नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के पदाधिकारी सुनील आम्बेकर ने बुधवार को कहा कि महिलाओं की भागीदारी के मुद्दे को भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखा जाना चाहिए, न कि पश्चिमी सोच के चश्मे से।
उन्होंने यहां एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में पुस्तक ‘शतायु संघ और महिला सहभागिता’ के विमोचन के अवसर पर कहा, ‘‘यह आरएसएस और महिलाओं का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि महिलाओं के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को ठीक से समझा नहीं गया है।’’
आरएसएस के राष्ट्रीय मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख आम्बेकर ने युवा पीढ़ी पर भरोसा जताते हुए कहा कि वे संतुलित निर्णय लेने की बेहतर स्थिति में हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी, जिसे लोग ‘जेन-जेड’ कहते हैं, अधिक जागरूक है क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया देखने का अवसर मिला है। वे भारत को देख रहे हैं, भारत के अतीत से परिचित हैं, दुनिया को देख रहे हैं, दुनिया के अतीत और वर्तमान को देख रहे हैं और इन सबकी तुलना कर रहे हैं। वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि किसने क्या हासिल किया है, किसने क्या खोया है और हमें क्या हासिल करना है।’’
आम्बेकर ने कहा कि भारत अपने मूल्यों के आधार पर अपना भविष्य निर्धारित करेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत में जो नया संयोजन बनेगा, वह ऐसा नहीं होगा जिसमें हमारी संस्कृति और परिवार बाजार और प्रौद्योगिकी के आधार पर आकार लेंगे। हम अपने मूल्यों और संस्कृति के अनुसार तय करेंगे कि हमें किस प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है।’’
आम्बेकर ने कहा कि महिलाएं पहले से ही समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं तथा उनकी भागीदारी और भी बढ़ेगी।
उन्होंने कहा, ‘‘वास्तविक सपना यह है कि पूरे भारत की महिलाएं जीवन और नेतृत्व के हर क्षेत्र में आत्मविश्वास के साथ, बिना किसी डर के और अधिक संख्या में आगे आएं।’’
उन्होंने कहा कि लिंग संबंधी कई पश्चिमी विचार पुरुषों और महिलाओं के बीच संघर्ष पर आधारित हैं।
आम्बेकर ने कहा, ‘‘उन समाजों में, समस्या को पुरुषों और महिलाओं के बीच संघर्ष के रूप में देखा जाता है और इसलिए, दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास किया जाता है।’’
आरएसएस के पदाधिकारी ने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण अलग है और इसमें पुरुषों और महिलाओं को समान और एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता है।
आम्बेकर ने कहा कि भारत में समस्याएं ज्ञान परंपराओं में आई रुकावटों और समय के साथ सामाजिक व्यवस्थाओं के कमजोर होने के कारण उत्पन्न हुईं।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारी समस्याएं तब उत्पन्न हुईं जब हमारी ज्ञान परंपराओं में व्यवधान आया, चाहे वह हमारी अपनी गलतियों के कारण हो या विदेशी आक्रमणों के कारण। इसलिए, हमारे समाधान बाहरी नहीं हो सकते। हमारे समाधान नैसर्गिक होने चाहिए।’’
आम्बेकर ने पारिवारिक जीवन में होने वाले बदलावों के बारे में कहा कि परिवारों के भीतर भूमिकाओं को समय के साथ समायोजित करने और मिलकर तय करने की आवश्यकता होगी।
उन्होंने कहा, ‘‘हो सकता है कि परिवार के लोगों को, पति-पत्नी को, बेटियों और बेटों वाले माता-पिता को, एक साथ बैठकर यह निर्णय लेना पड़े कि समय बदल गया है और काम का बंटवारा भी बदलेगा।’’
आम्बेकर ने इस मुद्दे को पुरुषों और महिलाओं के बीच की प्रतियोगिता के रूप में देखने के खिलाफ भी चेतावनी दी।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर हम इसे पुरुषों और महिलाओं के बीच प्रतिस्पर्धा मानकर समाधान खोजने की कोशिश करेंगे, तो हम कुछ चीजें हासिल कर सकते हैं, लेकिन हमें पारिवारिक शांति, स्नेह और सामाजिक मूल्यों की कीमत चुकानी पड़ेगी।’’
आरएसएस पदाधिकारी ने कहा कि आर्थिक प्रगति पारिवारिक जीवन की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘पारिवारिक जीवन की खुशियों की कीमत पर कोई भी आर्थिक या सभ्यतागत प्रगति हासिल नहीं की जा सकती।’’
आम्बेकर ने कहा कि आरएसएस और राष्ट्र सेविका समिति ने संगठन के शुरुआती वर्षों से ही महिलाओं की भागीदारी पर काम शुरू कर दिया था।
उन्होंने कहा, ‘‘आरएसएस ने अपने कार्य के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इसकी शुरुआत 1925 में नागपुर में हुई थी। कुछ ही वर्षों के भीतर, 1936 में, समिति का गठन हुआ। इसका कार्य केवल सार्वजनिक सभाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि दैनिक जीवन और पड़ोस के साथ जुड़ाव पर आधारित था।’’
आम्बेकर ने बताया कि सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. शोभा विजेंद्र द्वारा लिखित यह पुस्तक अधिक लोगों को राष्ट्र निर्माण में भाग लेने के लिए प्रेरित करेगी।
भाषा धीरज सुरभि
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