Friday, 27 May, 2022
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जो शहरों में कमाया वहीं गंवा कर मजदूर लौट रहे हैं अपने घर, कहा- भूखे मरेंगे लेकिन परिवार तो साथ होगा

मुंबई में रह रहे एक प्रवासी मजदूर पति-पत्नी सारी जमा पूंजी खत्म होने के बाद एक ऑटो से तीन अन्य लोगों (प्रवासी मजदूरों) के साथ उत्तर प्रदेश के बस्ती के लिए निकले, वहीं राजस्थान ने प्रवासी मजदूरों ने एक प्राइवेट बस ही अपने गांव के लिए कर ली.

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गोरखपुर: कोविड-19 के कारण चल रहे देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से उत्तर भारत के कई राज्यों से लाखों प्रवासी मजदूर यूपी और बिहार में अपने घरों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. ये मजदूर अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से अलग-अलग साधनों का इस्तेमाल कर घर जा रहे हैं. जैसे कई मजदूर पैदल ही निकल पड़े हैं, जिनके पास साइकिल है वो उसी पर पैडल मारता घर पहुंचने की जुगत में चला जा रहा है, जो लोग प्राइवेट बसों का खर्चा वहन कर सकते हैं उन्होंने प्राइवेट बसें बुक कर ली हैं और कुछ लोग अपने ठेले और ऑटो से भी यात्रा कर रहे हैं. लेकिन ज्यादातर मजदूर मेट्रो सिटीज से हजारों किलोमीटर की यात्रा तय कर रहे हैं.

बस अब घर जाना है

लखनऊ-गोरखपुर हाईवे पर हमने एक ऐसे ही पति-पत्नी से बात की जो मुंबई से अपनी ऑटो से चार दिन पहले चले थे. ये लोग यूपी के बस्ती जिले के रहने वाले हैं और जैसे-तैसे घर पहुंचना चाहते हैं. ऑटो में उनके अलावा तीन लोग और थे. एक ऑटो चालक और दो अन्य सवारी. पैसे की कमी और खाने के लाले पड़ने के बाद इन सबने अपने-अपने घर जाने का निर्णय लिया और शहर छोड़कर चले आए.

दिनेश जयसवाल और उनकी पत्नी मैथिली की शादी आठ साल पहले हुई थी. दिनेश दस साल में मुंबई में रहकर ग्लास कटिंग की फैक्टरी में काम करते थे. दिप्रिंट से बात करते हुए मैथिली कहती हैं, ‘हमने रोटी-भाजी पैक की थी लेकिन वो दो दिन में ही खत्म हो गई. उसके बाद हम रास्ते में मिलने वाले खाने पर ही आश्रित हैं. मेरी सास घर पर अकेली हैं. मेरे पति के पास भी अब कोई काम नहीं बचा है. मुंबई में रहकर भूखों मरने से क्या फायदा है.’


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मैथिली एक चमकीली साड़ी पहनकर ससुराल के लिए मुंबई से निकली थीं. उन्होंने घर से निकलने से पहले नेल पॉलिश लगाई थी और नए कड़े (चूड़ियां) भी पहनी थीं. वो बताती हैं कि वो रात को पेट्रोल पंप या फिर खाली पड़े पार्कों में ही सोती हैं. उनके पति दिनेश बताते हैं, ‘जबसे लॉकडाउन हुआ है तबसे ही मेरे पास कोई काम नहीं बचा है. जो बचत की थी वो भी खत्म हो गई. अब घर जाकर ही सोच पाएंगे कि कैसे आजीविका का जुगाड़ हो पाएगा. फिलहाल दिमाग में एक ही बात घूम रही है कि घर जाना है.’

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इस दंपत्ति के साथ बस्ती जिले के ही गणेश भी आ रहे थे. वो हमें बताते हैं कि वो 16 मार्च को अपनी बहन को उनके ससुराल छोड़ने मुंबई गए थे लेकिन फिर 24 मार्च के बाद लगे लॉकडाउन के बाद वहीं फंस गए. वो बताते हैं, ‘मेरी बहन अब मुंबई में है लेकिन उनके पति खलीलाबाद में हैं. वो यहां कुछ काम करने के लिए आए थे लेकिन वापस नहीं जा सके. अब परिवार को देखने के लिए हमें आना पड़ा.’ गणेश बस्ती में एक ठेला चलाते हैं. उनकी बहन के पति मुंबई में ग्लास कटिंग फैक्टरी में काम करते हैं.

गरीब कोरोना से नहीं भूख से मर जाएगा

हाईवे पर जाते हुए हमें हजारों मजदूर ट्रकों की छतों पर बैठकर जाते हुए मिले. इनमें से बहुत से मजदूर 500 से 700 किलोमीटर की दूरी अपनी साइकिल पर पूरी कर चुके थे. लेकिन फिर ट्रक वालों ने उनकी मदद की.


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दिल्ली के कापसहेड़ा में टेलरिंग का काम करने वाले छह लोगों के एक ग्रुप से भी दिप्रिंट ने बात की. वो बताते हैं कि उनके मकान मालिक उन्हें किराए के लिए परेशान करने लगे थे और आखिरकार मजबूरी में उन्हें अपने कमरे छोड़कर 6 मई को निकलना पड़ा. इस ग्रुप के रूस्तम मियां कहते हैं, ‘मेरे कुनबे में छह लोग हैं और उनका पेट पालने वाला मैं इकलौता हूं. लेकिन समय इतना मुश्किल चल रहा है कि राजधारी छोड़कर जाना पड़ रहा है. अगर गांव में काम भी नहीं मिला तो भी ठीक है कम से कम परिवार का साथ तो होगा. शहर में तो लाला कमरे का पांच हजार रुपए का किराया मांग रहा था. अब पैसे नहीं थे तो कोई चारा ही नहीं बचा, पैदल चलने के अलावा.’

रूस्तम आरोप लगाते हैं कि खाना बांटा भी जा रहा है तो उन तक नहीं पहुंच पा रहा है. वो आखिरी में जोड़ते हैं, ‘मुझे लगता है कि गरीब आदमी कोरोना से मरे ना मरे लेकिन भूख से तो मर ही जाएगा.’

60 वर्षीय अब्दुल रहमान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वो बताते हैं, ‘हम रुक जाते तो भूख से मरने के बाद लाशें ही मिलतीं. मैं भी कम से कम 600 किलोमीटर साइकल चलाते हुए आया हूं. बाराबंकी आकर मुझे ट्रक मिला है.’

इस ट्रक पर सवार 20 लोगों में से अमरूद्दीन भी एक प्रवासी मजदूर हैं. वो बताते हैं, ‘पिछले दस दिन से नमक रोटी खा-खाकर परेशान हो गए थे. और फिर नमक-रोटी मिलना भी बंद हो गया था. हम छह लोग एक ही कमरे में रह रहे थे. अगर हम में से एक को भी कोरोना हो गया होता तो बाकी भी बच नहीं पाते. इसलिए हमने अपनी साइकिल उठाई और चल पड़े. हम सोच रहे थे कि अगर छह के छह घर नहीं पहुंच सके तो कम से कम 4-5 लोग तो अपने घर होंगे ही.’

इस ग्रुप के एक और सदस्य जीत कहते हैं कि भले ही घर पर कमाने के विकल्प कम हैं लेकिन हम अपने घर के सदस्यों के साथ गांव में साथ भूखे मरेंगे. वो बताते हैं, ‘गांव में भूखा मरना चलेगा लेकिन कम से कम अपनी मौत में अकेले तो नहीं होंगे. शहर में हमने पहले ही दुख झेल लिया है. इसलिए हम गांव भाग रहे हैं.’

परिवार वालों ने पैसे भेजे तो की प्राइवेट बस

जो प्रवासी मजदूर प्राइवेट बसों का किराया भर सकते थे वो प्राइवेट टूरिस्ट बसें बुक करके आ रहे थे. हम रास्ते में राजस्थान के अलवर से आ रही एक बस के मजदूरों से मिले. अलवर में मजदूरी करने वाले अब्दुल मलिक दिप्रिंट को बताते हैं, ‘मैं टिकट के लिए 3670 रुपए भरे हैं. हर सीट का किराया इतना ही है. पूरी बस का किराया एक लाख साठ हजार हो गया है. हम ज्यादा इंतजार नहीं कर सकते थे इसलिए हमने बस ही बुक कर ली.’ वो आगे बताते हैं, ‘हमारे परिवार वालों ने ये रुपए हमारे खातों में भेजे तब जाकर ये संभव हो पाया.


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अपनी दो साल की बच्ची को छाती से लगाए बैठी लुत्फा बताती हैं, ‘मां-पिताजी ने कुछ पैसे भेजे तब जाकर मैं ये टिकट खरीद पाई. मेरे दो छोटे बच्चे हैं. मैं और इंतजार नहीं कर सकती थी कि सरकार कुछ करे और हम घर जाएं.’ बस में बैठे सबीर अली सरकार के रवैये को लेकर कहते हैं, ‘हमने प्रसाशन से बात की थी कि हम मुश्किल से काम चला पा रहे हैं हम अब और नहीं रुक सकते और प्राइवेट बस का इंतजाम करके घर जाना चाहते हैं.’

इस बस के ड्राइवर अजीत कांत इन यात्रियों द्वारा बताई गई बातों की तस्दीक करते हुए कहते हैं, ‘हां. सबने किराया भरा है. सरकारी बस तो नहीं. अपना किराया तो भरना ही पडे़गा.’ ये कहकर वो बस स्टार्ट करके हाईवे पर निकल गए.

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