Friday, 27 May, 2022
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IIM ग्रेजुएट, लालू यादव के चारा घोटाले का पर्दाफाश करने वाले अमित खरे बने मोदी के नए सलाहकार

झारखंड कैडर के 1985-बैच के आई.ए.एस अधिकारी, अमित खरे इससे पहले सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव और उच्च शिक्षा सचिव के रूप में कार्य कर चुके हैं. वह इसी साल सितंबर में सेवानिवृत्त हुए थे.

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नई दिल्ली: पूर्व उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे, जिन्होंने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को लागू करने में एक अहम् भूमिका निभाई और कई अन्य प्रमुख नीतिगत बदलाव लाए, को इस मंगलवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नए सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है.

कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा जारी एक आदेश के अनुसार झारखंड कैडर के 1985 बैच के आईएएस अधिकारी खरे को फ़िलहाल केंद्रीय स्तर के सचिव के पद और वेतनमान के साथ दो साल के लिए अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया है.

खरे, जिन्होंने पहली बार 2018-19 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सचिव के रूप में भी कार्य किया था, इस साल सितंबर में सेवानिवृत्त हुए है. उन्हें अप्रैल 2020 में फिर से सूचना और प्रसारण सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था.

इससे पहले उन्हें दिसंबर 2019 में उच्च शिक्षा सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था.

एनईपी में उनके द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका के अलावा, खरे ने अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट और चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (जिन्हें अगले शैक्षणिक सत्र 2022-23 से दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किया जाएगा) जैसे महत्वपूर्ण नीतिगत बदलावों लाने में भी अग्रणी भूमिका में थे.

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सेंट स्टीफंस कॉलेज से बीएससी (भौतिकी) में स्नातक की उपाधि प्राप्त खरे ने भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद से एमबीए की डिग्री भी प्राप्त की है.

जेएनयू फीस विवाद, बिहार का चारा घोटाला

खरे ने उच्च शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार एक बहुत ही महत्वपूर्ण समय में तब संभाला था जब छात्रावास शुल्क वृद्धि के मुद्दे पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र आंदोलनरत थे.

मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, उनके पूर्ववर्ती उच्च शिक्षा सचिव आर. सुब्रह्मण्यम के जेएनयू के मुद्दे को सुलझाने में असफल रहने के बाद उनका तबादला कर दिया गया था.

कार्यभार संभालने के तुरंत बाद खरे ने जेएनयू के कुलपति एम. जगदीश कुमार से मुलाकात की और एक महीने के भीतर ही शुल्क वृद्धि को आंशिक रूप से वापस ले लिया गया.

सूचना और प्रसारण सचिव के रूप में, उन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में जारी किए गए सूचना तकनीक के सम्बंधित नियमों (आई टी रूल्स) को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

1990 के दशक के अंत में, जब उन्हें पश्चिमी सिंहभूम (अब झारखंड में) के उपायुक्त के रूप में तैनात किया गया था, खरे ने अविभाजित बिहार में चारा घोटाले को उजागर करने में भी अहम् योगदान किया था.

27 जनवरी 1996 को, खरे ने चाईबासा में पशुपालन विभाग के एक कार्यालय पर छापा मारा, जिससे अंततः 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले का रहस्योद्घाटन हुआ. अंततः बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को इस मामले में दोषी ठहराया गया था.

साल 2017 में दिप्रिंट में प्रकाशित एक आलेख में खरे ने लिखा था, ‘मैंने अपने करियर या अपने परिवार या फिर अपने भविष्य के बारे में सोचने में अपना समय बर्बाद नहीं किया. अन्यथा, मैं चारा घोटाले की जांच शुरू करने का निर्णय ही नहीं ले पाता.’

उन्होंने कहा, ‘तो फिर मैंने ऐसा क्यों किया? इस प्रश्न का उत्तर बस यह है कि हम में से अधिकांश एक नया भारत बनाने के सपने के साथ ही सिविल सेवा कैरियर में शामिल हुए थे. और उपायुक्त, जो जिले का प्रशासनिक प्रमुख होता है, के रूप में यही मेरा कर्तव्य था.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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