नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में 1994 में दिल्ली प्रिजर्वेशन ऑफ ट्रीज एक्ट लागू होने के तीन दशक से ज्यादा समय बाद पहली बार पूरे शहर में पेड़ों की गिनती होने जा रही है. इस काम के लिए केंद्र सरकार ने 2.9 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं. यह प्रक्रिया अगले चार साल में चरणों में पूरी की जाएगी.
देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) के अलावा, जो इस गणना की निगरानी करेगा, दिल्ली सरकार ने एक विशेषज्ञ पैनल भी बनाया है, जिसमें पर्यावरणविद प्रदीप कृष्णन और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (आईएफएस) के अधिकारी एमडी सिन्हा और सुनील लिमये शामिल हैं.
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि एफआरआई के वैज्ञानिक अगले तीन से चार महीनों में पेड़ों की गिनती शुरू करेंगे.
अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “यह प्रक्रिया चरणों में होगी और इस गणना में केवल गैर-जंगल वाले क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा. इससे शहर के पेड़ों की सही तस्वीर मिलेगी.”
प्रक्रिया
पेड़ों की गिनती नई तकनीक जैसे लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (लिडार), जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस), ड्रोन और रिमोट सेंसिंग की मदद से की जाएगी. जब पेड़ों को ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में पहचान लिया जाएगा, तो उनका डेटा एक केंद्रीय सर्वर पर भेजा जाएगा, जिससे गिनती तेज और ज्यादा सही होगी.
जहां पेड़ बहुत ज्यादा घने होंगे और अलग-अलग पेड़ों की पहचान मुश्किल होगी, वहां लोग जाकर हाथ से गिनती करेंगे.
पेड़ों की सिर्फ गिनती ही नहीं होगी, बल्कि उन्हें उनकी प्रजाति, किस देश से आए, ऊंचाई, मोटाई, उम्र और सेहत के आधार पर भी अलग-अलग श्रेणी में रखा जाएगा.
एफआरआई के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने दिप्रिंट से कहा, “दिल्ली में यह प्रक्रिया बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिए, क्योंकि शहर के इलाकों में बहुत ज्यादा घने पेड़ों वाले हिस्से नहीं हैं.”
अधिकारी ने बताया कि अगले दो हफ्तों में मध्य और दक्षिण दिल्ली के कुछ हिस्सों में पायलट गिनती शुरू होगी.
अब तक कोई गणना नहीं
1994 में दिल्ली प्रिजर्वेशन ऑफ ट्रीज एक्ट (DPTA) लागू होने के बाद से शहर में पेड़ों की कोई गणना नहीं हुई है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दिल्ली ट्री अथॉरिटी (DTA) को राजधानी में पेड़ों की गणना कराने को कहा था.
2025 में कोर्ट ने फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट को इस काम में शामिल किया और संस्थान की सर्वे करने की योजना को मंजूरी दी, जिसमें शहर में हरियाली बढ़ाने के सुझाव भी शामिल थे. जस्टिस अभय एस ओका और उज्जन भुयान की बेंच ने कहा कि पूरी तरह से पेड़ों की गणना होने से शहर में पेड़ों की अवैध कटाई पर नजर रखना आसान होगा और एफआरआई को कम समय में यह काम करने को कहा.
इन निर्देशों के बाद एफआरआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया, जिसमें इस काम के खर्च का अनुमान बताया गया.
एफआरआई के हलफनामे में कहा गया, “एफआरआई पहले और दूसरे चरण को लागू करने, तरीका तय करने और तीसरे चरण के लिए एक एक्शन प्लान बनाने के लिए पायलट ट्रायल करने पर 443 लाख रुपये का अनुमानित बजट प्रस्तावित करता है.”
अधिकारियों ने कहा कि एक बार तरीका तय हो जाने के बाद, हर कुछ साल में यह प्रक्रिया दोबारा की जा सकती है.
स्थानीय स्तर पर पेड़ों की गणना
जहां सरकार पेड़ों की गणना कराने में देरी कर रही थी, वहीं कुछ इलाकों के लोगों ने अपने स्तर पर ऐसे सर्वे करने की पहल की.
दिल्ली की पहली अनौपचारिक पेड़ गणना दक्षिण दिल्ली के सर्वोदय एन्क्लेव के लोगों ने कराई थी. यह 2012 में पर्यावरण कार्यकर्ता पद्मावती द्विवेदी ने कराई थी. स्थानीय लोगों ने स्थानीय अधिकारियों की मदद से हर कुछ साल में फिर से सर्वे कराकर शहर में पेड़ों की कमी का अनुमान लगाया.
पहले सर्वे के बाद वसंत विहार, गुलमोहर पार्क और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी जैसे इलाकों में भी ऐसे सर्वे शुरू किए गए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
