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Monday, 16 February, 2026
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POSH कानून लागू करने में कई राज्य पीछे, सुप्रीम कोर्ट ने तय की 3 हफ्ते की डेडलाइन

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में रखे गए डेटा से पता चला कि कई राज्यों ने अभी तक इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी का गठन सुनिश्चित नहीं किया है. शीर्ष अदालत ने 2023 में प्रभावी लागू करने के निर्देश दिए थे.

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नई दिल्ली: राज्यों को 13 साल पुराने प्रिवेंशन ऑफ सेक्शुअल हैरेसमेंट (POSH) कानून को पूरी तरह लागू करने के दो अहम फैसले मिलने के बावजूद, राज्य अभी भी इसे प्राइवेट और सरकारी संस्थानों में सख्ती से लागू करने में संघर्ष कर रहे हैं.

वर्कप्लेस पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) या POSH कानून एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसे वर्कप्लेस पर महिलाओं के लिए सुरक्षित और संरक्षित माहौल बनाने के लिए लागू किया गया था.

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में रखे गए डेटा के अनुसार, कई राज्यों ने अभी तक इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) का गठन सुनिश्चित नहीं किया है, जो कानून के तहत वर्कप्लेस पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों को सुनने और फैसला करने के लिए ज़रूरी है.

अदालत की सहायता कर रहीं अमिकस क्यूरी वकील पद्मा प्रिया द्वारा तैयार स्टेटस रिपोर्ट से पता चलता है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, असम, बिहार और राजस्थान में सभी सरकारी और निजी संस्थानों में आईसीसी का गठन कर दिया गया है.

सुप्रीम कोर्ट के दिसंबर 2024 के फैसले के अनुसार, राज्यों को जिला सर्वे पूरा करना था और यह पता लगाना था कि जिन संस्थानों में आईसीसी नहीं है, वहां इसे बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं.

अमिकस की रिपोर्ट से पता चलता है कि यह प्रक्रिया छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, पंजाब, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पूरी हो चुकी है. जबकि महाराष्ट्र, नागालैंड, पंजाब के दो जिलों, तेलंगाना और अरुणाचल प्रदेश में यह सर्वे अभी जारी है.

अरुणाचल प्रदेश और चंडीगढ़ में सभी सरकारी संस्थानों में आईसीसी की सूचना जारी कर दी गई है, लेकिन निजी संस्थानों में यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है.

यह स्टेटस रिपोर्ट 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार दाखिल की गई थी. याद रहे कि शीर्ष अदालत ने 2023 में कानून के लागू करने में गंभीर कमियों को उजागर करने के बाद राज्यों को विस्तृत निर्देश दिए थे.

दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर अपनी चिंता दोहराई और राज्यों द्वारा पालन की निगरानी शुरू की.

अमिकस की रिपोर्ट ने अदालत को यह भी बताया कि दो राज्यों को छोड़कर बाकी सभी ने नोडल अधिकारियों की नियुक्ति कर दी है. जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश ने इस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है. सिक्किम ने पक्योंग और ग्यालशिंग जिलों में नोडल अधिकारी नियुक्त नहीं किए हैं.

POSH कानून की धारा 6(2) के तहत, जिला अधिकारी को हर ब्लॉक, तालुका, तहसील (ग्रामीण/जनजातीय) और वार्ड/नगरपालिका (शहरी) में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होता है. ये अधिकारी यौन उत्पीड़न की शिकायतें प्राप्त करने और सात दिनों के भीतर लोकल कमेटी को भेजने के लिए जिम्मेदार होते हैं.

यह प्रावधान असंगठित क्षेत्र या छोटे संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं के लिए आसान शिकायत व्यवस्था सुनिश्चित करता है और ग्रामीण, जनजातीय और शहरी क्षेत्रों की महिलाओं को न्याय दिलाने का उद्देश्य रखता है.

कानून के अनुसार, अगर किसी संस्थान में आईसीसी नहीं बना है या शिकायत नियोक्ता के खिलाफ है, तो महिला नोडल अधिकारी के पास जा सकती है. नोडल अधिकारी को सात दिनों के भीतर शिकायत लोकल कमेटी को भेजनी होती है.

असंगठित क्षेत्र में कानून के कम पालन को देखते हुए, अमिकस ने अदालत से अनुरोध किया कि राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे नोडल अधिकारियों और लोकल कमेटी की जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालें और SHe-Box पोर्टल पर भी अपलोड करें.

रिपोर्ट में कहा गया कि राज्यों ने SHe-Box को बढ़ावा देने के कदम बताए हैं, लेकिन यह नहीं बताया कि इस पोर्टल को सभी के लिए आसानी से उपलब्ध और समान रूप से उपयोगी कैसे बनाया गया है, जहां महिला सीधे शिकायत दर्ज कर सके.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2017 में शुरू किया गया SHe-Box पोर्टल हर महिला कर्मचारी को, चाहे वह किसी भी संस्थान में काम करती हो, एक ही जगह शिकायत करने की सुविधा देता है. यह शिकायत की स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को भी ट्रैक करता है.

स्टेटस रिपोर्ट में दिए गए डेटा पर ध्यान देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते सुनवाई के दौरान नियमों का पालन नहीं करने वाले हर राज्य पर 5000 रुपये का जुर्माना लगाया और सर्वे पूरा करने और सभी संस्थानों में आईसीसी शुरू करने के लिए तीन हफ्ते की समयसीमा तय की.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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