Monday, 17 January, 2022
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बांध से कैसे नियंत्रित की जा सकती है बाढ़- 2013 की उत्तराखंड त्रासदी के बाद विशेषज्ञों ने क्या कहा था

एक्सपर्ट पैनल का गठन केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ के दौरान, पनबिजली परियोजनाओं के असर का मूल्यांकन करने के लिए किया था जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे.

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नई दिल्ली: एक एक्सपर्ट कमिटी ने, जिसने 2013 की उत्तराखंड बाढ़ का अध्ययन किया था- एक उन्नत पूर्वानुमान नेटवर्क स्थापित करने की ज़रूरत पर बल दिया था, जो पानी के बहाव का अनुमान लगा सके, ताकि गंगा पर बने बैराजों के खुलने और बंद करने का काम बेहतर ढंग से किया जा सके और अचानक आई अप्रत्याशित बाढ़ से हुए नुकसान को कम से कम किया जा सके.

इस एक्सपर्ट पैनल का गठन केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ के दौरान पनबिजली परियोजनाओं के असर का मूल्यांकन करने के लिए किया था जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे. पैनल का नेतृत्व पर्यावरणविद रवि चोपड़ा कर रहे थे जिन्होंने अप्रैल 2014 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी.

रविवार को राज्य में आई अचानक बाढ़ में कम से कम 11 लोगों की जान गई है, जबकि 200 से अधिक लोग गायब बताए जा रहे हैं. तबाही के सही कारणों का अभी पता लगाया जाना बाकी है लेकिन कुछ एक्सपर्ट्स ने सेटेलाइट तस्वीरों का हवाला देते हुए कहा है कि हो सकता है ये अचानक बाढ़, भूस्खलन की वजह से आई हो.


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2013 बाढ़ की रिपोर्ट में क्या कहा गया

15 से 17 जून 2013 के बीच, पूरे उत्तराखंड में लगातार बारिश हुई थी. गीले बर्फ पर बारिश गिरने से केदारनाथ मंदिर के कुछ ऊपर ही चोराबारी झील टूट गई थी जो ग्लेशियर्स से रुकी रहती है.

झील के अचानक टूटने, खड़ी चट्टानों की भौगोलिक स्थिति और निरंतर बारिश के कारण मंदाकिनी घाटी में विनाशकारी बाढ़ आ गई थी.

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विशेषज्ञों के विश्लेषण से पता चला कि अगर टिहरी बांध मौजूद न होता तो ऋषिकेश और हरिद्वार शहर- जो गंगा किनारे बसे हैं- पूरी तरह बाढ़ की चपेट में आ गए होते.

लेकिन रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि हालांकि टिहरी बांध ने बाढ़ के प्रवाह को कम किया लेकिन वो संयोगवश था, डिज़ाइन के कारण नहीं.

पैनल ने कहा कि टिहरी बांध, बाढ़ नियंत्रण का काम अंजाम देने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है. लेकिन, उसने आगे कहा कि बांध ने एक भूमिका निभाई, क्योंकि बाढ़ मध्य-जून में आई थी, सालाना मॉनसून सीज़न से कुछ दिन पहले, जब टिहरी का जलस्तर अपने सबसे निचले स्तर पर था.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि उच्च तीव्रता वाले मलबे ने विष्णुप्रयाग बैराज को बाधित कर दिया था जो विष्णुप्रयाग पनबिजली प्लांट से कुछ ऊपर ही स्थित, अलकनंदा की एक सहायक नदी खिरॉन गंगा से आ रहा था.

बड़े-बड़े पत्थरों और मलबे ने बैराज के गेट्स से होकर जाने वाला रास्ता रोक दिया था. इसकी वजह से नदी का पानी, बाएं किनारे पर बैराज से ऊपर आ गया और कंपनी के दफ्तर, हैलिपैड तथा राष्ट्रीय राजमार्ग का एक हिस्सा बहाता हुआ ले गया.

एक्सपर्ट पैनल ने कुछ शक ज़ाहिर किया कि क्या विष्णुप्रयाग परियोजना अधिकारी बैराज के गेट्स को ठीक तरह से खोल या बंद कर पाए थे.

रिपोर्ट में इस पर भी प्रकाश डाला गया कि आकस्मिक बाढ़ से हुए नुकसान में गाद एक अहम भूमिका अदा करती है. इसलिए, प्राकृतिक विपदाओं से होने वाले नुकसान को कम से कम करने में गाद को संभालना और बैराजों का संचालन करना बहुत अहम हो जाता है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘चरम घटनाओं के दौरान, बैराज के संचालन को लेकर काफी अस्पष्टता रहती है कि गेट्स को किस समय पूरी तरह खोलना चाहिए. किसी रियल टाइम बाढ़ पूर्वानुमान नेटवर्क या ऊपर की ओर बने स्वचालित मौसम स्टेशन के न होने और भारी बाढ़ के आने की सूरत में बैराज के काफी हद तक बाधित होने की संभावना बनी रहती है.

टिहरी बांध की मिसाल देते हुए एक्सपर्ट्स ने कहा कि एक ‘रियल टाइम प्रवाह पूर्वानुमान नेटवर्क’ स्थापित करने की ज़रूरत है ताकि मौसम संबंधी डेटा का इस्तेमाल करके 12 से 18 घंटे पहले ही पूर्वानुमान लगाया जा सके कि टिहरी जलाशय में कितना पानी दाख़िल होने वाला है.

इस जानकारी के साथ पानी के प्रवाह को सुरक्षापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है और टिहरी बांध के ज़रिए बाढ़ को संयमित किया जा सकता है.

रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि नदी के तल से निकाली गई कीचड़ भी, जिसे किनारे पर डाल दिया जाता है, एक अहम रोल निभाती है. रिपोर्ट में सिफारिश की गई कि उत्तराखंड में कीचड़ निस्तारण और पुनर्वास में भी सुधार किया जाए.

टीम ने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि यह अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है कि दो लगातार पनबिजली घरों के बीच, कम से कम कितनी दूरी रहनी चाहिए और इस दूरी को सहमति से तय किए गए मौजूदा एक किलोमीटर से बढ़ाए जाने की ज़रूरत है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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