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Friday, 11 September, 2026
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मुंबई: छात्रों को लंच बॉक्स में नॉन-वेज, आलू, लहसुन नहीं लाने का आदेश, स्कूल मालिक BJP विधायक

मीरा रोड के Seven Square Academy ने आठ दिन चलने वाले धार्मिक पर्व के दौरान अभिभावकों से कंद-मूल वाली सब्जियां न देने को कहा था. विरोध के बाद सर्कुलर वापस ले लिया गया.

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मुंबई: महाराष्ट्र में इस हफ्ते प्याज, लहसुन, आलू और चुकंदर अचानक राजनीतिक और सोशल मीडिया विवाद के केंद्र में आ गए. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायक नरेंद्र मेहता द्वारा चलाए जा रहे एक स्कूल ने जैन धर्म के पर्व पर्युषण के दौरान अभिभावकों से अपने बच्चों के लंच बॉक्स में नॉन-वेज खाना और कंद-मूल वाली सब्जियां न देने को कहा था.

मीरा रोड के Seven Square Academy ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज भेजकर पैरेंट्स से आठ दिन चलने वाले धार्मिक पर्व के दौरान कंद-मूल, यानी ज़मीन के अंदर उगने वाली सब्जियां, लंच बॉक्स में न देने को कहा. स्कूल ने यह भी कहा कि उसकी कैंटीन में प्याज, लहसुन और आलू के बिना खाना बनाया जाएगा.

लेकिन मैनेजमेंट ने इसे एक अनुरोध बताया था, इसके बावजूद जल्द ही इस बात को लेकर विरोध शुरू हो गया कि क्या किसी एक धर्म के आधार पर कोई स्कूल खाने-पीने से जुड़ी पसंद तय कर सकता है.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने गुरुवार को स्कूल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. कुछ कार्यकर्ताओं ने प्याज और लहसुन की मालाएं पहन रखी थीं. पीटीआई के हवाले से MNS के पदाधिकारियों ने बताया कि इसके बाद सर्कुलर स्कूल के आधिकारिक पोर्टल से हटा लिया गया.

मेहता, जो मीरा-भायंदर के विधायक हैं और स्कूल चलाते हैं, उन्होंने कहा कि छात्रों को इस अनुरोध को मानने के लिए मजबूर नहीं किया गया था. उन्होंने राजनीतिक दलों से पर्व को राजनीति का मुद्दा न बनाने की अपील की.

उन्होंने पीटीआई से कहा, “पर्युषण ‘अहिंसा’ (हिंसा न करना) और सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया पर आधारित एक पवित्र पर्व है. स्कूल की ओर से भेजा गया संदेश सिर्फ पैरेंट्स से किया गया एक अनुरोध था, कोई ज़रूरी आदेश या दबाव नहीं था. हमने सिर्फ स्टूडेंट्स और पैरेंट्स से इन आठ दिनों के दौरान गैर-जरूरी या अस्वस्थ चीजें लंच बॉक्स में न रखने को कहा था, ताकि खाने की स्वस्थ आदतों को बढ़ावा दिया जा सके.”

मेहता ने यह भी कहा कि गर्म पानी पीने और हल्का शाकाहारी खाना खाने जैसी चीज़ों के पीछे वैज्ञानिक आधार हैं. उन्होंने कहा कि गणेशोत्सव और नवरात्रि के दौरान भी लोगों से नॉन-वेज खाना न खाने की ऐसी सलाह आम तौर पर दी जाती है.

शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने इसकी ज्यादा कड़ी आलोचना की.

राउत ने कहा कि धर्म को किसी व्यक्ति के घर तक ही सीमित रहना चाहिए. उन्होंने कहा, “आप लहसुन और प्याज नहीं खाते. अगर धर्म के नाम पर ऐसी पाबंदियां लगाई जाती हैं, तो यह लव जिहाद से भी बदतर है.”

उन्होंने यह भी कहा कि खाने पर पाबंदी लगाना “महाराष्ट्र के लिए चुनौती” है.

राउत ने सरकार से स्कूल को बंद करने की मांग की.

‘दूसरों की थाली पर इसे लागू न करें’

स्कूल ने सर्कुलर में अभिभावकों के लिए एक नोट भी दिया था.

सर्कुलर में लिखा है, “छात्रों के लिए जरूरी नोट: 1. छात्रों से अनुरोध है कि वे कंद-मूल के बिना उसी हिसाब से अपना टिफिन लाएं. 2. पर्युषण के दौरान हमारी स्कूल कैंटीन भी प्याज, लहसुन और आलू के बिना खाना परोसेगी. आइए, हम सभी ज्यादा दयालु और संवेदनशील बनने का संकल्प लें.”

यह विवाद जल्द ही स्कूल के गेट से बाहर निकलकर एक्स तक पहुंच गया. यहां बहस सिर्फ आलू को लेकर नहीं रह गई, बल्कि यह सवाल बन गया कि धार्मिक परंपरा का पालन कहां खत्म होता है और दूसरे लोगों के खाने के विकल्प कहां से शुरू होते हैं.

सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने स्कूल की आलोचना की. सर्कुलर के बारे में एक पोस्ट का जवाब देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि जैन धर्म की खाने से जुड़ी पाबंदियां दूसरों पर क्यों लागू की जानी चाहिए. उन्होंने कहा, “यह न खाऊंगा, न खाने दूंगा वाला कारोबार बंद होना चाहिए.”

लेकिन इस बहस का एक हिस्सा जैन समुदाय के अंदर से भी आया.

एडवोकेट आयुषी दोशी, जिन्होंने खुद को जैन बताया, ने पर्युषण के दौरान खाने से जुड़ी पाबंदियों को उन लोगों पर लागू करने की कोशिश का विरोध किया, जिन्होंने इन नियमों को मानने का फैसला नहीं किया है. उन्होंने लिखा कि जैन धर्म को मानने वाले लोग अपनी इच्छा से उपवास और खाने से जुड़ी पाबंदियां अपनाते हैं.

उनका संदेश सीधा था: “अपने धर्म का इतनी खूबसूरती से पालन करें कि लोग उसका सम्मान करें. इसे दूसरों की थाली पर लागू न करें.”

हालांकि, सभी लोग इससे सहमत नहीं थे.

तन्वी जैन, जो एक्स पर जैन धर्म के बारे में नियमित रूप से पोस्ट करती हैं, ने इस विचार का बचाव किया कि संस्थान सात्विक मूल्यों को अपने नियमों में शामिल कर सकते हैं. खास तौर पर स्कूलों का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि अगर वह कोई स्कूल चलातीं, तो पढ़ाई के पाठ्यक्रम के साथ “सात्विक भोजन, प्रकृति के प्रति दया और शांतिपूर्ण जीवन के सबक से जुड़े नियम” भी शामिल करतीं.

उन्होंने कहा कि धार्मिक समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूल पहले से ही अपनी-अपनी परंपराओं की कुछ बातों को शामिल करते हैं. इसलिए दया, सादगी और किसी को नुकसान न पहुंचाने जैसे जैन विचारों को सिखाने को भी उसी तरह देखा जाना चाहिए.

स्कूल को लेकर यह विवाद पर्युषण के दौरान खाने को लेकर मीरा-भायंदर में चल रहे एक बड़े विवाद के बीच सामने आया है. मीरा भायंदर नगर निगम ने भी अलग से एक प्रस्ताव पास किया था, जिसमें पर्व के दौरान कुछ समय के लिए मांस और मछली की बिक्री पर रोक लगाने की बात कही गई थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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