नयी दिल्ली, 22 मार्च (भाषा) विपक्षी सांसदों और तृतीय लिंग अधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार को सरकार से ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लेने की मांग की। उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधन से ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकार कमजोर हो सकते हैं।
इस विधेयक को वापस लेने की मांग यहां प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक जन सुनवाई में की गई, जहां प्रतिभागियों ने ट्रांसजेंडर लोगों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने 13 मार्च को लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक पेश किया था।
इस विधेयक का उद्देश्य ‘‘ट्रांसजेंडर’’ शब्द की सटीक परिभाषा देना है। यह प्रस्तावित कानून के दायरे से ‘‘विभिन्न यौन अभिरूचि और स्वयं-निर्धारित लैंगिक पहचान’’ को बाहर रखने का भी प्रावधान करता है।
इसमें रेखांकित किया गया है कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति में ‘‘अलग-अलग यौन अभिविन्यास और स्व-अनुभूत यौन पहचान वाले व्यक्ति शामिल नहीं होंगे, और न ही कभी शामिल किए गए होंगे’’।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के प्रवक्ता अनीश गावंडे ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि विधेयक को वापस लेने की स्पष्ट तौर पर मांग है। उन्होंने कहा, ‘‘यदि सरकार इसे वापस लेने को तैयार नहीं है, तो इसे पुनर्विचार के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए।’’
कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा कि विधेयक को संसदीय स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि व्यक्तियों का सम्मान किया जाना चाहिए, इसे राज्य और सरकार का कर्तव्य बताया।
दीक्षित कहा कि व्यक्तियों को सर्वप्रथम मनुष्य के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे समाज में पहचान पर अक्सर बार-बार हमला किया जाता है। राज्य और संस्थाओं को सर्वप्रथम प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य के रूप में, और फिर नागरिक के रूप में मानना चाहिए।’’
राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने कहा,‘‘यह संवैधानिक नैतिकता बनाम बहुसंख्यकवाद का मामला है। सरकार केवल संख्या बल पर निर्भर नहीं रह सकती। उसे संवैधानिक मूल्यों द्वारा निर्देशित होना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘संसद के भीतर एक सामूहिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें दलों की सीमाओं से परे जाकर आम सहमति बनाई जाए और ऐसे उपायों को चुनौती दी जाए।’’
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता जॉन ब्रिटास ने प्रस्तावित संशोधनों पर चिंता जताते हुए कहा कि ये स्व-पहचान के सिद्धांत के विरुद्ध हैं। उन्होंने कहा, ‘‘यह कानूनी पहचान तक पहुंच को सीमित करता है और आत्मनिर्णय के बारे में गंभीर प्रश्न उठाता है।’’
माकपा नेता ने पहचान निर्धारित करने के अधिकार पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, ‘‘किसी व्यक्ति की पहचान कौन तय करेगा? सरकार व्यक्तियों पर पहचान थोप नहीं सकती।’’
कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य रेणुका चौधरी ने कहा कि समुदाय प्रस्तावित परिवर्तनों का विरोध करना जारी रखेगा और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेगा।
ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता ग्रेस बानू ने मान्यता और गरिमा के लिए लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रस्तावित बदलाव वर्षों की प्रगति को कमजोर करते हैं।
भाषा धीरज रंजन
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