Friday, 27 May, 2022
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2018 में सरकारी पैनल ने कहा था कि मिड-डे मील में नाश्ता शामिल कीजिए, 3 साल बाद भी नहीं हुआ अमल

2018 की रिपोर्ट में कहा गया था कि सरकारी स्कूलों में 38 प्रतिशत बच्चे, बिना नाश्ता किए कक्षाओं में आ जाते हैं, जिससे उनके फोकस पर असर पड़ता है. सरकार कहती है कि वो इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन उसके सामने वित्तीय संकट है.

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नई दिल्ली: 2018 में सरकार द्वारा नियुक्त एक कमेटी ने पता लगाया था कि सरकारी स्कूलों में 38 प्रतिशत बच्चे बिना नाश्ता किए कक्षाओं में आ जाते हैं, और मिड-डे मील स्कीम के तहत परोसा जाने वाला खाना, उनका दिन का पहला भोजन होता है. कमेटी ने तब सिफारिश की थी, कि स्कूलों में नाश्ता दिया जाना चाहिए.

लेकिन, तीन साल और एक सुधार के बाद भी, केंद्र सरकार ने अभी तक नाश्ते को स्कीम में शामिल नहीं किया है.

शिक्षा मंत्रालय ने पिछले हफ्ते मौजूदा मिड डे मील योजना में सुधार का ऐलान किया- जिसे अब ‘पीएम पोषण’ स्कीम कहा जाएगा- जिसके तहत प्री-स्कूल के बच्चों को भी इसके दायरे में लाया जाएगा.

स्कीम के बारे में बात करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पत्रकारों से कहा था, ‘मील स्कीम के तहत नाश्ते की अभी मंज़ूरी नहीं दी गई है, लेकिन हम सकारात्मक रूप से उस ओर बढ़ रहे हैं’.

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में भी, मील योजना के तहत बच्चों को नाश्ता दिए जाने की बात की गई है. पॉलिसी में कहा गया है कि ‘रिसर्च से पता चलता है कि पोषक नाश्ता करने के बाद, सुबह के घंटे ज्ञान से जुड़े विषयों की पढ़ाई के लिए विशेष रूप से उत्पादक हो सकते हैं, और इसलिए मिड डे मील के अलावा, सादा लेकिन स्फूर्तिदायक नाश्ता उपलब्ध कराने से इनका फायदा उठाया जा सकता है. जिन स्थानों पर गर्म भोजन मुमकिन नहीं है, वहां सादा लेकिन पौष्टिक भोजन, जैसे गुड़ मिली हुई मूंगफली या चना, और/या स्थानीय फल उपलब्ध कराए जा सकते हैं’.

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लेकिन, शिक्षा मंत्रालय के अधिकारिक प्रवक्ता ने, पीएम पोषण स्कीम में नाश्ता शामिल किए जाने में सरकार की असमर्थता के पीछे, ‘वित्तीय संकट’ का हवाला दिया.

प्रवक्ता ने दिप्रिंट को बताया, ‘अपनी मील स्कीम के अंतर्गत नाश्ता मुहैया कराने को लेकर, सरकार का रुख़ बहुत सकारात्मक है, लेकिन फिलहाल वो वित्तीय संकट का सामना कर रही है.’


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दिप्रिंट ने मंत्रालय के अधिकारिक संचार चैनल पत्र सूचना कार्यालय से, 2018 की रिपोर्ट के निष्कर्षों के बारे में टिप्पणी के लिए संपर्क किया, लेकिन इस रिपोर्ट के छपने तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.

2018 की स्टडी में क्या मिला

कमेटी की 2018 की रिपोर्ट में सिफारिश की गई, कि स्कूलों में बच्चों को नाश्ता दिया जाए, क्योंकि उनमें बहुत से बच्चे ख़ाली पेट कक्षाओं में आते हैं, और इसलिए वो पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पाते.

कमेटी के एक सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, ‘स्कूल में भोजन करने के लिए बच्चे दोपहर तक इंतज़ार करते हैं, जो उनका दिन का पहला भोजन होता है, और इससे उनके सीखने का स्तर बाधित होता है’.

कमेटी के सदस्यों के अनुसार, उन्हें पूरे भारत में स्कीम के कार्यान्वयन के अध्ययन का काम दिया गया था, और उन्होंने पाया कि उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़कर, देश के अधिकतर हिस्सों में ये अच्छे से काम कर रही है.

एक महामारी विज्ञानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण विशेषज्ञ लक्षमैया ने, जो मील स्कीम के सलाहकार का काम करते हैं, और कमेटी के सदस्य भी थे, दिप्रिंट को बताया: ‘हमारी स्टडी में पता चला कि देश के ज़्यादातर हिस्सों में, स्कीम अच्छे से लागू की जा रही है. स्कीम के ज़रिए स्कूलों में उपस्थिति, और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार, दोनों लक्ष्य हासिल किए जा रहे हैं’.

लक्षमैया ने कहा कि अपने सर्वे में कमेटी को सबसे चौंकाने वाला डेटा ये मिला, कि 38 प्रतिशत बच्चे बिना नाश्ता किए स्कूल आ जाते हैं, और फिर दोपहर के समय तक स्कूल में भोजन मिलने का इंतज़ार करते हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘हमारी सरकार से सिफारिश थी, कि उसे अपनी मील स्कीम के तहत बच्चों को नाश्ता भी देना चाहिए, और लगता कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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