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Sunday, 25 January, 2026
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कोयला नहीं तो स्वाद नहीं—दिल्ली में तंदूर पर बैन से चिकन और ग्राहक दोनों प्रभावित

फूड हिस्टोरियन सदफ हुसैन ने कहा कि सड़क किनारे के छोटे तंदूर को इंडस्ट्रियल बर्नर के बराबर मानना ​​बिल्कुल गलत है.

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नई दिल्ली: मोहम्मद तौसीफ के अल-जवाहर रेस्तरां में भुने चिकन का स्वाद नवंबर से जनवरी के बीच अलग हो जाता है. इन महीनों में रेस्तरां कोयले से चलने वाले तंदूर की जगह सिलेंडर गैस का इस्तेमाल करता है. इस साल लगे प्रतिबंध से पहले ही, सरकार ने दो साल पहले सर्दियों के दौरान कोयले वाले तंदूर का इस्तेमाल बंद करने के निर्देश दे दिए थे.

तौसीफ ने कहा, “तंदूर से प्रदूषण होता है, यह तर्कहीन है, लेकिन हमें सरकार के दिशानिर्देशों का पालन करना पड़ता है.” अल-जवाहर 1947 से जामा मस्जिद के पास चल रहा है.

दिल्ली में वायु प्रदूषण के खिलाफ चल रही लड़ाई के बीच तंदूर विवाद के केंद्र में आ गया है. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने राजधानी के होटल, रेस्तरां और खुले भोजनालयों में कोयले और लकड़ी से चलने वाले तंदूर पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है. शनिवार सुबह राजधानी के कुछ इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक गंभीर श्रेणी में पहुंच गया और 400 तक दर्ज किया गया. पिछले हफ्ते घोषित यह प्रतिबंध शहर के खाद्य उद्योग के लिए एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है.

हालांकि दरियागंज रोड और जामा मस्जिद इलाके के दुकानदार और रेस्तरां मालिक 5,000 रुपये के जुर्माने को ध्यान में रखते हुए इस प्रतिबंध का पालन कर रहे हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत रूप से तंदूर को प्रदूषण का कारण मानने के दावे को खारिज करते हैं. ग्राहक और खाद्य विशेषज्ञ भी इससे निराश हैं. उन्होंने सरकार के इस कदम को “सिर्फ दिखावा” करार दिया है.

Mohd Tauseef, owner, Al Jawahar | Triya Gulati, ThePrint
मोहम्मद तौसीफ, मालिक, अल जवाहर | त्रिया गुलाटी, दिप्रिंट

तौसीफ ने कहा, “कोयले से चलने वाले तंदूर से धुआं तभी निकलता है जब उस पर मक्खन गिरता है. वह भी बहुत ज्यादा नहीं होता. इसके अलावा, आपको 50 दुकानें एक-दूसरे से सटी हुई या बहुत पास-पास नहीं मिलेंगी. ये फैली हुई हैं. इसलिए किसी भी स्थिति में तंदूर से निकलने वाला धुआं ‘बहुत ज्यादा’ नहीं होता.”

Chicken skewers being cooked on a gas stove at a shop in the old Delhi market, behind Jama Masjid | Triya Gulati, ThePrint
पुरानी दिल्ली के बाज़ार में, जामा मस्जिद के पीछे एक दुकान में गैस स्टोव पर चिकन सीख कबाब पकाए जा रहे हैं | त्रिया गुलाटी, दिप्रिंट

कोयला नहीं, तो स्वाद नहीं.

कोयले पर पकाया गया चिकन जलते अंगारों और प्राकृतिक धुएं की वजह से धुएंदार और हल्का जला हुआ स्वाद ले लेता है. वहीं गैस पर पकाया गया चिकन उस खास धुएंदार स्वाद से वंचित रहता है.

“जो भी तंदूरी चिकन खाता है, उसे कोयले का स्वाद जरूर याद आएगा. यह सिर्फ मेरी बात नहीं है,” विपुल सिंह ने कहा, जो अपने दोस्तों के साथ तीन काली एक्टिवा पर दरीयागंज रोड पहुंचे थे.

सिंह ने बताया कि कोयले पर पका मांस अंदर से रसदार रहता है और किनारे से हल्का जला हुआ होता है.

उन्होंने कहा, “इसमें एक प्राकृतिक धुआं भी होता है, जो इसे मिट्टी जैसी खुशबू देता है. गैस या बिजली की आंच से इस स्वाद को दोहराना काफी मुश्किल है.”

फिर हैं शाह बानो, जो चांदनी चौक की तंग गलियों में रहती हैं. वह पका हुआ चिकन खरीदने के लिए ठेलों पर रुकीं. उनका इरादा था कि वह इसे घर ले जाकर रसोई में कोयले की दम-फुक देकर रात के खाने में परोसें.

उन्होंने कहा, “कोयले के बिना कोई स्वाद नहीं होता. मेरे रिश्तेदार अजमेर से आए हैं और चांदनी चौक का तंदूरी चिकन खाना चाहते हैं. मैं यह कैसे परोसूं.”

जहां बानो सरकार की योजनाओं पर टिप्पणी करने से इनकार करती हैं, वहीं सिंह इसे “हास्यास्पद” बताते हैं.

उन्होंने कहा, “पहले उन्हें गाड़ियों और पटाखों से होने वाले प्रदूषण को निशाना बनाना चाहिए. तंदूर उनकी प्राथमिकता कैसे हो सकता है.”

Chicken cooked over coal develops a smoky, charred flavour from the burning embers and natural smoke. On the other hand, gas-cooked chicken is without that distinct smokiness.
कोयले पर पकाए गए चिकन में जलते हुए कोयलों ​​और प्राकृतिक धुएं से एक स्मोकी, भुना हुआ स्वाद आता है. दूसरी ओर, गैस पर पकाए गए चिकन में वह खास स्मोकी स्वाद नहीं होता.

‘सिर्फ प्रतिबंध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक बाधा’

फूड हिस्टोरियन और लेखक सदफ हुसैन का कहना है कि समस्या नियम बनाने की नहीं, बल्कि एक जैसी सख्त नियमावली लागू करने की है. उनके अनुसार, एक छोटे सड़क किनारे के तंदूर को औद्योगिक बर्नर के बराबर मानना मूल रूप से गलत है, क्योंकि दोनों के पैमाने, काम और पर्यावरणीय असर में बड़ा फर्क है.

हुसैन ने कहा कि तंदूर अपने साथ यादें भी लेकर चलता है. धुएंदार स्वाद सिर्फ स्वाद नहीं है, यह इस बात का संकेत भी है कि चीजें वैसी ही बनी रहेंगी. यह खाना उन जगहों की लंबी परंपरा से आता है, जिनमें बंटवारे के समय के शरणार्थी शिविर, पंजाबी ढाबे, मुगल रसोई, सड़क किनारे की मुस्लिम बेकरी और मेहनतकश शहर शामिल हैं.

उन्होंने कहा, “तंदूर हटाना सिर्फ गर्मी के स्रोत को बदलना नहीं है. यह उस सांस्कृतिक लय को भी तोड़ देता है, जिसने यह तय किया है कि दिल्ली में लोग कैसे खाते हैं, कैसे साथ बैठते हैं और कैसे याद करते हैं. सर्दियों में यह और भी ज्यादा महसूस होता है.”

इतिहास की बात करें तो ठंड के मौसम में लोग ज्यादा आग पर खाना बनाते रहे हैं, क्योंकि इससे गर्मी मिलती है, खाना मिलता है और साथ बैठने का मौका भी. सर्दियों का तंदूर दो काम करता है. लोगों को खाना खिलाता है और मोहल्ले को जोड़े रखता है.

उन्होंने कहा, “चरम मौसम में इस पर प्रतिबंध लगाना एक सांस्कृतिक बाधा है.” उन्होंने जोड़ा कि तंदूर किसी शेफ या रेस्तरां की पुरानी यादों का मामला नहीं है. “यह भौतिकी का मामला है. कोयला और लकड़ी अंगारों के जरिए असमान, जीवित गर्मी पैदा करते हैं.”

इससे नान पर फफोले जैसी बनावट आती है, चर्बी से धुआं उठता है, किनारे जलते हैं और हल्की कड़वी लेकिन स्वादिष्ट खुशबू आती है.

इसके उलट, बिजली और गैस से चलने वाले तंदूर खाना बहुत शालीन बना देते हैं.

उन्होंने कहा, “यह उतना आक्रामक नहीं होता. उतना जीवंत नहीं होता और उतना स्वादिष्ट भी नहीं होता.”

हुसैन के मुताबिक, सड़क किनारे खाने की दुकानों के मेनू का मकसद यही होता है कि एक ही आग से जल्दी और सस्ते में कई काम हो जाएं. अगर तंदूर हटा दिया जाता है, तो उन्हें खाने का स्वाद हल्का करना पड़ेगा या फिर काम ही बंद करना पड़ेगा.

उन्होंने कहा, “दिल्ली को साफ हवा चाहिए. कोई भी गंभीर रसोइया या नागरिक इसका विरोध नहीं करेगा. लेकिन जब हम इतनी पुरानी चीज को नियंत्रित करते हैं, तो धीरे-धीरे शहर के खाने की आत्मा और बनावट को सपाट कर देते हैं.” उन्होंने दिल्ली सरकार के फैसले को “सीधी नाटकबाजी” बताया.

उन्होंने कहा, “हमें ऐसे विकल्प तलाशने की जरूरत है जो स्वाद, संस्कृति और सबसे अहम, इससे जुड़े लोगों के काम और जीवन का सम्मान करें.”

Huzaifa’s family-run restaurant, Al-Yamin | Triya Gulati, ThePrint
हुजैफ़ा का परिवार संचालित रेस्तरां, अल-यामीन | त्रिया गुलाटी, दिप्रिंट

वाहन और कचरा जलाना

हुजैफा की परिवार द्वारा चलाई जा रही दुकान अल-यामिन में तंदूर पिछले महीने ही बंद कर दिया गया था. उन्होंने कहा कि तंदूर “पुरानी दिल्ली के खाने” का जरूरी हिस्सा है, इसलिए इस पर रोक लगना बाजार की संस्कृति पर सीधा हमला है.

लेकिन अब, सिलेंडरों की एक कतार की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “अब हम गैस का इस्तेमाल करते हैं.”

22 वर्षीय हुजैफा ने आगे कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि तंदूर से कितना प्रदूषण होता है, लेकिन हम सरकार के साथ पूरा सहयोग करने की कोशिश कर रहे हैं.”

दुकानदारों के मुताबिक, असली दोषी वाहन हैं.

हुजैफा ने कहा, “तंदूर के मुकाबले गाड़ियां कहीं ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं.”

इस पर तौसीफ ने दिल्ली की नाइटलाइफ का एक अहम पहलू जोड़ा, जो प्रदूषण का बड़ा कारण है.

तौसीफ ने कहा, “दिल्ली भर में लोग रात में ठंड से बचने के लिए सड़कों पर गत्ता और प्लास्टिक जलाते हैं. वे लकड़ी खरीदने की हालत में नहीं होते, इसलिए आग जलाने के लिए कचरे समेत जो भी आसानी से मिल जाए, उसी का इस्तेमाल करते हैं. सबसे ज्यादा जहरीली हवा वहीं से पैदा होती है.”

जामा मस्जिद के पीछे तंदूर पर रोक के बावजूद दुकानों की एक कतार अब भी चल रही है. ऐसी ही एक दुकान पर एक ग्राहक झुककर धीरे से कोयले के धुएं में पके चिकन के बारे में पूछता है.

“12 बजे के बाद आइए,” दुकानदार ने जवाब दिया, जबकि वह गैस स्टोव पर सीखें भून रहा था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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