नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने आई-पैक पर छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कथित तौर पर बाधा डालने के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका की स्वीकार्यता पर पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्ति को लेकर सवाल उठाते हुए बुधवार को कहा कि किसी भी संस्था को संविधान के तहत बिना उपाय के नहीं छोड़ा जा सकता।
पश्चिम बंगाल सरकार ने शीर्ष अदालत में ईडी की उस याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि बनर्जी और अन्य राज्य प्राधिकारियों ने धनशोधन जांच के सिलसिले में कोलकाता स्थित राजनीतिक परामर्श कंपनी ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आई-पैक) के कार्यालय में आठ जनवरी को छापेमारी के दौरान बाधा उत्पन्न की थी।
राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ को बताया कि ईडी कोई ‘न्यायिक व्यक्ति’ नहीं है, जिससे वह किसी राज्य के खिलाफ मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए उच्चतम न्यायालय में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर करने में सक्षम हो।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने राज्य सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान से कहा, ‘‘आपके अनुसार यदि ईडी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर नहीं कर सकती, तो निश्चित रूप से वह अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर नहीं कर सकती? फिर वे उपाय कहां से मांगेंगे? कोई शून्यता नहीं रह सकती। हमारा संविधान किसी भी संस्था को बिना उपाय के अस्तित्व में रहने की परिकल्पना नहीं करता।’’
न्यायमूर्ति मिश्रा ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में ईडी के पास क्या उपाय है और भविष्य में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होने पर क्या होगा।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ईडी का आरोप है कि राज्य की मुख्यमंत्री ने उनके काम में बाधा डाली। यह एक गंभीर मामला है। कल कोई दूसरा मुख्यमंत्री या राज्य प्राधिकार उनके काम में बाधा डाल सकता है। तब वे कहां जाएंगे?’
दीवान ने दलील दी कि ईडी कोई ‘न्यायिक व्यक्ति’ नहीं, बल्कि केंद्र सरकार का एक विभाग मात्र है और केवल भारत सरकार ही रिट याचिका दायर कर सकती है।
वरिष्ठ वकील ने कहा, ‘‘ईडी अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकती, अनुच्छेद 226 के तहत याचिका नहीं दायर कर सकती, अनुच्छेद 227 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकती और यहां तक कि किसी राज्य के खिलाफ वाद भी दायर नहीं कर सकती। इसका मतलब यह नहीं है कि इस स्थिति में उनके पास कोई उपाय नहीं है। भारत सरकार मुकदमा दायर कर सकती है। केंद्र सरकार आगे आकर अनुच्छेद 131 के तहत एक वाद दायर कर सकती है। किसी एक विभाग को अदालत के रिट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने की अनुमति देना संघीय ढांचे के लिए खतरा पैदा कर सकता है।’’
उन्होंने कहा कि कथित ‘‘शून्यता’’ ही वह कारण है, जिसके चलते इस मुद्दे पर एक वृहद पीठ द्वारा निर्णय लिये जाने की आवश्यकता है, अन्यथा इससे अनियंत्रित अंतर-सरकारी मुकदमेबाजी हो सकती है।
उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में, ईडी ने बनर्जी और उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया है, जिन्होंने एजेंसी के छापे में कथित तौर पर बाधा डाली थी।
ईडी अधिकारियों ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को चुनौती देते हुए एक अलग याचिका भी दायर की है।
दीवान ने दलील दी कि अनुच्छेद 32 का मूल आधार मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन है, जिनका दावा केवल व्यक्ति ही कर सकते हैं, चाहे वे प्राकृतिक हों या विधिक, और चूंकि ईडी इनमें से कोई भी नहीं है, इसलिए वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप नहीं लगा सकती।
उन्होंने कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) या अन्य संबंधित कानूनों के तहत ईडी को किसी पर मुकदमा करने का अधिकार नहीं मिलता, जबकि ऐसे संगठन जैसे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) स्पष्ट रूप से निकायों के रूप में बनाए गए हैं और उन्हें मुकदमा करने तथा मुकदमे का सामना करने का अधिकार है।
दीवान ने कहा, ‘मुकदमा करने का अधिकार संसद द्वारा विशेष रूप से प्रदान किया जाता है। ईडी के मामले में यह अधिकार मौजूद नहीं है।’
उन्होंने कहा कि ईडी को शुरू में आर्थिक मामलों के विभाग के अंतर्गत एक प्रवर्तन इकाई के रूप में बनाया गया था और इसने केंद्र के एक संगठनात्मक अंग के रूप में कार्य करना जारी रखा। उन्होंने कहा, ‘यह एक विभाग के भीतर एक विभाग था और आज तक ऐसा ही है।’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), स्वापक नियंत्रण ब्यूरो, राजस्व खुफिया निदेशालय और गंभीर कपट अन्वेषण कार्यालय (एसएफआईओ) जैसी जांच एजेंसियों को भी स्वतंत्र रूप से मुकदमा करने का अधिकार रखने वाले निकायों के रूप में वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने बनर्जी की ओर से संक्षिप्त दलीलें पेश कीं और कहा कि ईडी कथित बाधा के संबंध में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध करते हुए रिट याचिका दायर नहीं कर सकती।
सुनवाई अनिर्णायक रही और 24 मार्च को जारी रहेगी।
शीर्ष अदालत ने गत 15 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के इस आरोप को ‘‘बेहद गंभीर’’ बताया था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उसकी जांच में ‘‘बाधा डाली।’’
न्यायालय ने इस बात की समीक्षा करने पर भी सहमति जताई थी कि क्या किसी राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी गंभीर अपराध के मामले में केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप कर सकती हैं।
भाषा अमित सुरेश
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