नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि 1978 के उस फैसले की सही व्याख्या से संबंधित उसका निर्णय अब निरस्त हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित मामलों पर लागू होगा। अदालत ने 1978 के फैसले में श्रम संबंधों को नियंत्रित करने के लिए ‘उद्योग’ शब्द की व्यापक व्याख्या की थी।
सात न्यायाधीशों की एक पीठ ने 21 फरवरी 1978 को बैंगलोर जल आपूर्ति और मलजल शोधन बोर्ड की याचिका पर फैसला सुनाते हुए ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा पर फैसला सुनाया और परिभाषा का विस्तार किया, जिससे अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, क्लब और सरकारी कल्याण विभागों में लाखों कर्मचारी औद्योगिक विवाद (आईडी) अधिनियम, 1947 के संरक्षण के दायरे में आ गए।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ 1947 के अधिनियम के तहत ‘उद्योग’ शब्द को परिभाषित करने के विवादास्पद मुद्दे पर दलीलें सुन रही थी।
इस संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की, ‘‘अब जो कुछ भी कहा जाएगा, वह पुराने कानून के तहत चल रहे मामलों पर लागू होगा। संक्षेप में यही सार है।’’
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ अधिवक्ताओं ने नौ-सदस्यीय पीठ को भेजे गए संदर्भ पर इस आधार पर सवाल उठाया है कि 1947 का अधिनियम निरस्त कर दिया गया है और इसके स्थान पर औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, जो 2025 में लागू हुई, अब प्रभावी है।
न्यायमूर्ति दत्ता ने मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सी यू सिंह से सवाल किया, ‘‘संदर्भ दिया जा चुका है। अब हमें ऐसा कोई प्रमाण दिखाइए जो यह कहता हो कि इन परिस्थितियों में नौ न्यायाधीशों की पीठ (संदर्भ का) जवाब नहीं दे सकती।’’
सिंह ने कहा कि वह इस संदर्भ पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन 1947 का अधिनियम अब निरस्त कर दिया गया है।
दिन भर चली बहस के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने पार्टी से परे कई राज्यों द्वारा 1978 के फैसले के जोरदार विरोध की कड़ी आलोचना की।
जयसिंह ने 1947 के अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि इसने कामगारों को कार्यकाल की सुरक्षा प्रदान की थी।
उन्होंने कहा, ‘‘प्रत्येक लोकतांत्रिक समाज का यह कर्तव्य है कि वह न्याय तक पहुंच प्रदान करे और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 ने श्रमिकों को उत्पीड़न, दुर्भावनापूर्ण बर्खास्तगी आदि के संबंध में न्याय तक पहुंच प्रदान की है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने दलीलों से सहमति जताते हुए कहा, ‘‘औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 एक लाभकारी कानून है और कामगार किसी न किसी प्रकार की वैधानिक सुरक्षा के हकदार हैं।’’
न्यायमूर्ति दत्ता ने टिप्पणी की कि अदालत को पहले यह देखना होगा कि औद्योगिक विवाद क्या है। उन्होंने कहा, ‘‘दुर्भाग्यवश, कल किसी भी वरिष्ठ अधिवक्ता ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के प्रावधानों का उल्लेख नहीं किया। हमें पहले यह समझना होगा कि औद्योगिक विवाद क्या होता है।’’
जयसिंह ने दलील दी कि यह संदर्भ उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों के बीच विरोधाभास होने या न होने के बारे में ‘गलत जानकारी’ पर आधारित था।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘हमारी व्याख्या निरस्त कानून के संदर्भ में है, न कि 2020 संहिता के संदर्भ में।’’ इस मामले पर बहस बृहस्पतिवार को जारी रहेगी।
पीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि वह औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में परिभाषित शब्द पर विचार नहीं करेगी।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हम असहाय हैं। हमारे सामने एक संदर्भ है। हम सीधे तौर पर इस प्रश्न की जांच कर रहे हैं कि बैंगलोर (मामले) में मूल प्रावधान की व्याख्या सही थी या नहीं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘यदि वह व्याख्या गलत थी, यदि उस प्रावधान को इतना व्यापक अर्थ देकर पूरी तरह से गलत समझा गया है, तो हम अपनी गलती सुधारेंगे।’’
वर्ष 1947 के अधिनियम के अनुसार, ‘उद्योग’ शब्द का अर्थ नियोक्ताओं का कोई भी व्यवसाय, व्यापार, उपक्रम, विनिर्माण या पेशा है और इसमें कामगारों का कोई भी काम, सेवा, रोजगार, हस्तशिल्प या औद्योगिक कार्य शामिल है।
भाषा धीरज नरेश सुरेश
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