(मानसी जगानी)
नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) दिल्ली के झरोदा में 500 साल पुराना मेला, होली से पहले के दिनों में नारायणा में गूंजती ढोल की गूंज उस जीवंत अतीत के अंश हैं जिन्हें दिल्ली के बढ़ते शहरी फैलाव में विलीन होने से पहले अब एमसीडी द्वारा प्रलेखित किया जा रहा है।
दिल्ली नगर निगम द्वारा किए गए एक हालिया सर्वेक्षण में, दस्तावेज़ीकरण के लिए शहर के लगभग 360 शहरी गांवों में से 100 को चुना गया है। इससे उन गहरी जड़ों वाली परंपराओं का पता चलना शुरू हुआ है जो राष्ट्रीय राजधानी में गांवों के तेजी से हो रहे परिवर्तन के बावजूद जीवित हैं।
नगर निगम अपने पहले चरण के तहत, राजधानी में फैले 25 गांवों को कवर करेगा। इसमे से नजफगढ़ में छह, नरेला में सात, दक्षिण जोन में छह, मध्य जोन में दो, सिविल लाइन में तीन और करोल बाग में एक शामिल है।
इस सूची में बेगमपुर, महरौली, ढांसा, पालम, रानी खेड़ा, झरोदा, बुधपुर, ईसापुर और वज़ीराबाद आदि शामिल हैं।
एमसीडी के विरासत प्रकोष्ठ के चार सदस्यों वाली यह टीम प्रत्येक गांव में लगभग एक सप्ताह बिताती है, मौखिक कथाएं एकत्र करती है, भजन रिकॉर्ड करती है, रीति-रिवाजों का दस्तावेजीकरण करती है और पुरानी तस्वीरें इकट्ठा करती है।
बाद में इन दस्तावेजीकृत कहानियों को चांदनी चौक स्थित टाउन हॉल में एक व्यापक ‘नगर संग्रहालय’ परियोजना के हिस्से के रूप में सूचीबद्ध किया जाएगा।
लगभग पांच महीने पहले शुरू की गई यह पहल नगरपालिका के विरासत प्रकोष्ठ की अन्य परियोजनाओं के जारी रहने के कारण कुछ समय के लिए रोक दी गई थी।
हाल ही में पुनः शुरू हुई यह गतिविधि ना केवल निर्मित विरासत पर बल्कि अमूर्त सांस्कृतिक प्रथाओं – मौखिक इतिहास, रीति-रिवाज, मेले और सामुदायिक परंपराओं पर भी केंद्रित है, जिन्होंने सदियों से इन गाँवों की पहचान को परिभाषित किया है।
अब तक, सर्वेक्षण टीम ने महरौली, इसापुर और झरोदा को कवर कर लिया है, और वर्तमान में ढांसा में काम जारी है।
एमसीडी के विरासत प्रकोष्ठ के कार्यकारी अभियंता संजीव सिंह ने कहा, “गांव तेजी से आधुनिक हो रहे हैं और ये कहानियां धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। हमारा ध्यान बुजुर्गों पर है, जो इन मौखिक परंपराओं को आगे बढ़ाने वाली आखिरी पीढ़ी हैं।”
उन्होंने कहा, “हमारी टीम अक्सर एक गांव में छह से सात बार जाती है। बुजुर्ग निवासी कभी-कभी लगातार दो से तीन घंटे तक कहानियां सुनाते हैं।”
सर्वेक्षण के शुरुआती निष्कर्षों से एक समृद्ध सांस्कृतिक परिदृश्य का पता चलता है, जहां रीति-रिवाज, लोककथाएं और सामुदायिक स्मृतियां दैनिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
उदाहरण के लिए, नारायणा गांव में, होली से पहले का उत्सव नगाड़ों के समान बड़े ढोल के इर्द-गिर्द केंद्रित एक विशिष्ट संगीत परंपरा से चिह्नित होता है।
एमसीडी के विरासत अनुसंधान सहायक उमेश कुमार ने बताया, ‘त्योहार से लगभग 15 से 20 दिन पहले, विभिन्न समुदायों के युवा हर शाम अपने-अपने ढोल बजाने का अभ्यास करने के लिए इकट्ठा होने लगते हैं। होलिका दहन की रात, अधिकतर गांवों के विपरीत जहां कई होलिका जलायी जाती हैं, नारायणा में पूरे समुदाय के लिए एक ही होलिका जलायी जाती है। फिर सभी मोहल्लों के निवासी अपने-अपने ढोल लेकर उस स्थान पर एकत्रित होते हैं और साझा सांस्कृतिक लय का एक सशक्त प्रदर्शन करते हुए एक साथ प्रस्तुति देते हैं।
उन्होंने दिल्ली-हरियाणा सीमा पर नजफगढ़ और बहादुरगढ़ के बीच स्थित झरोदा गांव के बारे में भी बात की। कुमार ने कहा, ‘‘इस गांव में बाबा हरिदास मेला लगता है, जो सदियों पुराना मेला है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत 400 से 500 साल पहले हुई थी। बाबा हरिदास मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस मेले में देश भर से श्रद्धालु आते हैं।’’
भाषा अमित मनीषा
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