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Friday, 30 January, 2026
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छावला सामूहिक दुष्कर्म, हत्या मामले में बरी व्यक्ति तिपहिया चालक की हत्या के मामले में गिरफ्तार

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नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) दिल्ली पुलिस ने द्वारका सेक्टर 14 क्षेत्र में एक ऑटोरिक्शा चालक की हत्या करने के आरोप में दो लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें से एक व्यक्ति को हाल में उच्चतम न्यायालय ने 2012 के छावला सामूहिक दुष्कर्म एवं हत्या के मामले में बरी किया था। अधिकारियों ने शनिवार को यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि गिरफ्तार लोगों की पहचान विनोद और पवन के रूप में हुई है।

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, विनोद हाल में जेल से रिहा हुआ था, जहां वह दिल्ली के छावला इलाके में 19 वर्षीय एक युवती से सामूहिक बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में करीब 10 साल से बंद था।

मुनिरका निवासी 44 वर्षीय अनार सिंह की 26 जनवरी को द्वारका के सेक्टर 13 में चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई थी। उसके गले पर चाकू से वार के निशान थे।

पुलिस ने बताया कि आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि ऑटोरिक्शा में चढ़ने के बाद उन्होंने द्वारका पहुंचने पर चालक से लूटपाट का प्रयास किया और जब ऑटो चालक ने इसका प्रतिरोध किया, तो उन्होंने उसे चाकू घोंप दिया तथा वहां से फरार हो गए।

उच्चतम न्यायालय ने सात नवंबर को छावला मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के 26 अगस्त, 2014 के आदेश को रद्द करते हुए विनोद और दो अन्य को बरी कर दिया था। उच्च न्यायालय ने इन लोगों को निचली अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा था।

छावला मामले में अपहरण के तीन दिन बाद युवती का क्षत-विक्षत शव मिला था। युवती गुरुग्राम के साइबर सिटी इलाके में काम करती थी और उत्तराखंड की निवासी थी।

आरोपियों को बरी करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का कई हलकों में विरोध हुआ था और दिल्ली सरकार ने शीर्ष अदालत से पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा था कि यह अपराध ‘दुर्लभ में भी दुर्लभतम’ की श्रेणी में आता है।

शीर्ष अदालत के फैसले के खिलाफ मृतका के पिता द्वारा दायर याचिका सहित कई पुनर्विचार याचिकाएं भी दायर की गई हैं।

दिल्ली सरकार की पुनर्विचार याचिका में आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने चलती कार में कई घंटों तक युवती के साथ बलात्कार किया और क्रूरता की तथा अंत में हरियाणा के झज्जर के पास एक खेत में भी दुराचार जारी रखा।

इसमें कहा गया है, ‘उन्होंने युवती को क्रूरता के साथ सामूहिक बलात्कार करके ही चोट नहीं पहुंचाई, बल्कि उसके निर्जीव शरीर पर भी अपनी पाशविकता जारी रखी, जिसके परिणामस्वरूप पोस्टमॉर्टम में गंभीर चोटें आईं, विशेष रूप से यौन अंगों पर।’

शीर्ष अदालत ने तीनों दोषियों को बरी करते हुए कहा था कि कानून अदालतों को नैतिक विश्वास या केवल संदेह के आधार पर किसी आरोपी को दंडित करने की अनुमति नहीं देता है।

वर्ष 2014 में, एक निचली अदालत ने मामले को ‘दुर्लभ में भी दुर्लभतम’ करार देते हुए तीनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने इस आदेश को बरकरार रखा था।

पुलिस ने कथित रूप से अपराध में शामिल तीन लोगों को गिरफ्तार किया था और दावा किया था कि उनमें से एक ने युवती द्वारा उसका प्रस्ताव ठुकराए जाने की वजह से बदला लेने के लिए घटना को अंजाम दिया।

भाषा नेत्रपाल दिलीप

दिलीप

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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