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Thursday, 18 July, 2024
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‘मैं बंदूकें बो रहा हूं’ – शोधकर्ता भगत सिंह की पिस्तौल की तलाश में क्यों लगे

शोधार्थियों ने भगत सिंह से संबंधित निशानियों और यादगारी चीजों को भी ढूंढ़ना शुरू किया था, लेकिन कोई भी उस पिस्तौल के बारे में पता नहीं लगा सका.

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मुश्किल से आठ बरस का बच्‍चा खेत में सूखी लकड़ियां और टहनियां बो रहा है. यह दृश्य 1915 में लायलपुर जिले के बंगा गांव (अब पाकिस्तान) के एक खेत का है.

‘क्या कर रहे हो?’ पिता किशन सिंह ने पूछा.

‘मैं बंदूकें बो रहा हूं.’ बालक ने बिना उनकी ओर देखे जवाब दिया.

हैरान पिता ने हंसी रोकते हुए पूछा, ‘बंदूकों का क्या करोगे?’

‘मैं इनसे अपने देश को आजाद कराऊंगा, ताकि मेरे चाचाजी घर वापस आ सकें.’ आंखों में दृढ़ संकल्प लिए बालक ने जवाब दिया.

यह बच्‍चा भगत सिंह था. गदरी इनकलाबियों के परिवार में जनमे इस बालक ने बहुत जल्दी देश के दुश्मनों का सामना करने के लिए जरूरी बंदूक की ताकत का अंदाजा लगा लिया था. सदियों पहले वे भारत में सस्ती काली मिर्च के व्यापार के लिए पहुंचे थे, क्योंकि इसकी असली उपजवाले देश हॉलैंड ने मसालों के दाम बेतहाशा बढ़ा दिए थे.

दक्षिण भारत में व्यापार के लिए पांव जमाने के बाद वे शासक बन गए और 25 करोड़ भारतीयों को गुलाम बना लिया. यही वे कारण थे कि ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय उपनिवेश को अपने मुकुट में मणि की तरह माना था.

उस बच्‍चे ने खेत में जो छोटा सा बीज बोया था, दरअसल यही अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का बीज भी था. उसने इस सोच को खाद-पानी दिया और एक दिन हथियार हाथ में लेकर आजादी पाने की राह पर बढ़ते हुए फांसी के तख्ते को चूम लिया. उस वक्त भगत सिंह की उम्र महज तेईस बरस, पांच महीने और चौबीस दिन थी. उन्हें महान होना ही था. उन्होंने गदर आंदोलन के नायकों करतार सिंह सराभा और मदन लाल ढींगरा जैसे वीरों से प्रेरणा ली थी. भगत सिंह ने क्रांति की मशाल जलाई थी और वे शहीदों में शेर जैसी गर्जनावाले चंद्रशेखर आजाद जैसों के समकक्ष थे.

जिस चाचा के बारे में बालक भगत सिंह ने बंदूक बोने के समय बात की थी, वे थे—अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह. दोनों क्रांतिकारी थे. अजीत सिंह गिरफ्तारी से बचने के लिए विदेश चले गए और स्वर्ण सिंह गदर आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में जेल काट रहे थे. भगत सिंह ने अंग्रेजों के जुल्म के प्रति पनपे आक्रोश और गुस्से को .32 बोर कोल्ट पिस्तौल यू.एस.ए. नं. 168896 के जरिए दुश्मनों पर उतारा था और हंसते-गाते फांसी के तख्‍ते की ओर बढ़ गए थे. इस युवक ने अपने घर में चाचियों को रोते-दुःख भोगते देखा था. उसने जलियांवाला बाग के बारे में सुना था. उसने ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय के सिर को भेदती लाठी की आवाज को महसूस किया था…इन सब बातों से उपजा आक्रोश आखिरकार इस पिस्तौल के जरिए उस वक्त बाहर निकला, जब 17 दिसंबर, 1928 को लाहौर पुलिस स्टेशन में उसने पांच गोलियां असिस्टेंट पुलिस सुपरिंटेंडेंट जॉन सांडर्स के शरीर में उतार दी थीं. इससे सिर्फ एक माह पहले ही लालाजी ने पुलिस की लाठी से हुए जख्मों की ताब न सहते हुए प्राण दे दिए थे.

भगत सिंह और उनके साथियों ने सोचा था कि वे जे.ए. स्कॉट (जिसने अंग्रेजों द्वारा गठित साइमन कमीशन का विरोध कर रही भीड़ की अगुआई करते हुए लाला लाजपत राय, जो ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारे लगा रहे थे, पर लाठीचार्ज के आदेश दिए थे.) पर गोली चला रहे हैं. जिस व्यक्ति यानी जयगोपाल को जे.ए. स्कॉट की पहचान और पता लगाने के लिए कहा गया था, वह दरअसल इसमें चूक गया था और इधर भगत सिंह व राजगुरु प्रतिशोध ले चुके थे सांडर्स को मारकर.

भगत सिंह की पिस्तौल को खोज निकालने की दास्तां पर लिखी जुपिंदरजीत सिंह की किताब

अगले दिन एक लाल पोस्टर बांटा गया, जिसमें कहा गया था—‘हम तीस करोड़ भारतीयों के प्रिय नेता लाला लाजपत राय को एक मामूली पुलिस अधिकारी स्कॉट द्वारा मारा जाना दरअसल हमारे देश का अपमान है. यह हम युवाओं और हमारे देश के पौरुष को एक चुनौती जैसा था. आज हमने दुनिया को दिखा दिया है कि हिंदुस्तानी न तो मुर्दा हैं और न ही उनकी रगों में खून की जगह पानी दौड़ रहा है.’

भगत सिंह हमेशा अपने साथ पिस्तौल रखा करते थे. सेंट्रल असेंबली दिल्ली में बम फेंकने के बाद वे जब पकड़े गए तो भी पिस्तौल के साथ ही पकड़े गए थे. बैलिस्टिक जांच, जो कि उन दिनों में आसान नहीं थी, से शायद उस समय ऐसा पहली बार ही हुआ हो कि यह साबित हो सका कि 168896 नंबरवाली पिस्तौल से ही भगत सिंह ने सांडर्स की हत्या की थी. उस मामूली पिस्तौल से भगत सिंह ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था और इसके बाद क्रांतिकारियों ने इसी राह को पकड़ते हुए प्रेरणा ली थी. लेकिन यही पिस्तौल, जिसका इतना महत्त्व था, आखिरी बार भगत सिंह के मुकदमे के आखिर में देखी गई थी. ब्रिटिश जज ने सी.आई.डी. के डी.एस.पी. नियाज अहमद को पिस्तौल, पुलिस ट्रेनिंग अकादमी फिल्लौर (जो कि अब भारतीय पंजाब के जालंधर जिले में है) भेजने का आदेश देते हुए सुपुर्द की थी.

पिस्तौल के बारे में यही अंतिम प्राप्त जानकारी मिलती है. लेकिन जैसा कि हमेशा पुलिस के मामलों में होता है, अदालती आदेश के बाद पिस्तौल फिल्लौर पुलिस ट्रेनिंग अकादमी तक पहुंची ही नहीं. यह बात भी इस घटना के 86 बरस बाद तब पता चलती है, जब हम इसकी पड़ताल करने फिल्लौर अकादमी पहुंचकर उनके रिकॉर्ड्स देखते हैं.

1980 और 90 में इतिहासकार और शोधार्थियों ने भगत सिंह के योगदान के बारे में बात करनी शुरू की, जिन्हें इस समय तक भारतीय सरकार द्वारा शहीद का दर्जा नहीं दिया गया था. शोधार्थियों ने उनसे संबंधित निशानियों और यादगारी चीजों को भी ढूंढ़ना शुरू किया था, लेकिन कोई भी उस पिस्तौल के बारे में पता नहीं लगा सका. पंजाब पुलिस और अन्य अधिकारियों ने इस संबंध में उनकी कोई मदद नहीं की. उनकी ज्यादातर दरख्वास्‍तों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. जानकारी के अभाव में इस पिस्तौल के बारे में कई तरह की अफवाहें फैलीं. कुछ का कहना था कि वह पिस्तौल ब्रिटिश जज द्वारा कभी पुलिस को सौंपी ही नहीं गई. कुछ कहते थे कि अब भी वह लाहौर (पाकिस्तान) कोर्ट के मालखाने में पड़ी है. किसी ने तो यह भी कहा कि पिस्तौल तस्करी करके देश से बाहर भेज दी गई है और किसी दिन इंटरनेशनल नीलामी में नजर आएगी. हद तो यह थी कि कुछ ने यह तक कहा कि पंजाब पुलिस के किसी अधिकारी ने ही उसे अपने घर में छिपाकर रखा हुआ है.

बहुत बातें हुईं, अफवाहें फैलीं, लेकिन शोधार्थियों और इस खोज में दिलचस्पी रखनेवालों की वजह से यह मुद्दा हमेशा ज्वलंत रहा और आखिरकार हम इसे खोजने में कामयाब हुए.

(जुपिंदरजीत सिंह, पुरस्कार विजेता पत्रकार-लेखक हैं. यह उनकी किताब ‘भगत सिंह की पिस्तौल की खोज‘ का एक अंश है. किताब हिंदी में प्रभात प्रकाशन से छपी है)


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