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Friday, 6 March, 2026
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राजस्थान में सिलिकोसिस से जूझ रहे खनन मजदूरों को कल्याण बोर्ड का इंतजार

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जोधपुर, 11 मार्च (भाषा) सिलिकोसिस से तिल-तिल मर रहे राजस्थान के खनन मजदूर साल 2018 से अपनी समस्याओं के समाधान की मांग को लेकर संघर्षरत हैं, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिल सकी है।

सिलिकोसिस फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी है, जो श्वास प्रणाली में सिलिका के बारीक कणों के प्रवेश के चलते होती है। सिलिका रेत, और चट्टानों में पाया जाने वाला एक आम खनिज है। यह बीमारी मुख्य रूप से निर्माण और खनन क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों को होती है।

मजदूर ‘खदान श्रमिक कल्याण बोर्ड’ के गठन के लिए दबाव बना रहे हैं, लेकिन कार्य क्षेत्र में सुरक्षा उपायों के अभाव के बीच सिलिकोसिस से कई मजदूरों की मौत के बावजूद सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई है।

सरकार को उसके चुनावी वादे की याद दिलाने के लिए जोधपुर, नागौर और भीलवाड़ा के 30 श्रमिक ‘खान मजदूर एकता संगठन’ के बैनर तले जयपुर में 22 फरवरी से धरना दे रहे हैं।

‘खान मजदूर एकता संगठन’ के अभय सिंह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने भले ही कल्याण बोर्ड गठित करने की हमारी मांग स्वीकार कर ली थी और उसे अपने चुनावी घोषणापत्र में भी शामिल किया था, लेकिन ‘इस दिशा में अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है।’

वहीं, ‘खान मजदूर एकता संगठन’ से जुड़े ‘बराड़ खदान श्रमिक संघ’ के रामगोपाल ने कहा कि बीते कुछ वर्षों में खनन मंत्री को कई अभ्यावेदन भी दिए गए हैं, लेकिन इन पर कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई है।

रामगोपाल ने कहा, “राज्य सरकार ने अपनी तीसरी वर्षगांठ पर 70 फीसदी चुनावी वादे पूरे करने का दावा किया था। हालांकि, कल्याण बोर्ड के गठन के वादे को अधूरा छोड़ना, जिसके 25 लाख से अधिक लोगों के जीवन के लिए सीधे मायने हैं, बेहद आश्चर्यजनक और असंवेदनशील है।”

उन्होंने कहा कि खदान मजदूर खुद को ठगा-हुआ महसूस कर रहे हैं।

‘खान श्रमिक संरक्षण अभियान’ के प्रबंध न्यासी राणा सेनगुप्ता के मुताबिक, यदि बोर्ड का गठन किया जाता है तो यह न केवल उत्पीड़ित खदान श्रमिकों को मान्यता प्रदान करेगा, बल्कि उनके कल्याण के दरवाजे भी खोलेगा।

सेनगुप्ता ने कहा, “यह सिर्फ सरकार की इच्छा-शक्ति का मामला है। ‘भवन एवं निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड’ पहले से मौजूद है। खदान मजदूरों के लिए इसी तर्ज पर बोर्ड बनाना कोई बड़ा काम नहीं है।”

श्रमिक बोर्ड बनने पर खदान मालिकों और उसके कर्मचारियों का पंजीकरण कराना अनिवार्य हो जाएगा।

सेनगुप्ता ने कहा कि इससे मालिकों पर श्रमिकों के लिए सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने का दबाव बनेगा और धीरे-धीरे जानलेवा सिलिकोसिस के मामलों में कमी आने से इसका पूर्ण उन्मूलन सुनिश्चित हो सकेगा।

राज्य सरकार अक्टूबर 2019 में सिलिकोसिस प्रभावित श्रमिकों की मदद और बीमारी की रोकथाम के लिए एक नीति लेकर आई थी। हालांकि, यह नीति अभी भी पूर्ण कार्यान्वयन का इंतजार कर रही है।

सेनगुप्ता ने कहा, “इस नीति में सिलिकोसिस पीड़ित को तत्काल तीन लाख रुपये, जबकि उसकी मृत्यु की सूरत में आश्रितों को दो लाख रुपये की वित्तीय सहायता के अलावा मृतक की पत्नी को 1,500 रुपये की मासिक पेंशन देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि मुश्किल से 10 फीसदी पीड़ितों को यह सहायता मिली है।”

एक अनुमान के अनुसार, राजस्थान में सिलिकोसिस रोगी के रूप में 27,463 श्रमिकों की पहचान की जा चुकी है, जबकि 21,000 संदिग्धों में इसकी चिकित्सकीय पुष्टि होना बाकी है।

भाषा पारुल शोभना

शोभना

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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