नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश से मीट एक्सपोर्टर मोइन अख्तर कुरैशी से वॉयस सैंपल लेने का रास्ता साफ हो गया है. यह सैंपल इनकम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा इंटरसेप्ट की गई कॉल्स से मिलान के लिए लिए जाएंगे. इस आदेश से आठ साल से रुकी हुई एक भ्रष्टाचार जांच फिर से शुरू हो सकती है.
हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते 2021 के निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कुरैशी को वॉयस सैंपल देने का निर्देश दिया गया था. कोर्ट ने कुरैशी की यह दलील खारिज कर दी कि वॉयस सैंपल देना आत्म-दोषारोपण होगा और यह उसके निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. कुरैशी ने 2014-15 में रिकॉर्ड किए गए कॉल ट्रांसक्रिप्ट्स की सबूत के तौर पर अहमियत पर भी सवाल उठाया था.
2013 में इंटरसेप्ट की गई कॉल्स के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने जांच शुरू की थी. सीबीआई को जानकारी दी गई थी कि कुरैशी कई सरकारी अधिकारियों के लिए बिचौलिए की भूमिका निभा रहा था.
ईडी से मिली जानकारी के आधार पर सीबीआई ने फरवरी 2017 में अपने पूर्व प्रमुख एपी सिंह, मोइन अख्तर कुरैशी और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया. हालांकि, अक्टूबर 2018 में यह मामला एक अभूतपूर्व टकराव में फंस गया, जब तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने तत्कालीन विशेष निदेशक राकेश अस्थाना और उनकी टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया.
यह स्थिति तब बनी जब हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना ने आरोप लगाया कि उसने कुरैशी से जुड़े अपने मामले को ‘सेटल’ कराने के लिए अस्थाना और अन्य को पैसे दिए थे.
2018 के मामले में दाखिल चार्जशीट में अस्थाना का नाम नहीं था. अन्य आरोपियों, जिनमें सीबीआई के जांच अधिकारी भी शामिल थे, को मार्च 2023 में बरी कर दिया गया. हालांकि, 2017 के मामले में अब तक कुरैशी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है.
मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया, “इस पेंडिंग अपील की वजह से जांच चार साल से अटकी हुई थी, और मुख्य आरोपी कुरैशी के ट्रांसक्रिप्ट के वेरिफिकेशन का इंतज़ार होने की वजह से चार्जशीट फाइल नहीं हो पाई थी. इस आदेश से मामले में जांच के लिए ज़रूरी वॉइस सैंपल रिकॉर्ड करने का रास्ता साफ हो गया है.”
24 दिसंबर को हाई कोर्ट ने कुरैशी की दलीलें खारिज करते हुए कहा कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है और यह अपराध की रोकथाम और जांच जैसे वैध सरकारी हितों से ऊपर नहीं हो सकता.
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने ऑर्डर में कहा, “इस मामले में, बोलने वालों की पहचान पक्की करने के लिए जांच चल रही है. सिर्फ इसलिए कि इंटरसेप्ट सात-आठ साल पहले किए गए थे, इसका मतलब यह नहीं है कि वे जांच के मकसद से अपने आप अमान्य हो जाते हैं.”
उन्होंने कहा कि इस चरण में जांच सबूत जुटाने पर केंद्रित है. इंटरसेप्ट की स्वीकार्यता, प्रामाणिकता और सबूत के तौर पर उनकी अहमियत का फैसला ट्रायल के दौरान किया जाएगा.
कोर्ट ने आगे कहा, “तुलना के लिए सैंपल इकट्ठा करने से मना करने के लिए सोर्स मटेरियल की वैधता का पहले से ही अंदाज़ा लगाना, जांच के स्टेज पर ही एक छोटा ट्रायल करने जैसा होगा, जो कि गलत है.”
सीबीआई बनाम सीबीआई की लड़ाई
कुरैशी का मामला फरवरी 2014 का है, जब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने अक्टूबर से दिसंबर 2013 के बीच दो मोबाइल फोन से इंटरसेप्ट की गई कॉल्स के आधार पर उसके ठिकानों पर छापे मारे थे.
आरोप है कि छापों में टैक्स चोरी और विदेशी मुद्रा के हेरफेर के सबूत मिले, जिसके बाद ईडी ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के तहत जांच शुरू की.
ईडी को कथित तौर पर पता चला कि कुरैशी कई सरकारी अधिकारियों के लिए बिचौलिया था. इसके बाद ईडी ने सीबीआई को पत्र लिखकर आपराधिक मामला दर्ज करने का अनुरोध किया. सीबीआई ने फरवरी 2017 में कुरैशी, अपने पूर्व प्रमुख ए.पी. सिंह और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया.
इस मामले की जांच सीबीआई की एक टीम कर रही थी, जिसका नेतृत्व डीएसपी देवेंद्र कुमार कर रहे थे. यह टीम तत्कालीन विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के अधीन थी.
हालांकि, इस मामले ने तब अजीब मोड़ ले लिया, जब सतीश बाबू सना, जिसे कुरैशी से कथित संबंधों के चलते तलब किया गया था, ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से संपर्क कर जांच कर रही सीबीआई टीम पर दबाव और वसूली का आरोप लगाया.
सना ने आरोप लगाया कि सीबीआई टीम ने उसे 5 करोड़ रुपये की रिश्वत के बदले छोड़ने की पेशकश की थी. इसमें 3 करोड़ रुपये पहले और 2 करोड़ रुपये चार्जशीट के स्तर पर क्लीन चिट मिलने के बाद देने की बात कही गई थी.
सना की शिकायत पर अस्थाना और देवेंद्र कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. सीबीआई ने दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में अपने ही अधिकारियों के दफ्तरों पर तलाशी भी ली.
सीबीआई के शीर्ष अधिकारियों के बीच टकराव के बाद सरकार ने अक्टूबर 2018 में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया और मन्नेम नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक नियुक्त किया.
इसी दौरान अस्थाना ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि सतीश बाबू सना के खिलाफ कार्रवाई से बचने के लिए सीबीआई निदेशक को भारी रिश्वत दी गई थी.
बाद में उसी साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आलोक वर्मा को जिम्मेदारियों से हटाकर छुट्टी पर भेजा गया था. हालांकि, शीर्ष अदालत ने उन्हें किसी भी तरह के नीतिगत फैसले लेने से रोक दिया.
जनवरी 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय चयन समिति ने औपचारिक रूप से आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटा दिया. 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी ने अगले दिन सेवा से इस्तीफा दे दिया.
दूसरी ओर, राकेश अस्थाना को 2020 में सीमा सुरक्षा बल का महानिदेशक और 2021 में दिल्ली पुलिस आयुक्त नियुक्त किया गया. वह जुलाई 2022 में सेवानिवृत्त हुए.
सीबीआई पर कई बार जांच में प्रगति न करने के आरोप लगे हैं, खासकर इसलिए क्योंकि उसके दो पूर्व प्रमुख इस मामले में आरोपी रहे हैं.
दिल्ली की एक अदालत ने 2020 में संयुक्त निदेशक स्तर के एक अधिकारी को तलब कर यह बताने को कहा था कि मामले में ‘आजमाए हुए तरीकों’ को क्यों नहीं अपनाया गया.
जज ने 2020 में एजेंसी से पूछा. “CBI ने तलाशी, संभावित संदिग्धों से हिरासत में पूछताछ जैसे आज़माए हुए जांच के तरीकों का इस्तेमाल करके जांच को तार्किक अंजाम तक क्यों नहीं पहुंचाया. क्या इसके पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा की कथित भूमिका की भी जांच की गई, क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान जांच को रोका या उसे उसके तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंचने दिया.”
जज ने पूछा. “CBI अपने दो पूर्व डायरेक्टरों की भूमिका से जुड़े मामले में ढिलाई क्यों बरत रही है, जिससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि वह उनके खिलाफ जांच को आगे बढ़ाने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं ले रही है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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