नई दिल्ली: देश भर के 25 से अधिक विधि विद्यालयों के 44 से अधिक छात्र संगठनों ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 की निंदा की. उन्होंने दावा किया कि यह ‘‘ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स और जेंडरक्वीर व्यक्तियों की गरिमा, स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है.’’
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा 13 मार्च को लोकसभा में पेश इस विधेयक का उद्देश्य ‘‘ट्रांसजेंडर’’ शब्द की सटीक परिभाषा देना है. यह प्रस्तावित कानून के दायरे से ‘‘विभिन्न यौन अभिरूचि और स्वयं-निर्धारित लैंगिक पहचान’’ को बाहर रखने का भी प्रावधान करता है.
नलसार क्वीर कलेक्टिव, गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई के संबंधित छात्र, लॉयड लॉ कॉलेज के संबंधित छात्र, एमएनएलयू क्वीयर सपोर्ट ग्रुप, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (विधि संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय), फेमिनिस्ट एलायंस एनएलएसआईयू, एनएलएसआईयू में ह्यूमन राइट्स कलेक्टिव और जामिया क्वीर कलेक्टिव (जामिया मिलिया इस्लामिया) सहित अन्य छात्र संगठनों ने संयुक्त बयान जारी किया है.
इसमें कहा गया है कि प्रस्तावित संशोधन ‘स्वयं की पहचान, बदलाव और चुने हुई पारिवारिक ढांचों के लिए खतरा है.’
बयान में कहा गया, ‘‘यह विधेयक…असल में नालसा बनाम भारत सरकार मामले में मान्यता प्राप्त सुरक्षा को कमजोर करने की कोशिश करता है, जिसमें स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान, गरिमा और अभिव्यक्ति के अधिकार को स्वीकार किया गया था. हम, हस्ताक्षरकर्ता, भारत के विभिन्न विधि स्कूलों के क्वीर और सहयोगी छात्र समूह हैं. प्रस्तावित संशोधन…कई ट्रांस व्यक्तियों के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा करता है, साथ ही पहले से सीमित लाभों को भी छीन लेता है.’’
इसमें कहा गया है, ‘‘संशोधन विधेयक में, अब गैरकानूनी घोषित किए जा चुके आपराधिक जनजाति अधिनियम और किन्नर अधिनियम की काली औपनिवेशिक विरासत की झलक मिलती है, जो ट्रांसजेंडर और अन्य आबादी को विनियमित, नियंत्रित और अंततः समाप्त किए जाने वाली समस्याओं के रूप में देखती थी.’’
विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में “विभिन्न यौन अभिरूचि और स्वयं-निर्धारित लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों” को शामिल नहीं किया जाएगा और न ही कभी किया गया माना जाएगा.
बयान में कहा गया, ‘‘इस अधिनियम का उद्देश्य, लक्ष्य और प्रयोजन सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों के रूप में जाने जाने वाले एक विशिष्ट वर्ग के व्यक्तियों की रक्षा करना है, जो अत्यधिक और दमनकारी प्रकृति के सामाजिक भेदभाव का सामना करते हैं.’’
छात्र संगठनों के बयान में दावा किया गया कि ‘‘इस संशोधन के पीछे की मंशा’’ खुद ‘उद्देश्य और कारण विवरण’ से ही स्पष्ट हो जाती है. बयान में कहा गया कि इसके पैरा 3 में यह उल्लेख है कि इस कानून का उद्देश्य ‘‘स्वयं-निर्धारित लैंगिक पहचान’’ की रक्षा करना नहीं है.
इस विधेयक का ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के नेता अनीश गवांडे ने विरोध किया, जो देश में किसी राजनीतिक दल के पहले समलैंगिक राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
