Tuesday, 25 January, 2022
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‘मुझे चांद चाहिए’ के लेखक सुरेंद्र वर्मा का प्रकाशकों पर आरोप,’फर्जी सिग्नेचर’ कर छापी उनकी किताब

लेखक सुरेंद्र वर्मा को उनके चर्चित उपन्यास 'मुझे चांद चाहिए' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है. 'सूर्य की अंतिम किरण से, सूर्य की पहली किरण तक' उनका चर्चित नाटक कई भारतीय भाषाओं में अनुवादित और मंचित हो चुका है.

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नई दिल्ली: ‘मैं आपके ऑफिस चल सकता हूं, सारे कागज मेरे पास मौजूद हैं. मैंने एफआईआर दर्ज कराई है. मैं इनसे (राजकमल और वाणी प्रकाशन) 2 करोड़ का जुर्माना वसूल करूंगा.’ 80 साल के लेखक सुरेंद्र वर्मा ये बातें कहते हुए काफी आक्रोश में आ जाते हैं.

देश के सबसे बड़े प्रकाशन माने जाने वाले राजकमल और वाणी प्रकाशन पर लेखक सुरेंद्र वर्मा का आरोप है कि वे उनके नाटक ‘हरी घास पर घंटे भर ’ को उनकी इजाजत, सिग्नेचर के बिना दो यूनिवर्सिटीज के साथ मिलीभगत कर चला रहे हैं, वर्मा ने इसे लेकर एफआईआर कराई है. इसके बाद इन प्रकाशकों ने उन्हें एक-एक हजार रुपये का चेक भेजा है, जिसे उन्होंने अभी तक बैंक से कैश नहीं कराया है.

वर्मा चाहते हैं कि उनकी मर्जी और जानकारी के बगैर छापी उनकी किताब का प्रकाशक हर्जाना दें, उन्हें रायल्टी नहीं चाहिए. वह दिप्रिंट से मुलाकात में इन चेक्स को भी दिखाते हैं. इन चेक्स की कॉपी दिप्रिंट के पास मौजूद है.

गौरतलब है कि लेखक सुरेंद्र वर्मा को उनके चर्चित उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है. व्यास सम्मान से सम्मानित ‘काटना शमी का वृक्ष ‘ उनका दूसरा विख्यात उपन्यास है. ‘सूर्य की अंतिम किरण से, सूर्य की पहली किरण तक’ उनका चर्चित नाटक कई भारतीय भाषाओं में अनूदित हो चुका है और इसका मंचन भी. वह फिल्म ‘स्पंदन’ के लिए स्क्रीन राइटिंग का नेशनल अवॉर्ड भी हासिल कर चुके हैं. दारा शिकोह पर बनाई उनकी डॉक्युमेंट्री पांच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में शामिल हो चुकी है.

वाणी प्रकाशन ने कहा- लेखक धोखाधड़ी करना चाहते हैं

वाणी प्रकाशन के मालिक अरुण माहेश्वरी ने पूरे मामले पर दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, ‘इस मामले में जो भी जवाब देना था मैंने वकील के माध्यम से उन्हें दे दिया है.’

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लेखक के आरोपों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘वर्मा जो आरोप लगा रहे हैं वो सही नहीं है, वह वरिष्ठ आदमी हैं मुझे उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना है. बाकी लिखित में सवाल थे, मैंने उनका लिखित में जवाब दे दिया है.’

अरुण माहेश्वरी कहते हैं, ‘सीकर यूनिवर्सिटी में उनकी कोई किताब नहीं चल रही है. मैंने उनकी सारी किताबें वापस कर दी हैं. वह एक एकांकी संकलन है जिसमें उनका नाटक हरी घास पर घंटे भर भी संकलित है, लेकिन उनकी कोई किताब नहीं है.’

इस सवाल पर कि उनकी इजाज़त के बिना उनका नाटक एकांकी संग्रह में भी क्यों शामिल है? तो उनका कहना था, ‘मैंने उन्हें उसकी रॉयल्टी भेज दी है. वह धोखाधड़ी करना चाहते हैं. वह मुकदमा कर रहे हैं. चेक को कैश क्यों नहीं करा रहे हैं’.

हालांकि वह इस सवाल को टाल गये कि नाटक लेखक की मर्जी के बिना एकांकी संग्रह में भी क्यों शामिल किया गया है.

राजकमल प्रकाशन ने वर्मा के आरोप को बताया निराधार

वहीं ई-मेल पर दिए जवाब में राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी ने कहा, ‘आरोप निराधार हैं. रंगायन’ (एंकाकी संकलन- जिसमें लेखका का नाटक हरी घास पर घंटे भर भी शामिल है) की बात श्री सुरेन्द्र वर्मा जी ने की है. इसका प्रकाशन 2009 में किया गया था. इतने वर्षों बाद यह बात उन्होंने गलत तथ्यों के साथ कही है. इस समय इसका औचित्य समझ पाना कठिन है.’

उन्होंने कहा, ‘महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए इसका प्रकाशन किया गया. इसमें छह रचनाकारों की रचनाएं संकलित हैं. हमारे द्वारा भेजा गया चेक श्री वर्मा ने न तो वापस कियान ही रचना संकलित करने की बात कही. ऐसी स्थिति में इसे स्वीकृति माना गया. पाठ्य पुस्तक उपलब्ध न होने से छात्र परेशान थे. विवशता में पुस्तक प्रकाशित करनी पड़ी. श्री वर्मा हमारा चेक लौटा देंराशि का भुगतान उन्हें कर दिया जायेगा. फर्जी सिग्नेचर’ की बात समझ नहीं आई. किताब में सिग्नेचर नहीं होते.’

क्या है मामला

दिप्रिंट से मुलाकात के दौरान लेखक सुरेंद्र वर्मा ने बताया, ‘10 साल पहले राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक माहेश्वरी और वाणी प्रकाशन के मालिक अरुण माहेश्वरी से छापने के लिए दी गई मैंने अपनी सभी किताबें वापस ले लीं. इसके लिए उन्हें मैंने क्रमशः 1 लाख 18 हजार और 45 हजार रुपये का भुगतान किया और इसके बाद इन किताबों को छापने के लिए ज्ञानपीठ को दे दिया. तब से हमारा इन प्रकाशनों से संबंध खत्म हो गया.’

सुरेंद्र वर्मा दोनों प्रकाशनों पर आरोप लगाते हैं कि, ‘2018 में दोनों प्रकाशनों ने मेरी जानकारी के बिना मेरे नाटक ‘हरी घास पर घंटे भर’ को मेरी फर्जी साइन करके अलग-अलग विश्वविद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों के लिए छापे हैं.’

उन्होंने कहा कि अरुण माहेश्वरी ने इस नाटक को राजस्थान के सीकर में एक नई खुली दीन दयाल शेखावटी यूनिवर्सिटी के लिए छापा है और अशोक माहेश्वरी ने महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड यूनिवर्सिटी बरेली, उत्तर प्रदेश के लिए छापा है.


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सीकर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने जानकारी से किया इनकार

इस मामले में बात करते हुए शेखावटी यूनिवर्सिटी के डिप्टी रजिस्ट्रार रवींद्र से बात हुई तो उन्होंने कहा, ‘उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता, आप इससे जुड़े विभाग से बात कीजिए और उन्होंने फोन काट दिया.’ हालांकि यूनिवर्सिटी के मुख्य रजिस्ट्रार को ई-मेल किया है, अगर उनका जवाब आता है तो स्टोरी को अपडेट किया जाएगा.

लेखक वर्मा ने बताया कि वहीं अशोक माहेश्वरी ने इस नाटक का नाम बदलकर रंगायन नाम से महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड यूनिवर्सिटी बरेली, उत्तर प्रदेश के लिए छापा है.

इस बारे में यूनिवर्सिटी के मीडिया प्रभारी अमित सिंह ने दिप्रिंट को बताया, ‘वह इसके बारे में कुछ नहीं बोल सकते. आप सीधे रजिस्ट्रार से बात कीजिए. मैं उसी मामले पर टिप्पणी करता हूं जिस मामले के लिए यूनिवर्सिटी मुझे अधिकृत करती है.’

इस मामले को लेकर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार को मेल किया गया है. अगर उनका जवाब आता है तो खबर को अपडेट किया जाएगा.

लेखक वर्मा आरोप लगाते हैं, ‘दोनों प्रकाशनों ने इन यूनिवर्सिटीज़ के रजिस्ट्रार से मिलकर मेरे झूठे सिग्नेचर किए हैं. और मेरे नाटक को चला रहे हैं.’

सुरेंद्र वर्मा ने दर्ज कराई है FIR, चल रही है जांच

सुरेंद्र वर्मा ने इसको लेकर दिल्ली के छतरपुर बेरी पुलिस स्टेशन में सब इंस्पेक्टर लालाराम के पास शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन उनके रिटायरमेंट के बाद यह मामला दिल्ली के मालवीय नगर थाने में ट्रांसफर हो गया. दिप्रिंट के पास एफआईआर की कॉपी है.

सब इंस्पेक्टर लालाराम ने दोनों प्रकाशकों को नोटिस भेजा था. दोनों प्रकाशक थाने में हाजिर हुए थे, जिसको लेकर पूछताछ हुई थी लेकिन इसके बाद लालाराम रिटायर हो गये हैं. यह मामला अब मालवीय नगर थाने के एमओडी सेल में ट्रांसफर हो गया है. सेल जिसके पास इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के मामलों की विशेषज्ञता है. इसे यहां सब इंस्पेक्टर कैलाश देख रहे हैं.

सब इंस्पेक्टर कैलाश ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, ‘जब यह मामला मेरे पास आया था तो उस समय मेरा एक्सिडेंट हो गया था और मैं मेडिकल लीव पर था. अब वापस आया तो मामले को देखने के बाद पता चला यह कॉपीराइट का मामला है, लेकिन इसे दिल्ली के सेंट्रल जिले के दरियागंज पुलिस थाने में भेजा दिया है, जिसके बारे में आने वाले मंगलवार तक जानकारी मिल सकती है.’

प्रकाशकों ने लेखक को 1 हजार और 500 का चेक भेजा

लेखक ने बताया अब जबकि मामला थाने में दर्ज हो गया है तो दोनों प्रकाशकों ने रॉयल्टी के तौर पर उन्हें पोस्ट के जरिए चेक भेजा है. वाणी प्रकाशन से अरुण माहेश्वरी की बेटी अदिति माहेश्वरी ने 1000 रुपए का चेक और अशोक माहेश्वरी ने 500 रुपये का चेक भेजा है. इसके अलावा इन्होंने लोकभारती इलाहाबाद से दूसरा 500 रुपए का चेक भेजा है.

वर्मा इन चेक को दिखाते हुए कहते हैं कि उन्होंने इन्हें जान-बूझकर कैश नहीं कराया है. और दोनों प्रकाशनों से 2-2 करोड़ के हर्जाने की मांग की है.

वाणी प्रकाशन अब ज्ञानपीठ के बीच हुआ करार

वहीं एक दिन पहले यानि 31 दिसंबर को एक और ताजा जानकारी सामने आई है कि वाणी प्रकाशन और ज्ञानपीठ के बीच एक करार हुआ है जिसमें वाणी प्रकाशन ने ज्ञानपीठ से से सम्मानित पुस्तकों को विशेष रूप से प्रकाशित करने की जिम्मेदारी ली है.

इसको लेकर जब लेखक सुरेंद्र वर्मा से बात की गई कि अब तो आपकी किताबें फिर से वाणी प्रकाशन के पास चली जाएंगी जैसा कि ज्ञानपीठ के साथ उसका समझौता हुआ तो वर्मा ने कहा, ‘ऐसा नहीं है. वाणी प्रकाशन ने ज्ञानपीठ से सिर्फ उन पुस्तकों के प्रकाशन जिम्मा लिया है जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुका है. इसका हमारी पुस्तकों से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि हमारी किसी भी किताब को ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला है.’


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