प्रयागराज, 23 अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में कहा है कि एक बार व्यक्ति विवाह कर लेता है तो वह कानून के तहत पत्नी का भरण पोषण करने को बाध्य है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की पीठ ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति यह महसूस करता है कि यदि शादी नहीं चली, तो वह पत्नी और बच्चों का भरण पोषण नहीं कर पाएगा, ऐसे व्यक्ति को तो विवाह ही नहीं करना चाहिए।
अदालत ने कहा कि कोई भी पुरुष अपनी पत्नी के भरण पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए अपनी खराब आर्थिक स्थिति का बहाना नहीं बना सकता। पीठ ने इसी के साथ परिवार अदालत के आदेश को चुनौती देने के लिए पति द्वारा दाखिल अपील खारिज कर दी।
मौजूदा मामले में, परिवार अदालत ने अपीलकर्ता पति तेज बहादुर मौर्य को पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता के तौर पर 4,000 रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मौर्य ने उच्च न्यायालय का रुख किया और दलील दी कि निचली अदालत ने उसकी वित्तीय स्थिति पर संज्ञान नहीं लिया।
अपीलकर्ता ने कहा कि परिवार अदालत ने इस तथ्य को भी नजरअंदाज किया कि पत्नी एक अन्य व्यक्ति के साथ रह रही है और उनका परस्पर सहमति से अलगाव हुआ है।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश का अध्ययन करने के बाद कहा कि परिवार अदालत ने इन आरोपों पर उचित ढंग से विचार किया था।
पीठ ने प्रतिवादी पत्नी के इस दावे पर विचार किया कि उसे अपने बच्चों का भरण पोषण करना पड़ रहा है और उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं है।
पीठ ने सात अप्रैल को दिए अपने निर्णय में कहा कि आज के समय में जीवन यापन के खर्च को ध्यान में रखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि यह राशि अत्यधिक है जिसे अपीलकर्ता वहन नहीं कर सकता।
अदालत ने अपीलकर्ता की यह दलील भी स्वीकार करने से मना कर दिया कि वह मजदूर है क्योंकि इस संबंध में कोई जानकारी उसके समक्ष उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
भाषा सं राजेंद्र धीरज
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