नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर (भाषा) विशेषज्ञों ने वायु प्रदूषण बढ़ने के कारण, खासकर हवा में मौजूद बेहद छोटे कणों (पीएम2.5) और धरातल के निकट मौजूद ओजोन गैस को देखते हुए भारत में ऐसे शोध की जरूरत पर जोर दिया है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि इससे कैंसर और विशेष रूप से पाचन तंत्र के कैंसर का कितना खतरा हो सकता है।
हाल के कुछ अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने और कैंसर का खतरा बढ़ने के बीच संबंध का पता चला है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने सावधान किया है कि इन अध्ययनों से केवल दोनों के बीच संबंध का पता चलता है और ये इस बात का प्रमाण नहीं हैं कि प्रदूषण से पाचन तंत्र का कैंसर होता है या कम उम्र के लोगों में इसके मामले बढ़ने की वजह प्रदूषण ही है।
इस मुद्दे पर 10 और 11 अक्टूबर को यहां सर गंगा राम अस्पताल और ब्रिटेन के द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से आयोजित पाचन तंत्र के कैंसर, खासकर ‘कोलोरेक्टल कैंसर’ पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चर्चा की गई।
सर गंगा राम अस्पताल के ट्रस्ट सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. डीएस राणा ने कहा कि अस्पताल और द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग चिकित्सा ज्ञान और कैंसर के इलाज के क्षेत्र में आपसी सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने कहा, ‘कैंसर एक जटिल चुनौती है, जिससे निपटने के लिए संस्थानों, अलग-अलग चिकित्सा विशेषज्ञों और देशों के बीच मिलकर काम करना जरूरी है। विशेषज्ञों को एक साथ लाकर और अनुभव साझा करने को बढ़ावा देकर हम कैंसर पर शोध बढ़ाने, बीमारी का जल्द पता लगाने और मरीजों के बेहतर इलाज के लिए नए अवसर उपलब्ध करा सकते हैं।’
सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष और सम्मेलन के आयोजन अध्यक्ष डॉ. श्याम अग्रवाल ने कहा कि अब कैंसर की रोकथाम पर चर्चा केवल तंबाकू, खानपान और जीवनशैली तक सीमित नहीं रह सकती।
उन्होंने कहा, ‘हमारे ओपीडी में अब पाचन तंत्र के कैंसर से पीड़ित 15 साल तक के मरीज भी आ रहे हैं। पांच साल पहले ऐसा बहुत कम होता था। हमें उस वातावरण पर भी ध्यान देना होगा, जिसमें लोग रहते हैं।’
अग्रवाल ने कहा, ‘हाल के अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने वायु प्रदूषण और कैंसर के बीच संबंध की जांच करने की जरूरत पर और बल दिया है। ओजोन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि आम तौर पर लोगों का ध्यान पीएम 2.5 और पीएम 10 पर रहता है, जबकि जमीन के पास बनने वाली ओजोन के खतरे पर कम चर्चा होती है। हमें यह समझने के लिए भारत से जुड़े और अधिक प्रमाण चाहिए कि इन प्रदूषकों का कितना योगदान है, खासकर उन शहरों में जहां हवा की गुणवत्ता लगातार खराब बनी रहती है।’
सर गंगा राम अस्पताल में सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, पाचन तंत्र और लिवर, अग्न्याशय तथा पित्त नली से जुड़े कैंसर की सर्जरी और लिवर प्रत्यारोपण विभाग के अध्यक्ष डॉ. सौमित्र रावत ने कहा कि कम उम्र के मरीजों में पाचन तंत्र के कैंसर का पता चलना ऐसे मामलों की व्यापक जांच की जरूरत को दर्शाता है।
उन्होंने कहा, ‘परिवार में कैंसर का इतिहास, आनुवंशिक कारण, खानपान, जीवनशैली, संक्रमण और पर्यावरण के संभावित प्रभावों सहित सभी पहलुओं पर उचित ध्यान देने की जरूरत है। हमें केवल संबंधों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय इन कारणों को समझने के लिए भारत में शोध को मजबूत करना चाहिए।’
रावत ने लगातार बने रहने वाले पाचन संबंधी लक्षणों को पहचानने, समय पर डॉक्टर से सलाह लेने और कैंसर के इलाज के लिए अलग-अलग चिकित्सा विशेषज्ञों की सेवाएं उपलब्ध कराने के महत्व पर भी जोर दिया।
द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के सलाहकार कोलोरेक्टल और लैप्रोस्कोपिक सर्जन सेल्वसेकर चेल्लैया ने कहा कि विशेषज्ञों के बीच सहयोग से इलाज से जुड़े फैसले बेहतर हो सकते हैं। साथ ही, इससे कैंसर की रोकथाम, बीमारी का जल्दी पता लगाने और लंबे समय तक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय कारकों पर और शोध को बढ़ावा मिल सकता है।
भाषा जोहेब शोभना
शोभना
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