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Monday, 7 September, 2026
होमदेशसहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विवाद: विपक्ष ने उठाए सवाल, BJP ने कोर्ट के आदेश का दिया हवाला

सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विवाद: विपक्ष ने उठाए सवाल, BJP ने कोर्ट के आदेश का दिया हवाला

विपक्ष के नेताओं का कहना है कि मस्जिद पुरानी और धरोहर का हिस्सा थी. वहीं, बीजेपी नेता संगीत सोम का दावा है कि यह एक अवैध इमारत थी, मस्जिद नहीं, और इसे कोर्ट के आदेश पर गिराया गया था.

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर बनी एक मस्जिद को गिराए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है. विपक्षी नेताओं ने कार्रवाई की तेजी पर सवाल उठाए हैं, जबकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कहना है कि यह सरकारी जमीन पर बना अवैध निर्माण था और कोर्ट के आदेश पर इसे हटाया गया.

भारी पुलिस तैनाती के बीच शनिवार को मस्जिद गिरा दी गई. इससे कुछ दिन पहले जिला अदालत ने मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील खारिज कर दी थी और पहले के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें इस ढांचे को अवैध बताया गया था.

सहारनपुर रेंज के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DIG) अभिषेक सिंह के अनुसार, सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया कि मस्जिद सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से बनाई गई थी. मस्जिद समिति ने इसे गिराने के आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन करीब डेढ़ महीने की सुनवाई के बाद उसकी अपील खारिज कर दी गई.

दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि यह विवाद पिछले साल बजरंग दल के नेता विकास त्यागी की शिकायत के बाद शुरू हुआ था. इसके बाद 24 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश पब्लिक प्रिमाइसेज (अनऑथराइज्ड ऑक्यूपेंट्स) एक्ट के तहत सिटी मजिस्ट्रेट के सामने मामला दर्ज किया गया. लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई को मस्जिद को अवैध घोषित कर दिया और उसे खाली कराने और गिराने का आदेश दिया.

मस्जिद समिति ने जिला अदालत में इस आदेश को चुनौती दी. जिला अदालत ने 2 सितंबर को अपील खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखा.

DIG सिंह ने शनिवार को मीडिया से कहा, “सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया कि मस्जिद सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से बनाई गई थी. मस्जिद को गिराने के खिलाफ मस्जिद समिति की ओर से दायर अपील भी खारिज कर दी गई.”

हालांकि, मस्जिद समिति ने दावा किया था कि यह जमीन वक्फ की थी और मस्जिद करीब 150 साल पुरानी थी. समिति ने 1911 के दस्तावेज भी पेश किए और दावा किया कि मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी. हालांकि, जिले के अधिकारियों का कहना था कि समिति अदालत के सामने मस्जिद को लेकर अपने दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी.

‘जल्दी न्याय’ का चलन

मस्जिद गिराए जाने के बाद राजनीतिक विवाद और बढ़ गया. समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि मस्जिद गिराए जाने से पहले उन्हें कैराना स्थित उनके घर में नजरबंद कर दिया गया था, ताकि वह सहारनपुर न जा सकें. हसन ने X पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें कथित तौर पर पुलिसकर्मी उन्हें घर से बाहर जाने से रोकते दिख रहे हैं.

हसन ने कहा, “इन दिनों राज्य में ‘जल्दी न्याय’ का चलन है. एक आतंकवादी को भी कई मौके मिलते हैं, जिसमें दया याचिका दायर करने का विकल्प भी शामिल है. लेकिन दो दिन पहले ही फैसला आया और एक रात का भी समय नहीं दिया गया. यह मस्जिद 1947 से पहले बनी थी. इस पर पूजा स्थल अधिनियम लागू होता है, साथ ही ‘वक्फ बाय यूजर’ का सिद्धांत भी लागू होता है. इन सभी प्रावधानों को नजरअंदाज किया गया.”

SP सांसद ने आरोप लगाया कि धार्मिक स्थल को इसलिए गिराया गया क्योंकि वह एक खास समुदाय का था. उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, “क्योंकि एक खास समुदाय के लोग प्रभावित हुए, इसलिए उनके पूजा स्थल को पूरी तरह गिरा दिया गया. यह तानाशाही है. हम इसके खिलाफ कोर्ट जाएंगे.”

सहारनपुर से सांसद कांग्रेस के इमरान मसूद ने भी मस्जिद गिराए जाने की आलोचना की और आरोप लगाया कि प्रशासन ने मस्जिद के समर्थकों की ओर से दी गई जानकारी को नजरअंदाज किया. उन्होंने कहा, “हमारे लोग पूरी रात जागते रहे. हम अधिकारियों के संपर्क में रहने की कोशिश करते रहे. सारी जानकारी देने के बावजूद मस्जिद गिरा दी गई. असल में सिर्फ मस्जिद नहीं गिराई गई है, संविधान का उल्लंघन किया गया है.”

उन्होंने दावा किया कि मस्जिद 1911 से भी पहले मौजूद थी और जमीन के मालिकाना रिकॉर्ड अभी भी वहीद और याकूब खान के नाम पर हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड को न तो मामले की सुनवाई में पक्ष बनाया गया और न ही कार्रवाई में शामिल किया गया. मसूद ने दिप्रिंट से कहा, “मस्जिद को चारों तरफ से घेर लिया गया और लोगों को उनके घरों में बंद कर दिया गया. इसके बाद मस्जिद गिरा दी गई.”

मसूद ने कार्रवाई में की गई जल्दबाजी पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि अगर निचली अदालत से राहत नहीं मिलती है, तो हर नागरिक को ऊपरी अदालत जाने का अधिकार है. उन्होंने कहा, “मैं बार-बार कहता रहा हूं कि यह मस्जिद शहर की विरासत का हिस्सा है. इस विरासत को बचाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है.” उन्होंने सभी समुदायों के लोगों से शांति और भाईचारा बनाए रखने की अपील की.

रविवार को इस विवाद ने एक और मोड़ ले लिया, जब मस्जिद गिराए जाने के एक दिन बाद जगह की सफाई के दौरान करीब 20 फीट गहरा कुआं मिला.

बाद में अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया. वहीं, कुएं की पुरातात्विक जांच कराने की मांग उठी, जिसमें उसकी मिट्टी और ईंटों की भी जांच शामिल है.

अखिलेश, मायावती ने सरकार को घेरा

मस्जिद गिराए जाने की कई विपक्षी नेताओं ने आलोचना की. पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने कहा कि सरकार को उत्तर प्रदेश में मस्जिदों को जल्दबाजी में अवैध घोषित करके गिराने के अभियान को रोकना चाहिए.

उन्होंने कहा, “सरकार को इसे तुरंत रोकना चाहिए और ऐसे मामलों को सुलझाने के दूसरे तरीके तलाशने चाहिए, ताकि स्थिति और खराब होने से रोकी जा सके.”

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया, “शांति और भाईचारा बनाए रखना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी है.”

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मस्जिद गिराए जाने की आलोचना की. उन्होंने कहा कि मस्जिद 100 साल से ज्यादा समय से वहां थी. ओवैसी ने X पर कहा, “आज सुबह 5 बजे मस्जिद क्यों गिराई गई? क्या मुसलमानों को अब धार्मिक आजादी का संवैधानिक अधिकार भी नहीं मिला है?”

उन्होंने कहा कि मस्जिद समिति ने 1911 के दस्तावेज पेश किए थे, जिनके आधार पर दावा किया गया था कि यह पूजा स्थल कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद था और यहां 100 साल से ज्यादा समय से लगातार नमाज पढ़ी जा रही थी.

दूसरी तरफ, BJP नेता संगीत सोम ने कार्रवाई का बचाव किया. उन्होंने कहा कि यह मस्जिद नहीं बल्कि सरकारी जमीन पर बना अवैध निर्माण था. सोम ने रविवार को मीडिया से कहा, “यह मस्जिद नहीं थी, यह एक अवैध इमारत थी. ऐसे सभी निर्माण गिराए जाएंगे. यह कार्रवाई कोर्ट के आदेश पर की गई है और आगे भी ऐसे सभी निर्माण कानून और कोर्ट के आदेश के अनुसार हटाए जाएंगे.”

उन्होंने यह भी दावा किया कि मौके पर मिला कुआं करीब 400 साल पुराना था और आरोप लगाया कि इस पर निर्माण करके कब्जा कर लिया गया था. सोम ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की पिछली सरकारों पर सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण होने देने का आरोप लगाया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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