नयी दिल्ली, 27 मार्च (भाषा) भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़े बदलाव की ज़रूरत पर जोर देते हुए, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने शुक्रवार को कहा कि अब दृष्टिकोण सिर्फ बीमारी के इलाज करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि बीमारी से बचाव, स्वास्थ्य को प्रोत्साहन और व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य पर आधारित मॉडल अपनाया जाना चाहिए।
एक बयान के अनुसार, ये टिप्पणियां यहां ‘नवाचार, प्रौद्योगिकी और परंपरा के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य को प्रोत्साहन’ विषयक चौथे वार्षिक सम्मेलन में की गईं, जहां नीति निर्माताओं, चिकित्सकों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने देश में स्वास्थ्य देखभाल की उभरती जरूरतों पर विचार-विमर्श किया।
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव राजेश भूषण ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवा केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रोकथाम, स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, सहायक देखभाल और पुनर्वास सेवाएं भी शामिल होती हैं, जिनमें से कई सेवाएं समुदाय स्तर पर ही उपलब्ध होती हैं।
उन्होंने कहा कि तीव्र शहरीकरण, जीवनशैली में बदलाव, बढ़ता तनाव और स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है, जो प्रतिक्रियात्मक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों से निवारक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों की ओर बदलाव की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
भूषण ने कहा कि देश की आबादी 1.4 अरब से अधिक है और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से जुड़ी विविध चुनौतियां हैं। उन्होंने कहा कि ‘इलनेस टू वेलनेस फाउंडेशन’ जैसे समुदाय-आधारित कार्यक्रम और संस्थान स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली एकीकृत देखभाल के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है, क्योंकि इसमें आधुनिक चिकित्सा और आयुष के अंतर्गत पारंपरिक पद्धतियां दोनों शामिल हैं।
समग्र स्वास्थ्य को लेकर केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के वरिष्ठ मुख्य चिकित्सा अधिकारी मनोज नेसारी ने ‘आरोग्य’ और ‘स्वस्थ’ जैसे पारंपरिक विचारों पर जोर दिया।
आधुनिक जीवनशैली में आहार विविधता और मौसमी खाद्य प्रथाओं को कम तरजीह दिये जाने को रेखांकित करते हुए, उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को व्यक्तियों, समुदायों और पर्यावरण के बीच एक साझा जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।
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नोमान राजकुमार
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