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नयी दिल्ली, 27 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने शुक्रवार को कहा कि मीडिया किसी भी तरह की बाधा, भय या प्रभाव में अपनी भूमिका नहीं निभा सकता है और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे गंभीर खतरे प्रत्यक्ष ‘सेंसरशिप’ से नहीं बल्कि विनियमों, स्वामित्व नियमों, ‘लाइसेंसिंग’ कानूनों और आर्थिक नीतियों से उत्पन्न होते हैं।
‘‘आईपीआई इंडिया अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म 2025’’ के सम्मान समारोह में न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि प्रेस पर कब्जा करने के हालिया प्रयासों के पीछे न केवल आर्थिक आधार हैं बल्कि राजनीतिक पहलू भी शामिल हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना सितंबर 2027 में भारत की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश बनेंगी।
उन्होंने कहा, “एक मीडिया प्रतिष्ठान कानूनी रूप से सरकार की आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हो सकता है, फिर भी आर्थिक रूप से इस तरह से विवश हो सकता है कि ऐसी आलोचना महंगी पड़ जाए।”
सर्वोच्च न्यायालय में इस समय एकमात्र महिला न्यायाधीश ने कहा कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की दिलचस्प संवैधानिक स्थिति है और यह अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ए) – भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(जी) – किसी भी पेशे से जुड़ने या किसी भी व्यवसाय, व्यापार या कारोबार को चलाने की स्वतंत्रता के बीच परस्पर क्रिया से उभरता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को दो अलग-अलग संवैधानिक दृष्टिकोणों से संरक्षित किया जाता है। इस कार्यक्रम को सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एम.बी. लोकुर और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के प्रधान संपादक विजय जोशी ने भी संबोधित किया।
ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए ‘स्क्रॉल डॉट इन’ की वैष्णवी राठौर को आईपीआई-इंडिया पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार में 2 लाख रुपये नकद, एक ट्रॉफी और एक प्रशस्ति पत्र दिए जाते हैं।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) लोकुर ने पर्यावरण संबंधी मुद्दों को उजागर करने में मीडिया की भूमिका की सराहना की और कहा कि ऐसी खबरें लोगों में जागरूकता पैदा करती हैं जो संभवतः एक दबाव समूह बन सकते हैं जो अंततः अधिकारियों को हमारे पर्यावरण को संरक्षित और सुरक्षित रखने के लिए बाध्य कर सकते हैं।
जोशी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि ऐसे क्षण भी होते हैं जब संस्थाएं खुलकर बोलती हैं, और ऐसे क्षण भी होते हैं जब वे दृढ़ता से अपने रुख पर कायम रहती हैं।
उन्होंने कहा, “सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता दोनों काम करती है। वह कठिन प्रश्न प्रगति में बाधा डालने के लिए नहीं बल्कि उसे और परिष्कृत करने के लिए पूछती है।’’
जोशी ने कहा कि भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में, विकास को अक्सर अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों में वर्णित किया जाता है… विशालतम, सबसे तेज, सबसे बड़ी, लेकिन पत्रकारिता की शब्दावली अलग होती है।
उन्होंने कहा, “यह सवाल उठाती है कि विकास किस कीमत पर हो रहा है, और यह किसके लिए हो रहा है? और कौन तय करेगा कि क्या दिया जाना चाहिए?”
भाषा प्रशांत अविनाश
अविनाश
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