| Photo: ANI
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नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले की एक आदिवासी लड़की 16 वर्षीय पद्मा मेद अपने परिवार की पहली डॉक्टर बनने के सपने की मंजिल से बस कुछ ही कदम दूर थी, पर एक ‘सर्वर क्रैश’ ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

पद्मा ने मेडिकल के लिए दी जाने वाली राष्ट्रीय पात्रता कम प्रवेश परीक्षा उर्फ़ नीट (एनईईटी) में 720 में से 408 अंक प्राप्त किए, जो इस वर्ष अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में कटऑफ निर्धारित 113 अंक से कहीं अधिक है.

पद्मा दंतेवाड़ा के उन 11 आरक्षित वर्ग के छात्रों में से एक हैं जिन्होंने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए नीट परीक्षा उत्तीर्ण की है, लेकिन राज्य की काउंसलिंग सूची में आने से चूक गई हैं.

इसका कारण: काउंसलिंग सत्रों के लिए उनके पंजीकरण फॉर्म समय पर छत्तीसगढ़ शिक्षा निदेशालय की वेबसाइट पर अपलोड नहीं किए गए थे. छात्रों को 6 नवंबर से काउंसलिंग के लिए पंजीकरण करना था. फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख 14 नवंबर थी.

माता-पिता और बच्चों ने फोन के माध्यम से दिप्रिंट को बताया कि चूंकि वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि प्रक्रिया कैसे काम करती है, इसलिए 2011 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्थापित ‘छू लो आसमान’ कोचिंग संस्थान के अधिकारियों ने मदद की पेशकश की थी.

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नीट पास करने वाली आदिवासी छात्रा पीयूषा वेक के पिता मद्दा राम वेक ने दिप्रिंट को बताया कि ‘छू लो आसमान’ में, जहां सभी 11 छात्र अध्ययनरत थे, शिक्षकों ने परिवारों को आश्वासन दिया था कि वे पंजीकरण फॉर्म जमा करेंगे.

‘हम कार्यालय में (दंतेवाड़ा में) 13 नवंबर को यह पूछने के लिए आए कि क्या पंजीकरण किया गया था और उन्होंने कहा कि राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय काउंसलिंग सत्र के लिए भी फॉर्म जमा कर दिया गया है’ वेक ने बताया, ‘लेकिन जब हमें पहली राज्य सूची में हमारे बच्चों के नाम नहीं मिले, तो हमें बताया गया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सर्वर काम नहीं कर रहा था.’

राज्य में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए दूसरे दौर की काउंसलिंग के लिए छात्र नए सिरे से पंजीकरण कराने के लिए भी पात्र नहीं हैं, क्योंकि पहली सूची में केवल फॉर्म भरने वाले और चयनित नहीं होने वालों को ही दूसरे दौर में कॉलेज आवंटित किया जाएगा.

‘अगर उन्होंने हमें इस सर्वर समस्या के बारे में पहले बताया होता, तो हम कोई और रास्ता ढूंढ़ते’ मद्दा राम ने दिप्रिंट को बताया, ‘यह साबित करता है कि ये लोग नहीं चाहते कि हम आदिवासियों के बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बनें. वे आदिवासियों के लिए लाभ की बात करते हैं लेकिन जब करने की बात आती है तो वे इसे लागू नहीं करते हैं.’

दंतेवाड़ा के जिला मजिस्ट्रेट दीपक सोनी ने दिप्रिंट को बताया कि प्रशासन छात्रों के संपर्क में है और बच्चों की राष्ट्रीय काउंसलिंग सूची के लिए पंजीकरण कराने में मदद की गयी है. उन्होंने दावा किया कि मामले को सुलझा लिया गया है और बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार मार्गदर्शन दिया जा रहा है.

‘कुछ सर्वर समस्या थी, लेकिन हम सीधे परामर्शदाताओं को दोष नहीं दे सकते. काउंसलर भी पिछले 8 सालों से अपना काम कर रहे हैं और ऐसा पहली बार हुआ है’ सोनी ने फोन पर दिप्रिंट को बताया. ‘हालांकि, हमने उन्हें कर्तव्य से मुक्त कर दिया है और प्रशासन बच्चों की मदद करने के लिए सभी विकल्पों की खोज कर रहा है. हमने राष्ट्रीय काउन्सलिंग के दूसरे दौर के दौरान बच्चों को पंजीकृत किया है’.

दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी राजेश कर्मा ने भी कहा कि प्रशासन इस मामले को देख रहा है और आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी गई है. ‘जिला मजिस्ट्रेट ने लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था. हमने कोचिंग संस्थान के शिक्षक और ऑपरेटर को निलंबित कर दिया है.’


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अधर में लटके सपने

बच्चों का नाम राष्ट्रीय काउंसलिंग सूची में दर्ज करा दिया गया है, लेकिन उनका मानना है कि उन्हें केंद्रीय स्तर पर सीटें मिलने की सम्भावना कम है. उनकी सारी उम्मीदें राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों पर टिकी हुईं थीं.

इन 11 बच्चों में से सात लड़कियां हैं और चार लड़के हैं. इनमें से आठ बच्चे अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं, दो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के हैं और एक अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से है.

आठ आदिवासी बच्चों का नाम आसानी से राज्य की पहली लिस्ट में शामिल हो जाता क्योंकि एसटी कट-ऑफ इस वर्ष 113 थी.

पद्मा मेद ने 408 अंक हासिल किए थे, वहीं पीयूषा वेक ने 391 अंक, पिंटू वेक ने 346 अंक, महेश कश्यप (339), इंदू (309), आरती नेताम (301), जयंत कुमार (291) और ऐश्वर्या नाग ने (248) अंक हासिल किए थे.

15 नवंबर को जारी राज्य सूची में, 775 एसटी छात्रों को जगह मिली. इनमें से उच्चतम अंक 520 थे और सबसे कम स्कोर 118 था. छत्तीसगढ़ में छह मेडिकल कॉलेज और कुल 476 सीटें हैं, जिनमें से 146 एसटी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं.

तीन अन्य आरक्षित वर्ग के छात्रों ने भी कटऑफ से ज्यादा अंक हासिल किये थे. ओबीसी उम्मीदवार सुधीर कुमार रजक ने 502 अंक हासिल किए, हर्ष सागर (एससी) ने 265 अंक हासिल किए, जबकि अनीता (ओबीसी) ने 245 अंक हासिल किए. ओबीसी और एससी कट-ऑफ भी इस वर्ष 113 थी.

माता-पिता, प्रभावित बच्चे स्वीकार करते हैं कि राष्ट्रीय परामर्श सत्र में उनके लिए अब मेडिकल सीटें हासिल करना मुश्किल होगा.

पीयुषा वेक ने कहा, ‘हम राष्ट्रीय काउंसलिंग सूची में एक अच्छे कॉलेज की उम्मीद नहीं कर रहे हैं क्योंकि हमारे अंक उस हिसाब से उतने अच्छे नहीं हैं.’

उन्होंने कहा, ‘मैं बहुत निराश हूं कि ऐसा हुआ है. मैं पहली काउंसलिंग में ही एक अच्छा कॉलेज पाने की उम्मीद कर रही थी. लेकिन पंजीकरण समय से न होने के कारण हम मौका चूक गए. अगर मैं फिर से तैयारी करने का फैसला करती हूं तो मेरे जीवन का एक और साल बेकार चला जाएगा.’

दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी राजेश कर्मा ने माना कि यह एक कठिन स्थिति है, लेकिन कहा कि कुछ छात्रों को पशु चिकित्सा विज्ञान या आयुष पाठ्यक्रम का अध्ययन करने का विकल्प प्रदान किया जा रहा है. ‘उनमें से कुछ ने एक और वर्ष के लिए तैयार होने पर सहमति व्यक्त की है’ उन्होंने दावा किया. ‘हम फिर से तैयारी करने वाले छात्रों की मदद करने के लिए सभी सुविधाएं प्रदान करेंगे.’

इस बीच, माता-पिता पूरी स्थिति से नाखुश हैं.

‘अगर हमारे बच्चे एमबीबीएस सीट के लिए सक्षम हैं तो उन्हें बीडीएस या आयुष सीट क्यों लेनी चाहिए?’ पीयूषा के पिता मद्दा राम वेक ने कहा. ‘उन्होंने कोविड लॉकडाउन और ऑनलाइन कक्षाओं के बावजूद कड़ी मेहनत की. हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे बच्चे डाक्टरी की परीक्षा देंगे और डाक्टर बन पायेंगे. अब हमारे साथ यह अन्याय क्यों?’

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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2 टिप्पणी

  1. हमेशा कोइ ना कोइ द्रोणाचार्य बन कर एकलव्य का अगुठा काट लेता है। और फिर ये तो इक्कीसवीं सदी है अब तो पग पग पर द्रोणाचार्य बढे़ है अगुठा काटने के लिए।

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