अलवर में प्रदर्शन करते लोग- फोटो- ज्योति यादव
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भारत के पांच बड़े हिंदीभाषी राज्यों- यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान से दो तरह की खबरें लगातार आती रहती हैं. गैंगरेप और इनके वायरल वीडियो. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो 2016 के डेटा के मुताबिक गैंगरेप के मामले में ये राज्य देश में सबसे ऊपर आते हैं. गैंगरेप का वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड करने और उसे वायरल करने में जो एकबार भी नहीं सोच रहा है उन अपराधियों को कानून का डर है न समाज का. आखिर क्या है पैटर्न इन अपराधों का? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ही मुताबिक हरियाणा में हर तीसरे दिन एक गैंगरेप होता है. बड़ा सवाल ये है कि हर तीसरे दिन ये गैंग बनते कैसे हैं और कैसे अंजाम देते हैं इन वारदातों को?

पहले इन राज्यों में हुए कुछ अपराधों पर एक नज़र

राजस्थान के अलवर गैंगरेप को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी ने यूपी के गाज़ीपुर रैली में विपक्ष पर निशाना साधा है. विगत 26 अप्रैल को अलवर के थानागाज़ी इलाके में एक पति-पत्नी बाइक से जा रहे थे. दो बाइक वालों ने पीछा किया. लड़की का पांच युवको ने बलात्कार किया. ये बर्बरता करीब तीन घंटे तक चली. लड़की के सामूहिक बलात्कार के 10-11 वीडियो बनाए गए. अश्लील तस्वीरें खींची गई. बाद में सोशल मीडिया पर वायरल की गई. इस गैंग के मुख्य सरगना पर छेड़छाड़ के आरोप पहले से है.

इसके अलावा अलवर में ही एक नाबालिग चौदह वर्षीय लड़की का भी गैंगरेप हुआ है फरवरी 2019 में. वो लड़की पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकली थी. फिर इसी महीने अलवर में ही डॉक्टर के यहां जाते वक्त एक औरत का गैंगरेप हुआ है.


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30 अप्रैल, 2019 को बिहार में सिवान के दारौंदा थाना क्षेत्र को एक नाबालिग लड़की शौच के लिए खेतों में गई. वहां झुंड बनाकर छह लोगों ने उसके साथ गैंग रेप किया. इस घटना का वीडियो भी बनाया. ये झुंड यहीं तक नहीं रुका. ये वीडियो वायरल भी किया.

फरवरी 2019 में जहानाबाद में वाणावर की पहाड़ियों के आस-पास लड़कों के एक गैंग ने एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ की गई. लड़की के कपड़े भी फाड़ दिए गए. घटना के वीडियो बनाए और सोशल मीडिया पर वायरल किए गए.

सितंबर 2018 में हरियाणा के रेवाड़ी के नयागांव में गांव के कुछ युवकों ने अपने ही गांव की एक लड़की को बस स्टैंड से अगवाकर गैंगरेप किया. इस घटनाक्रम में कम से कम 15-20 लड़कों के शामिल होने की खबरें थी. बलात्कार गांव से बाहर बनी एक कोठरी में किया गया. गिरफ्तारी के बाद इन युवकों ने स्वीकारा की इससे पहले भी वो इस तरह की पांच घटनाओं का अंजाम दे चुके हैं. इस गैंग के मुख्य विलेन पर कई तरह के केस पहले से थे.

2016-17 में यूपी के रामपुर से एक वीडियो आया था जिसमें ढेर सारे लड़के एक लड़की को रास्ते में नोंच रहे थे.

क्या है इन गैंगरेप का पैटर्न?

दिप्रिंट ने इन राज्यों के कई लोगों से बात की. बात करने से इन सामूहिक बलात्कार का एक पैटर्न निकलकर सामने आया. गांवों में ये अपराध ज़्यादा हो रहे हैं. ये मामले पूरी तरह रिपोर्ट भी नहीं किये जाते. क्योंकि वीडियो वायरल होने से परिवार को अपने समाज में बेइज़्ज़ती का सामना करना पड़ता है. लड़की की शादी-पढ़ाई में दिक्कत आती है.

गांव के किसी खेत, कच्ची सड़क, बेकार पड़े सरकारी स्कूल, पंचायत घर या गांव का ऐसा कोई ठिकाना बनाया जाता है जहां गांव के लड़कों का एक समूह इकट्ठा होता है. रेप करने का समय लड़की के स्कूल, ट्यूशन या पेशाब और शौच जाते वक्त का होता है. कुछ ऐसे भी मामले आए हैं जिसमें लड़की को किसी लड़के से बातचीत करते हुए देख लिया गया है या वो रास्ते में साथ चलते हुए आ रहे हैं. इस चीज़ को मुद्दा बनाकर लड़के उन्हें घेर लेते हैं.

बलात्कार करने वाले गैंग का लीडर आपराधिक बैंकग्राउंड वाला होता है. इस गैंग मे 4-5 या कई बार इससे भी ज़्यादा लड़के शामिल होते हैं. इस लीडर के बारे में आस-पास के लोगों का कहना है कि ये तो इस तरह की घटनाएं कर चुका है. ग्रुप के दो युवक थोड़े दब्बू किस्म के होते हैं. जो पुलिस के दिए बयानों में कहते हुए नजर आते हैं कि फलाने के कहने से ऐसा कर दिया. बाकी दो बचे युवक थोड़े सामाजिक और थोड़े आपाराधिक प्रवृति के होते हैं. अक्सर परिवार अपने बड़े होते लड़कों को इस गैंग का हिस्सा बनने से रोकने की कोशिश करते हैं.

गैंग रेप जैसे जघन्य अपराध में शामिल होने के बाद इनके परिवार वाले कहते भी पाए जाते हैं कि हमने पहले भी इसे रोकने की कोशिश की थी कि उस गैंग के साथ उठे-बैठे ना.


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रेवाड़ी गैंगरेप में शामिल 18 साल के युवक के परिजनों का भी यही कहना था कि हमने उसे उस ग्रुप से दूर रखने की पूरी कोशिश की थी. इस तरह के युवक खास तौर पर ऐसे ग्रुप्स से प्रभावित हो जाते हैं.

यह ग्रुप इस तरह की घटना को पहली बार में ही अंजाम नहीं देता है. इसकी शुरुआत गैंग बनाकर छेड़खानियों से शुरू होती है. इन छेड़खानियों के चलते देश के बहुत से गांवों में लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाकर जल्दी शादियां करवा जाती हैं. जैसे अलवर. यहां स्कूल जाने वाली लड़कियों ने बताया कि चार-पांच लड़कों के गैंग का खौफ इस कदर फैला होता है कि हम खुद ही तंग आकर स्कूल या कॉलेज छोड़ने की बातें सोच लेती हैं. यही चीज़ इस ग्रुप की हिम्मत बढ़ाती है.

क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट अनुजा कपूर बताती हैं, ‘इनमें से केस हैं जो परिस्थिति के हिसाब से घटित होते हैं. कुछ पूरी प्लानिंग से किए जाते हैं. फिलहाल जो ट्रेंड बना है वो पूरी प्लानिंग वाला है. इस ग्रुप का लीडर बाघ की तरह होता है. ये ही पूरे ग्रुप को हिम्मत देता है. शिकार भी खोजता है. इससे जुड़कर बाकी लड़के भी शक्तिशाली महसूस करते हैं. इन लोगों की शिकारी प्रवृति के होते हैं. इस ग्रुप में जबरदस्त ब्रदरहुड की भावना होती है.’

अनुजा एक एक्टिविस्ट होने के साथ-साथ एक वकील भी हैं, ‘उनका कहना है, पोर्न बढ़ने से इस तरह के क्राइम बढ़े हैं. इंटरनेट की आसान उपल्बधता इन ग्रुप्स की कल्पना को बढ़ावा दे रही है. गैंगरेप के पीछे बेरोजगारी, गरीबी और राजनीतिक कारण भी होते हैं.’

क्या कहते हैं आंकड़ें?

2016 के बाद से सरकारी आंकडे़ं जारी नहीं किए गए हैं. लेकिन 2016 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक 2007 से 2016 तक महिलाओं के खिलाफ होने वाले क्राइम 83% बढ़े हैं. 2016 को सरकारी आंकड़ों के अनुसार गैंगरेप के सबसे ज्यादा मामले उत्तरप्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश में हुए.

साल 2012 में हुआ निर्भया गैंग रेप केस के बाद राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का दबाव बना. फलस्वरूप जस्टिस वर्मा कमेटी बनाई गई. इस कमेटी के सुझावों को लागू किया गया. इसके बाद गैंगरेप के लिए आईपीसी में धारा 376 D 2013-14 में शामिल किया गया. गैंगरेप को एक विभत्स अपराध के तौर पर स्वीकार किया गया. लेकिन निर्भयागैंग रेप केस के बाद इस तरह के रेप लगातार बढ़े हैं. बढ़ते गैंगरेप के साथ बर्बरता भी बढ़ी है.

इन गैंगरेप में एक आश्चर्यजनक बात दिखती है

आमतौर पर अगर कोई युवक अपने किसी दोस्त को चोरी करने या हत्या करने के लिए फोन करेगा तो दोस्त मना कर देगा. अगर सारे आपराधिक प्रवृत्ति के हैं तो ये संगठित अपराध की तरह कई दिन प्लान कर के करेंगे. एक झटके में नहीं करेंगे. लेकिन गैंगरेप के मामले में कई बार ये देखा गया है कि एक फोन कॉल पर ही बाकी लड़के तुरंत तैयार होकर आ जाते हैं. ऐसे भी लड़के आ जाते हैं जिनका अपराध से कोई लेना देना नहीं है.

उदाहरण के लिए अलवर के थानागाज़ी गैंगरेप में भी फोन करते ही लड़के आ गये जिन्होंने बाद में कहा कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया है. रेवाड़ी गैंगरेप में भी ऐसा ही हुआ. यहां तक कि जम्मू कश्मीर के कठुआ गैंगरेप मामले में एक आरोपी यूपी में अपनी छुट्टियां बिताने आया था. वो यहां से वापस गया और उस रेप में शामिल हुआ. वो पुलिस में नौकरी करता था. उसकी शादी होने वाली थी. रेवाड़ी वाले मामले में अभियुक्त शादीशुदा था और उसकी पत्नी को बच्चा होनेवाला था. ये कमाल की बात है कि गैंगरेप में शामिल होने को तैयार लड़कों में से कोई एक दूसरे को मना नहीं करता.

कैसे मिलता है सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण

इस तरह के गैंग में एक मुख्य व्यक्ति का किसी स्थानीय नेता या ज़िला स्तर तक पहुंच होती है. अगर कोई आर्थिक रूप से कमज़ोर है भी तो उसे राजनीतिक शह मिली होती है. अगर राजनीतिक तौर पर संरक्षण नहीं मिला होता है तो विक्टिम ब्लेमिंग मानसिकता के चलते ये सामाजिक समर्थन जुटा लेने में कामयाब होते हैं. बिहार में गैंगरेप के मामलों पर रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकार सीटू तिवारी का कहना है, ‘अगर लड़की पेशाब या शौच करने अकेले गई है या फिर वो स्कूल-कॉलेज भी अकेले गई है तो इस तरह के गैंग की छेड़खानी या सामूहिक बलात्कार को स्थानीय लोग सबक सिखाने से जोड़कर देखते हैं. अगर कोई लड़की अकेले घर से बाहर निकली है तो छेड़खानी या सामूहिक बलात्कार को जायज ठहराया जाता है. इस तरह ये सामाजिक और नैतिक समर्थन जुटाते हैं.’

बिहार के ही बक्सर के रहने वाली बबलू इसपर कहते हैं, ‘एक तो ये लड़के मारपीट में आगे रहते हैं. इसलिए इस गैंग का इस्तेमाल आपसी रंजिशों में किया जाता है. इनका प्रभाव बढ़ता जाता है. ऐसा नहीं है कि इस तरह के गैंग के लड़के थ्रिल के लिए ऐसा करते है. कुछ तो इनमें बाल-बच्चे वाले भी होते हैं.’

अपने गांव का उदाहरण समझाते हुए वो आगे कहते हैं, ‘गांव के बीच में थोड़ी जगह खाली थी. वहां कुछ लड़कों ने झोपड़ी सी बना ली. अंदर चाय-पानी और मांस-मछली का पूरा जुगाड़. कई बार हुआ कि बाहर से निकल रही लड़की का हाथ पकड़कर खींच लिया. लड़की ज़्यादा चिल्लाती तो इधर-उधर ज़बरदस्ती छूकर छोड़ दिया जाता. लड़की ये कहते हुए निकल जाती कि तुम्हारी मम्मी को बताउंगी. मेरे गांव के आस-पास के गांवों में अगर ये झोपड़ीनुमा ठिकाने गांव के बीच में नहीं हैं तो गांव के बाहर हैं. गांव के बाहर वाली झोपड़ियों में होने वाले सामूहिक बलात्कार का शिकार निम्नवर्ग की महिलाओं को बनाया जाता है. उनपर दबाव बनाकर चुप कराना आसान है.’

गौरतलब है कि रेवाड़ी गैंगरेप के बाद गांव की निम्नवर्ग की कई महिलाओं ने अपने साथ हुए दुराचार के बारे में बताया था. लेकिन वो पुलिस रिपोर्ट नहीं कर सकतीं क्योंकि ज़्यादा हैरेस होने का खतरा बढ़ जाता है.

ग्रामीण इलाकों में ये एक रोज़ाना की बात बन गई है

राजस्थान के ही खाटू के पास एक गांव से आने वाले पीसी यादव बताते हैं, ‘वीडियो वायरल कराने वाला ट्रेंड पिछले पांच-छह सालों से बना है. ये गैंगरेप का कल्चर बहुत पुराना है. लगभग हर गांव की कहानी है. ये रेप ऑर्गेनाइज्ड़ होते हैं. कई केसों में पहले लड़की की पहचान की जाती है.’

यहां एक और चकित करनेवाली बात पता चली. गांवों में इस तरह के गैंग में अगर एक लड़के का अफेयर किसी लड़की से हो जाता है तो काफी संभावना है कि उस लड़की को पूरा गैंग अपनी हवस का शिकार बनायेगा. कई बार लड़की परिवार से छुपकर उस लड़के से मिलने आती है लेकिन सबको बताने का डर दिखाकर उसके साथ पांच-छह लोग बलात्कार करते हैं. अगर वीडियो बना लिया है तो आगे बलात्कार करने की संभावना बनी रहती है. ये तो वो केस हैं जो पुलिस या मीडिया तक नहीं पहुंच पाते. कुछ साल में वो लड़की ससुराल जा चुकी होती है.

अलवर में जहां गैंग रेप हुआ है उस इलाके (थानागाज़ी) की महिलाओं का कहना है कि इसलिए लड़कियों से किसी एक लड़के से भी बातचीत करने को मना किया जाता है.

क्या है स्थानीय पत्रकारों और पुलिस का रवैया

गैंगरेप बाकी अपराधों से अलग नेचर का है. अलवर गैंगरेप का एक आरोपी अपने ससुराल आया हुआ था. उसे बाकी लड़कों ने फोन पर बताया कि हमने एक बाइक पर एक लड़का-लड़की को जाते हुए देखा है. ये इतनी लाइन सुनकर आरोपी गैंगरेप करने के लिए तैयार हो जाता है. उसके पास सोचने के लिए सिर्फ चंद सेकेंड ही होते हैं. बाकी अपराधों में कोई चंद सेकेंड में किसी की हत्या करने पर राजी नहीं हो जाता है. इस तरह के गैंगरेप पर शोध करने की ज़्यादा ज़रूरत है.


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दिल्ली विश्वविद्यालय से सोशियोलॉजी में पीएचडी कर रही पारुल का कहना है, ‘ऐसे मामलों में आरोपियों को बचाने लगती है. आम जनता भी शुरुआती गुस्से के बाद आरोपियों के पक्ष में बोलने लगती है. चंद सेकेंड में जाने की बात को लोग समझते नहीं. ये मान के चलने लगते हैं कि लड़की ने ही बुलाया होगा. पुलिस भी सेंसिटिव नहीं है. राजस्थान के अलवर के लोग बता रहे थे कि पुलिस भी इन्हीं लड़कों की तरह की है. सिपाही ज़्यादा पढ़ा-लिखा या समझदार नहीं होता इन मामलों में, उसे जेंडर की ट्रेनिंग नहीं मिली है. आसानी से पितृसत्ता वाली हावी हो जाती है और अंततः आरोपी लड़की पर ही आरोप लगा दिए जाते हैं और समाज से लेकर पुलिस तर लड़की को ही कटघरे में खड़ी कर देती है. पुलिस शुरुआती जांच में ढुलमुल रवैया दिखाती है, नतीजन मेडिकल रिपोर्ट खराब हो जाती है. सामाजिक-राजनीतिक दबाव डालकर पुलिस से पीड़ित पक्ष पर ही दबाव बनाया जाने लगता है.’

क्या है आगे का रास्ता?

महिला मुद्दों पर सालों से काम कर रही हरियाणा की जगमति सांगवान का कहना है, ‘पंचायत का काम है गांव के इन ग्रुप्स पर नज़र रखना. इन लड़कों को कल्चरल चीजों में लगाना. खेलों में ध्यान लगाना. अब ज़्यादा लड़कियां घरों से बाहर निकली हैं तो ये घटनाएं ज़्यादा हो रही हैं. कोई मामला बड़ा होता है तो नेता आरोपियों को बचाते नज़र आते हैं. कानून व्यवस्था का एकदम मज़ाक बन गया है. पहले तो परिवार ही नहीं जाता पुलिस के पास. जब जाता है तो पुलिस शिकायत तक दर्ज नहीं करती. ये सामाजिक बुराई होने के साथ-साथ राजनीतिक भी है. इसलिए जब सरकार और समाज दोनों मिलकर गंभीर नहीं होते तब तक कुछ समाधान नहीं निकलेगा.’


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