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Wednesday, 1 July, 2026
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WhatsApp के यूजरनेम फीचर पर भारत सरकार की नजर, साइबर अपराध बढ़ने की आशंका

वकील, इंडस्ट्री एक्सपर्ट और कानून लागू करने वाली एजेंसियां WhatsApp के यूज़रनेम फ़ीचर को अलग तरह से देख रही हैं. दिल्ली पुलिस की साइबर यूनिट के एक अधिकारी का कहना है, 'फ़ोन नंबर का इस्तेमाल करके लोगों को ट्रैक करना आसान था.'

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नई दिल्ली: भारत सरकार व्हाट्सएप के नए यूजरनेम फीचर को लेकर गंभीरता से जांच कर रही है क्योंकि उसे चिंता है कि इससे ऑनलाइन फ्रॉड और साइबर क्राइम बढ़ सकता है.

सरकारी सूत्रों ने बुधवार को बताया कि अगर यह फीचर डिजिटल सुरक्षा के लिए खतरा पाया गया तो मेटा के स्वामित्व वाले इस इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को नोटिस भेजा जा सकता है. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “व्हाट्सएप का नया यूजरनेम फीचर चिंता का विषय है क्योंकि इसका डिजिटल सुरक्षा पर असर हो सकता है और इससे ऑनलाइन फ्रॉड को बढ़ावा मिल सकता है. हम इसकी जांच कर रहे हैं और जरूरत पड़ी तो कंपनी को नोटिस भी भेज सकते हैं.”

व्हाट्सएप ने इस हफ्ते यूजरनेम रिजर्व करने की सुविधा शुरू की है, और इसका पूरा रोलआउट इस साल के अंत तक होने की उम्मीद है. जब यह फीचर पूरी तरह शुरू होगा, तो व्हाट्सएपयूजर बिना अपना फोन नंबर शेयर किए दूसरे यूजर को मैसेज कर सकेंगे.

मेटा की इस कंपनी ने सोमवार को ब्लॉग पोस्ट में कहा कि इस फीचर का मकसद लोगों को बिना निजी जानकारी दिए बातचीत करने की सुविधा देना है. “कभी-कभी आप सिर्फ बातचीत करना चाहते हैं बिना अपना नंबर दिए.”

लेकिन भारत में इसका असर अलग तरह से देखा जा रहा है क्योंकि यहां फोन नंबर बैंक अकाउंट, UPI ID, आधार और कई दूसरी चीजों से जुड़ा होता है और एक बार शेयर होने के बाद वापस नहीं लिया जा सकता. महिलाओं ने लंबे समय से शिकायत की है कि किसी अजनबी से एक व्हाट्सएप चैट के बाद अनचाही कॉल्स और मैसेज आने लगते हैं जिन्हें ब्लॉक करने से भी पूरी तरह रोका नहीं जा सकता. लेकिन इस फीचर का समय भी सवालों में है.

यह फीचर ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार ने लगभग 10 दिन पहले Telegram को अस्थायी रूप से ब्लॉक किया था, उन्हीं चिंताओं के कारण जिन पर अब यूजरनेम फीचर सवाल उठा रहा है. यानी एक मैसेजिंग ऐप में कितनी गुमनामी होनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर पुलिस कितनी आसानी से यूजर को ट्रैक कर सके.

वकील, उद्योग विशेषज्ञ और कानून प्रवर्तन एजेंसियां इस प्रस्तावित फीचर को अलग-अलग नजरिए से देख रही हैं.

यह कैसे काम करता है

अभी यूजर सिर्फ अपना यूजरनेम रिजर्व कर सकते हैं. यह फीचर धीरे-धीरे अलग-अलग क्षेत्रों में लागू होगा. यूजरनेम रिजर्व करने के लिए सेटिंग्स में जाकर प्रोफाइल पर जाना होगा और वहां ‘Create Username’ या जहां रोलआउट चल रहा है वहां ‘Reserve Username’ चुनना होगा. यूजरनेम 3 से 35 कैरेक्टर का होगा और इसमें छोटे अक्षर, नंबर, अंडरस्कोर और डॉट इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

बिजनेस और क्रिएटर्स अपने इंस्टाग्राम या फेसबुक वाले नाम को भी ले सकते हैं.

व्हाट्सएप का कहना है कि यह सिस्टम प्राइवेसी बनाए रखने के लिए बनाया गया है. “यहां कोई डायरेक्टरी नहीं होगी जिसे कोई ब्राउज़ कर सके और न ही कोई सुझाव होंगे,” कंपनी ने ब्लॉग पोस्ट में कहा.

इसने एक पेरेंट ग्रुप चैट का उदाहरण भी दिया. “आप अपने बच्चे की फुटबॉल टीम के पेरेंट ग्रुप में जुड़ना चाहते हैं लेकिन उन लोगों को अपना नंबर नहीं देना चाहते जिन्हें आप नहीं जानते.”

साथ ही कहा गया, “लोगों को आपसे पहली बार संपर्क करने के लिए आपका सही यूजरनेम जानना होगा.”

इसके अलावा एक ऑप्शनल “यूजरनेम की” यानी एक तरह का पिन भी होगा. “हमने एक ऑप्शनल यूजरनेम की बनाई है जिसे जानना जरूरी होगा ताकि कोई आपको मैसेज कर सके,” कंपनी ने कहा.

जिन लोगों के पास आपका नंबर पहले से सेव है, वे आपका नंबर पहले की तरह ही देख पाएंगे. व्हाट्सएप के अनुसार, फीचर आने के बाद “जब आप किसी व्यक्ति या बिजनेस को पहली बार मैसेज करेंगे, तो वे आपका फोन नंबर नहीं देख पाएंगे, अगर आपने अपना यूजरनेम चालू किया है.”

अगर कोई यूजर अपना यूजरनेम हटाता या बदलता है, तो वह 14 दिनों तक वापस लिया जा सकता है, उसके बाद वह दूसरों के लिए उपलब्ध हो जाएगा.

व्हाट्सएप की इस मामले में देरी

यह विचार नया नहीं है. दुबई आधारित मैसेजिंग ऐप Telegram शुरू से ही यूजरनेम की सुविधा देता है, जिसमें यूजर @हैंडल सेट कर सकते हैं, उसे नंबर की जगह शेयर कर सकते हैं और अजनबी भी उसे संपर्क कर सकते हैं.

अब यही खुलापन सरकार की चिंता का कारण बन गया है.

अमेरिका बेस्ड Signal ने 2024 में यूजरनेम जोड़े और फोन नंबर को डिफॉल्ट रूप से प्राइवेट कर दिया. वहां यूजर का नंबर उन लोगों को नहीं दिखता जिनके पास उसका कॉन्टैक्ट सेव नहीं है, और हैंडल बदले या हटाए जा सकते हैं.

एक बड़ा अंतर यह है कि Signal में यूजरनेम बदलने या हटाने के बाद उसे अकाउंट से जोड़ना आसान नहीं रहता. जबकि व्हाट्सएप में फोन नंबर मुख्य पहचान के रूप में बना रहता है और यूजरनेम उसके ऊपर एक लेयर की तरह होता है. यही फर्क भारतीय जांच एजेंसियां देख रही हैं.

टेलीग्राम का साया

16 जून को सरकार ने अस्थायी रूप से Telegram को ब्लॉक कर दिया था और Google तथा Apple को इसे अपने ऐप स्टोर से हटाने का आदेश दिया था. इसका कारण NEET-UG मेडिकल प्रवेश परीक्षा था, जिसे मई में रद्द कर दिया गया था क्योंकि जांचकर्ताओं को Telegram चैनलों के जरिए राजस्थान में फैले एक “गेस पेपर” में लीक हुए सवाल मिले थे. दो मिलियन से ज्यादा छात्रों को परीक्षा दोबारा देनी पड़ी. जांचकर्ताओं ने कहा कि ठगी नेटवर्क ने Telegram के मैसेज एडिटिंग टूल का गलत इस्तेमाल किया. उन्होंने परीक्षा से पहले खाली संदेश पोस्ट किए, बाद में उनमें असली सवाल जोड़ दिए, और स्क्रीनशॉट को पहले से लीक होने के सबूत के रूप में फैलाया.

गृह मंत्रालय (MHA) की एक रिपोर्ट, जो दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल की गई थी, में Telegram को “नया डार्क वेब” बताया गया और इसे निवेश घोटालों, रोमांस स्कैम, सेक्सटॉर्शन और डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड से जोड़ा गया.

Telegram के संस्थापक पावेल डुरोव ने कहा था कि यह बैन 150 मिलियन आम यूजर्स को सजा देता है और उन्होंने रिलाइंस पर आरोप लगाया कि उसने इसके लिए लॉबिंग की, और Meta की जियो में हिस्सेदारी की ओर इशारा किया. दिल्ली हाई कोर्ट ने इस ब्लॉक को बरकरार रखा और इसे सबसे कम प्रतिबंधात्मक विकल्प बताया.

व्हाट्सएप के यूजरनेम बदलाव पर एक वरिष्ठ MeitY अधिकारी, जिन्होंने नाम नहीं बताया, ने दिप्रिंट को कहा, “व्हाट्सएप को डरना चाहिए, हमें नहीं.”

यह केवल आपको Meta इकोसिस्टम तक सीमित करता है

टेक्नोलॉजी पॉलिसी वकील ध्रुव गर्ग, जो इंडियन गवर्नेंस एंड पॉलिसी प्रोजेक्ट से जुड़े हैं, ने कहा कि यह फीचर इसलिए फायदेमंद है क्योंकि यूजरनेम क्या नहीं कर सकता, यह महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, “व्हाट्सएप पर यूजरनेम क्या करता है? यह आपको सिर्फ Meta इकोसिस्टम तक सीमित करता है.” केवल यूजरनेम से किसी व्यक्ति को व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ट्रेस किया जा सकता है, लेकिन उससे बाहर नहीं, जबकि फोन नंबर यह सब कर देता है.

उन्होंने इसे महिलाओं के खिलाफ होने वाली परेशानियों से जोड़ा, जहां किसी व्हाट्सएप चैट से नंबर लेकर लोग बार-बार कॉल या मैसेज करते हैं, भले ही ब्लॉक कर दिया जाए. यूजरनेम इस रास्ते को बंद कर देता है. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इसे जरूरत से ज्यादा बड़ा बदलाव नहीं मानना चाहिए. “यह सिर्फ फोन नंबर के ऊपर एक और लेयर है,” उन्होंने कहा, और कहा कि अगर व्हाट्सएप नंबर की जगह पूरी तरह अनाम हैंडल ले आता तो प्राइवेसी रिस्क ज्यादा होता.

लेकिन इस लचीलापन के अपने नुकसान भी हैं. उनका पहला डर स्पूफिंग यानी किसी और की पहचान, नंबर या ईमेल को नकली तरीके से दिखाकर धोखा देना था. क्योंकि यूजरनेम बदले जा सकते हैं, कोई अपराधी किसी व्यक्ति के हैंडल की नकल करके बहुत मिलता-जुलता नाम बना सकता है और उसके कॉन्टैक्ट्स को संपर्क कर सकता है. “मैं ऐसा यूजरनेम बना सकता हूं जो मेरे दोस्त के यूजरनेम से बहुत मिलता-जुलता हो और फिर लोगों से जुड़ने की कोशिश करूं,” उन्होंने कहा. यह जोखिम तब सबसे ज्यादा होता है जब दो अजनबी पहली बार बात करते हैं और उनके पास किसी तरह का चैट इतिहास नहीं होता.

उनकी दूसरी चिंता ट्रैसेबिलिटी की थी. ट्रैसेबिलिटी का मतलब होता है किसी चीज़ की शुरुआत से अंत तक पूरी जानकारी को ट्रैक करने की क्षमता. एक यूजरनेम को अपराध के बाद बदला जा सकता है, जिससे स्कैम एक नाम से शुरू होकर दूसरे नाम पर खत्म हो सकता है और पीड़ित के पास ऐसा नाम रह जाता है जो कहीं नहीं पहुंचाता. उन्होंने कहा कि Meta शायद बैकएंड लॉग्स रखता होगा जो पुराने यूजरनेम को अकाउंट से जोड़ते हैं. ब्लॉकिंग पर उन्होंने कहा कि यह अपने आप काम करना चाहिए. “अगर मैं किसी यूजरनेम को ब्लॉक करता हूं, तो अंदर से नंबर भी ब्लॉक होना चाहिए, भले ही मुझे नंबर दिखे या न दिखे,” उन्होंने कहा.

हर कोई चिंतित नहीं है. एक इंडस्ट्री एक्सपर्ट, जिन्होंने नाम नहीं बताया, ने इस फीचर के सबसे अहम हिस्से यानी ऑप्शनल PIN की ओर ध्यान दिलाया.

“यह एक बहुत अच्छा नया फीचर है क्योंकि नाम के अलावा इसमें पिन भी चाहिए होता है. आप पिन सेट कर सकते हैं,” उन्होंने कहा. उन्होंने इसे Zoom से तुलना की, जहां रूम नंबर बिना पासकोड के बेकार होता है, और कहा कि कोई व्यक्ति इवेंट में अपना हैंडल शेयर कर सकता है बिना नंबर दिए. “तो ऐसा नहीं है कि कोई सीधे आपके DM में आकर हैलो बोल देगा. उसके पास आपका पिन भी होना चाहिए,” उन्होंने कहा. “मुझे नहीं लगता कि यह फ्रॉड या स्कैम का बड़ा रास्ता बनेगा.”

पुलिस क्यों चिंतित है

साइबर जांचकर्ताओं के मामले में चिंताएं हैं और उनका अनुभव Telegram के साथ इसकी वजह समझाता है.

दिल्ली पुलिस की IFSO (साइबर) यूनिट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि फोन नंबर पहले संदिग्धों को ट्रैक करने में आसान बनाते थे. “फोन नंबर से लोगों को ट्रैक करना आसान था क्योंकि वे आसानी से उपलब्ध होते थे, लेकिन अब सिर्फ यूजरनेम होना साइबर फ्रॉड के लिए बाधा बन सकता है, जबकि यह फ्रॉड पहले से ही और एडवांस हो रहा है.”

Telegram पर अधिकारी ने कहा: “किसी अकाउंट की जानकारी पाने का एकमात्र तरीका Telegram को लिखना होता है, और साइबर फ्रॉड बहुत तेजी से होते हैं. यह प्रक्रिया समय लेती है.”

साइबर फ्रॉड का वह केस जिसे अधिकारी बार-बार दोहरा रहे थे, वह है डिजिटल अरेस्ट, जो अब भारत के सबसे आम साइबर अपराधों में से एक है. अपराधी CBI, पुलिस या प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी बनकर पीड़ितों को घंटों तक वीडियो कॉल पर रखते हैं, नकली पुलिस स्टेशन बैकग्राउंड और फर्जी दस्तावेज दिखाते हैं, और अंत में उनसे पैसे ट्रांसफर करवाते हैं.

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल ने 2025 में 30,000 से ज्यादा डिजिटल अरेस्ट शिकायतें दर्ज कीं. इस स्कैम में पहचान बदलकर धोखा देना मुख्य तरीका है, इसलिए अधिकारी बिना नंबर और बदलने योग्य हैंडल्स को जोखिम मानते हैं.

अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के साइबर सेल के एक दूसरे अधिकारी ने कहा कि मौजूदा फीचर्स पहले से ही मामलों को धीमा कर देते हैं. disappearing messages और view-once photos समस्या हैं क्योंकि “सबूत रिकॉर्ड नहीं किए जा सकते, और साइबर फ्रॉड करने वाले इन खामियों का फायदा उठाते हैं.”

नए फीचर पर उन्होंने कहा: “अब अगर फीचर सिर्फ यूजरनेम की अनुमति देगा, तो लोगों के पास नकली और धोखाधड़ी वाले हैंडल होंगे. लोगों को ठगना आसान हो जाएगा.”

दोनों अधिकारियों ने वही बात कही जो अदालतों ने Telegram केस में कही थी. “व्हाट्सएप और Meta जांच जानकारी देने में Telegram से ज्यादा सहयोगी हैं,” एक ने कहा.

अभी यह सिर्फ रिजर्वेशन विंडो है. पूरा रोलआउट आने वाले महीनों में देश-दर-देश होने की उम्मीद है.

समृद्धि तिवारी के इनपुट्स के साथ.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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