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Tuesday, 11 June, 2024
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भूखी गायें, भूखे किसान- UP सरकार की नीति ने ऐसा मवेशी संकट खड़ा कर दिया जिसका योगी को अंदाज़ा नहीं था

UP में पवित्र गाय के साथ ‘ख़तरा’ शब्द कैसे जुड़ गया, ये भ्रष्टाचार, ग़रीबी, और योगी सरकार की राजनीति की एक विचित्र कहानी है.

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हुर्र…हुर्र…’देर रात के 2 बजे हैं, और 70 वर्षीय चमेली देवी अपने खेत के बीचो बीच बने मचान पर बैठी ये आवाज़ें निकाल रही हैं. अपराधियों को नहीं बल्कि आवारा पशुओं को भगाने के लिए. उत्तर प्रदेश में सीतापुर के बनेहटा गांव की चमेली देवी ने पिछले साल अपने दो बीघा खेत की गेहूं की पूरी फसल गंवा दी थी. ‘अन्ना पशुओं’ या ‘छुट्टा पशुओं’ ने, जो आवारा पशुओं को यूपी में कहा जाता है, रात में उसकी पूरी फसल चर ली थी. उन्होंंने एनजीओज़ की मदद से किसी तरह साल गुज़ार लिया, लेकिन इस बार वो कोई जोखिम नहीं लेना चाहती. कोविड की दो लहरों के बाद चमेली देवी को, फसलों की पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है.

सर्दी की रात में ठिठुरते और जागे रहने का संघर्ष करते हुए, उसने कहा, ‘सरकार तो गैया को भगवान बनाके सड़क पर छोड़ दी है, किसानों का नुक़सान करने के लिए, भगवान हैं तो सरकार कम से कम उनके खाने का तो बंदोबस्त कर दे’.

उत्तर प्रदेश में पवित्र गाय के साथ ‘ख़तरा’ शब्द कैसे जुड़ गया, जो गर्मा- गर्म गौ-संरक्षण राजनीति का केंद्र है, ये भ्रष्टाचार, ग़रीबी, और नीतिगत नतीजों पर विचार न करने की, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की नाकामी की एक अजीब कहानी है. गाय की पूजा और उसका संरक्षण 2017 से योगी आदित्यनाथ सरकार की प्राथमिकताओं के केंद्र में रहा है.

लेकिन, ‘मवेशी ख़तरे’ की बढ़ती समस्या इतनी बेक़ाबू होती जा रही है कि राजनेता चल रहे उत्तर प्रदेश चुनावों में अब इस मुद्दे की अनदेखी नहीं कर सकते. हताश किसानों ने मंगलवार को बराबंकी में, दर्जनों गायों को यूपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनाव रैली के स्थल पर खुला छोड़ दिया. रविवार को पीएम नरेंद्र मोदी ने अपनी उन्नाव जनसभा में आश्वासन दिया कि 10 मार्च (चुनाव परिणाम दिवस) के बाद इस मुद्दे से निपटने के लिए एक नई नीति लाई जाएगी, जिसमें आवारा गायों के गोबर को किसानों के लिए लाभकारी बना दिया जाएगा.

चमेली देवी कहती हैं, ‘पिछले तीन-चार सालों से, भूखी गायें और सांड़ किसानों के लिए एक बड़ा ख़तरा बन गए हैं. अगर सरकार गौ हत्या के खिलाफ इतनी कड़ी कार्रवाई कर सकती है, तो उसे उनके चारे का भी बंदोबस्त करना चाहिए. योगी जी के सत्ता में आने के बाद से लाखों गौशालाएं खुली हैं, लेकिन भूख और भुखमरी की वजह से, गायें और सांड़ वहां से भाग निकलते हैं, और खाने के लिए खेतों में आ जाते हैं’. अपने पति की मौत और फिर बेटे के शहर चले जाने के बाद, वो अकेले ही अपने खेतों की देखभाल करती हैं. ‘इस सरकार के आने से पहले, मुझे नहीं पता कि गायें बेची जा रहीं थीं या कट रहीं थीं, लेकिन कम से कम वो भूख से नहीं मर रहीं थीं, और ग़रीब किसानों के लिए मुसीबत पैदा नहीं कर रहीं थीं.

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अब बहुत सी महिलाओं को फसलों की निगरानी के लिए सारी रात खेतों में बैठना पड़ता है. अगर वो असुरक्षित महसूस करती हैं तो भी, उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है. चमेली देवी आगे कहती हैं, ‘हम पूरे साल फसलें बोते हैं, कटाई के समय अगर मवेशी उन्हें चर लें, या उन्हें कुचल दें तो हम तो मर ही जाएंगे’.


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चमेली देवी रात को अपने खेत की रखवाली करती हुईं | सत्येंद्र सिंह | दिप्रिंट.

यूपी में विपक्षी पार्टियां जानती हैं कि ये एक चुनावी मुद्दा है, लेकिन उन्हें बहुत एहतियात से चलना पड़ता है. समाजवादी पार्टी ने ऐलान किया कि अगर वो सत्ता में आती है, तो आवारा सांड़ों के हमलों में मारे जाने वाले लोगों के परिजनों को 5 लाख रुपए मुआवज़ा उपलब्ध कराएगी. कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में मवेशियों से नुक़सान होने पर 3,000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवज़ा देने का वादा किया गया है. भूपेश बघेल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के ‘गोधन न्याय योजना मॉडल’ को दोहराने की कोशिश में, कांग्रेस ने यूपी में किसानों से 2 रुपए प्रति किलो की दर से गाय का गोबर ख़रीदने की भी पेशकश की.

यूपी बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी इससे सहमत नहीं हैं. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘मवेशी ख़तरा कोई चुनावी मुद्दा नहीं है, ये सिर्फ विपक्षी दलों का प्रचार है. योगी सरकार ने 10 लाख लाभार्थियों को पंजीकृत किया है, जिन्हें हर मवेशी के लिए 900 रुपए प्रति माह दिया जाता है. हर मसले का हल अकेले सरकार नहीं निकाल सकती, लोगों को भी इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी. इस समस्या का समाधान गौ हत्या नहीं है, जैसा कि अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान था. हिंदू लोग ऐसा नहीं होने देंगे, और इसके आधार पर वोट नहीं देंगे’.

गायें घर वापस नहीं लौटीं

योगी आदित्यनाथ सरकार की बहुत सी नीतियों ने, बूढ़े मवेशियों के व्यापार को प्रभावित किया है, जिससे दशकों से चली आ रही अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम 2020 के तहत कटाई के उद्देश्य से ‘गाय या उसके बच्चे’ की ढुलाई पर प्रतिबंध है. इसकी सज़ा- सात साल तक की जेल और 1 से 3 लाख रुपए तक जुर्माना.

इसके नतीजे में राज्य में गायों की निगरानी करने वालों की संख्या बढ़ गई, जो गौहत्या और उपभोग के शक में मवेशियों को ले जा रहे किसी भी व्यक्ति की पिटाई कर देते थे. लिंचिंग तथा गौरक्षकों के हमलों की घटनाएं बढ़ती रहीं- 2015 में दादरी में मोहम्मद अख़लाक से लेकर, 2021 में मथुरा में मोहम्मद शेरा तक. और इसका नतीजा है डर का माहौल, जहां भूखी गायें और सांड़ खुले घूमते हैं, और इनका व्यापार घट गया है.

‘एक रात उनमें से एक सांड़ ने मुझ पर उस समय हमला कर दिया, जब में उन्हें अपनी फसलों से दूर हटाने की कोशिश कर रहा था. पहले इन सांडों से किसानों को अच्छा पैसा मिल जाता था, लेकिन अब ये बस हम पर हमले कर रहे हैं,’ ये कहना था 68 वर्षीय सुरेश का, जो अपनी एक बीघा ज़मीन के बीच खटिया पर बैठे, धान की फसल की रक्षा कर रहे थे, जिसे वो अगले सप्ताह काटेंगे.

इससे पहले, दूध न देने वाली गायों और सांड़ों को, या तो मवेशी व्यापार में बेचकर कहीं पहुंचा दिया जाता था- बांग्लादेश तक- या फिर बूचड़ख़ानों भेज दिया जाता था. अब इस व्यापार पर एक अनौपचारिक पाबंदी है, और अधिकतर बूचड़ख़ाने बंद हो गए हैं.

एक पत्रकार और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो, हरीश दामोदरन का कहना है कि सरकार को नर मवेशियों को काटने की अनुमति दे देनी चाहिए. सांड़ों को घरों में रखना संभव नहीं है, वो कहीं अधिक जंगली होते हैं और लोगों को मार भी डालते हैं. सबसे अच्छा ये रहेगा कि उन्हें बड़े होकर सांड़ न बनने दिया जाए, और नर बछड़ों को कटाई के लिए पालने की अनुमति दी जाए. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार भी पैदा होंगे’.

दामोदरन ने संकर नस्ल की गायों और देसी गायों के बीच अंतर पर भी ज़ोर दिया. लोगों की भावनाएं भारतीय नस्ल के साथ जुड़ी हैं, जिसे गौमाता कहा जाता है.

दामोदरन कहते हैं, ‘ज़्यादातर किसानों के पास संकर नस्ल की जर्सी गाएं हैं, इसलिए उनके बारे में कुछ भी ‘पवित्र’ नहीं होना चाहिए. उन्हें काटा जा सकता है और इसकी अनुमति होनी चाहिए, ताकि भावनाओं और व्यवहारिकता में एक संतुलन हो जाए. योगी, अखिलेश या जो कोई भी सत्ता में आता है, अगर वो ये घोषणा कर दें, तो अगले 10 साल तक सत्ता में रह सकते हैं’.

आवारा पशुओं को बाहर रखने के लिए कंटीले तार | उत्तर प्रदेश | सतेंद्र सिंह | दिप्रिंट

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भूखी गायें, भूखे किसान

जो सबसे ज़्यादा कष्ट सह रहे हैं, वो हैं मवेशी और किसान.

सुरेश यादव यूपी के बाराबंकी का निवासी है, और एक सीमांत किसान है. उसके पास धातु की बाड़ के लिए पैसा नहीं है, इसलिए उन्हें ख़ुद बैठकर फसलों की निगरानी करनी पड़ती है. लेकिन, उसका कहना है कि चारे के लिए हताश भूखे मवेशियों के सामने धातु की बाड़ भी कोई रुकावट नहीं है.

यादव पूछते हैं, ‘योगी जी हर जानवर के लिए 30 रुपए प्रतिदिन की एक स्कीम लेकर आए थे, लेकिन ये पैसा मुश्किल से ही ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों तक पहुंच सका, जिन्हें उनकी देखरेख में विफल रहने के बाद, मजबूरन अपने मवेशियों को सड़कों पर खुला छोड़ना पड़ा. कोविड के बाद किसानों और ग़रीब लोगों के पास अपने खाने के लिए ही पैसा नहीं है, ऐसे में आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि हम 100-200 गायों और सांड़ों की देखभाल कर पाएंगे?’ वो जानते हैं कि गायें पवित्र हैं, लेकिन उनके साथ जो सलूक किया जा रहा है, वो इसके आसपास भी नहीं है.

‘ये सरकार गायों को बचाने का सिर्फ नाटक करती है. वास्तव में वो ख़ुद एक कारण है जिसकी वजह से राज्य में मवेशी मुसीबत झेल रहे हैं’.

सुरेश यादव रात में आवारा पशुओं को रोकने के लिए खड़े रहते हैं | सतेंद्र सिंह | दिप्रिंट.

व्यापार धीमा पड़ जाने के बाद से मवेशी पालने वाले किसानों की संख्या भी कम हो गई है. आर्टिकल-14 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 की मवेशी जनगणना में पता चलता है कि यूपी में 2012 और 2019 के बीच, पालतू मवेशियों की संख्या में 2.75 प्रतिशत की गिरावट आई, हालांकि देशभर में इसमें 1.3 प्रतिशत की मामूली वृद्धि देखी गई. इसके विपरीत, ग्रामीण यूपी में आवारा मवेशियों की संख्या में 117 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो 2012 के 495,000 से बढ़कर 2019 में 10.7 लाख पहुंच गई’.

संपन्न किसान भी मुसीबत में हैं, क्योंकि आवारा पशुओं को दूर रखने के लिए तारबंदी और मज़दूरी की लागत दोगुनी हो रही है.

सीतापुर के कुशल नगर में 38 वर्षीय हरप्रीत सिंह का कहना है, ‘पिछले दो सालों में मुझे अपनी फसलों का पैटर्न बदलना पड़ा, क्योंकि सरकार हमारे लिए कुछ नहीं कर रही है. इसलिए हमें एक समाधान मिल गया, और हम गन्ने की खेती पर चले गए, जिसे पशुओं से बचाना आसान होता है’.

ये केवल हरप्रीत सिंह नहीं हैं, यूपी में बहुत से लोग अपनी फसल पद्धति बदल रहे हैं, जिससे चारे की कमी और बढ़ रही है.

लखनऊ जिले के मेमौरा में एक गौशाला | सत्येंद्र सिंंह | दिप्रिंट.

‘गौशालाओं पर करोड़ों रुपए ख़र्च’

2017 में सत्ता में आने के बाद से, गायों के संरक्षण के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने, मवेशी संरक्षण केंद्र शुरू किए और गौशालाओं की संख्या बढ़ी दी. आर्टिकल-14 की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2020 के बीच गायों को रखने के लिए उसने गौशालाओं तथा अस्थायी आश्रयों पर क़रीब 764 करोड़ रुपए ख़र्च किए. 2021-22 के प्रदेश बजट में, गौशालाओं को 390 करोड़ रुपए दिए गए, लेकिन देखभाल करने वालों का कहना है कि पैसा मवेशियों तक नहीं पहुंच रहा है, और उसे भ्रष्ट बिचौलिए उसे डकार रहे हैं.

64 वर्षीय जंग बहादुर 2018 से यूपी के खटोला में, सरकार द्वारा निर्मित एक गौशाला में देखभाल का काम कर रहे हैं. वो कहते हैं कि जब से वो आए हैं, उन्होंने गौशालाओं के अंदर चारे की क़िल्लत के चलते गायों को भूख से मरते ही देखा है.

‘मेरे पास गौशाला में क़रीब 250 गायें और सांड़ हैं. बीते कुछ सालों में, ख़ासकर पिछले साल कोविड संकट के दौरान, बहुत सी गाएं चारे की भारी क़िल्लत के चलते मर गईं हैं. एक पूरा साल गुज़र गया है, और हमें एक फूटी कौड़ी नहीं मिली. चारा 1,500 रुपए क्विंटल है. सरकार कैसे अपेक्षा करती है कि हम 30 रुपए प्रतिदिन से मवेशियों का पेट भर पाएंगे? हमारी गौशाला की मालिक इस साल बीजेपी की ओर से चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन उनके पास गायों की देखरेख के लिए कोई समय नहीं है, जिन्हें वो ‘पवित्र’ कहते हैं’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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