिवर्सिटी में एक बेहतर पाठ्यक्रम में दाखिला लेने का विकल्प चुना.

फिलहाल वर्षा के चैनल ‘स्टडी विद मी’ में 190 सेशन हैं, जिसमें कुछ वीडियो 28,000 बार देखे जा चुके हैं. उनके साथ पढ़ाई करने वालों में न सिर्फ मेडिकल उम्मीदवार थे, बल्कि आईआईटी और यूपीएससी के उम्मीदवार, GATE से जुड़े छात्र और कॉमर्स व ह्युमैनिटी के छात्र भी रहे.


यह भी पढे़ं: ‘मैं बंदूकें बो रहा हूं’ – शोधकर्ता भगत सिंह की पिस्तौल की तलाश में क्यों लगे


क्या इसके कुछ नुकसान भी हैं?

‘स्टडी वेब’ के फायदों को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है कि ये लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं या डिजिटल स्पेस में ‘अपने जैसे मानसिकता वाले लोगों’ को खोजने में मदद करते हैं. लेकिन ये तस्वीर का सुखद पहलू है. बहुत से लोग इन प्लेटफार्म को सही नहीं मानते और आलोचना करते हुए कहते हैं कि ये ऑनलाइन मीडिया प्लेटफॉर्म चीजों को ‘मजेदार’ बनाने की कोशिश करते हुए, मानवीय नजरिए को बदल देते हैं.

हुबली के वरिष्ठ सलाहकार मनोचिकित्सक और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ आलोक कुलकर्णी ने इन गतिविधियों में शामिल होने के दौरान अतिरिक्त सावधानी और संयम बरतने की सलाह दी.

उन्होंने कहा, ‘आत्म-सम्मान, सेल्फ-इमेज और आत्मविश्वास की समस्या से जूझ रहे लोग ऐसे वातावरण में असुरक्षित महसूस कर सकते हैं. हो सकता है कि वे अपने ऑनलाइन साथियों से मोटिवेट होने की बजाय उनके साथ अपनी गैर-जरूरी तुलना करने लग जाएं. और आखिर में वे अपने आपको निराश महसूस करने लगें. चिंता और अवसाद के रूप में इसका प्रभाव सामने आता है’. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऑनलाइन साथियों के साथ लगातार तुलना एक व्यक्ति को टॉक्सिक प्रोडक्टिविटी की ओर धकेल सकती है.

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर ब्रुक एरिन डफी ने 2015 के अकादमिक पेपर में प्रामाणिकता, कम्युनिटी बिल्डिंग और ब्रांड डिवोशन को लेकर की गई बातों की जांच की.

उसमें लिखा था, ‘आकांक्षी रचनात्मक गतिविधियों का पीछा करते हैं जो उन्हें बढ़िया सामाजिक और आर्थिक जीवन देने का वादा करती हैं. लेकिन फिर इन उम्मीदवारों को इनाम के तौर पर काफी असमानता मिलती है.’ जहां उनका पेपर डिजिटल कल्चर में लिंग और आकांक्षात्मक लेबर पर केंद्रित था, वहीं उनके अवलोकन स्टडीग्राम की इस विशिष्ट प्रवृत्ति के बारे में भी बता रहा था.

लेकिन इन ऑनलाइन स्टडी ट्रेंड में भाग लेने वाले कुछ लोग सकारात्मकता पर ध्यान देने और खराब स्थितियों में भी बेहतर पाने का उम्मीद रखते हैं.

चारूता कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि मैं ग्राइंड कल्चर और हाइपर-प्रोडक्टिविटी कल्चर की आलोचना करने के लायक हूं. लेकिन यह पूरी तरह से बेकार नहीं है. यह थोड़ी दुख की बात है कि सीखने की प्रक्रिया अपने आप में शानदार या रोमांचक नहीं है और इसे इस तरह से रोचक बनाया जा रहा है. लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि यह अच्छा है कि छात्रों ने इसे अपने दम पर रोचक बनाने का काम किया है.’

कुछ खास लोगों का शौक

एक ट्रेंड के लिए जो अपने शुरुआती दिनों में लाइफ स्टाइल और ब्यूटी ब्लॉग से बहुत ज्यादा आकर्षित होता है, उसका ऐश्वर्य या समृद्धि की ओर जाना लाजमी है. मंहगे-महंगे गैजेट्स के साथ पढ़ाई करने वाले कुछ खास लोगों का ये शौक उन्हें यहीं तक सीमित नहीं रखता है, वे इससे आगे जाने की कोशिश करने लगते हैं. इन डिजिटल ट्रेंड्स में भाग लेने वाले लोग इससे इनकार नहीं करते हैं.

एक छात्रा के रूप में कृतिका को याद है कि वह ब्यूटी ब्लॉग पर जो कुछ भी देखती थीं, उसे पाना उसकी पहुंच से बाहर था. और फिर अपनी तुलना अपने आसपास के लोगों से करती थीं. वह बताती हैं, ‘यह मुझे मानसिक रूप से काफी परेशान कर देता था. आज इस कम्युनिटी में बहुत सारे छात्र हैं जिनके पास बेहतरीन पेन या सेटअप नहीं है, लेकिन फिर भी वे अपनी उपलब्धियों को पोस्ट करते रहते हैं. अगर आप जानते हैं कि आपको कहां ध्यान लगाना है, तो आप इस तरह के प्लेटफार्म पर जाकर फायदा ले सकते हैं.’

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: भव्यता की हदें छूती देखने लायक फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र पार्ट वन-शिवा’


 

share & View comments