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Sunday, 13 September, 2026
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कैसे टैक्स नोटिस के खिलाफ चंडीगढ़ की वकील ने लड़ी लड़ाई, HC ने IT एक्ट की धारा 147A रद्द की

हाई कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में लगभग 700 करदाताओं को भेजे गए टैक्स नोटिस रद्द कर दिए. यह कोर्ट द्वारा निपटाए गए टैक्स से जुड़े सबसे बड़े मामलों के समूहों में से एक है.

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गुरुग्राम: यह मामला एक टेक्स्ट मैसेज से शुरू हुआ था. मार्च 2024 में चंडीगढ़ की वकील ज्योति सरीन को एक SMS मिला, जिसमें बताया गया था कि उनके खिलाफ इनकम टैक्स की कार्रवाई शुरू की गई है. उन्हें पता ही नहीं था कि ऐसा क्यों किया गया.

अब इस नोटिस के खिलाफ उनकी ढाई साल लंबी लड़ाई खत्म हो गई है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इनकम टैक्स एक्ट की एक धारा को रद्द कर दिया है और पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में करीब 700 करदाताओं को भेजे गए टैक्स नोटिस भी रद्द कर दिए हैं. यह इस अदालत के सामने आए सबसे बड़े टैक्स मुकदमों के समूहों में से एक था.

जस्टिस दीपक सिबल और जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की डिवीजन बेंच ने 10 सितंबर के फैसले में इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 147A को असंवैधानिक घोषित कर दिया. धारा 147A में कहा गया था कि एक्ट की धारा 148 और 148A के तहत “Assessing Officer” (आकलन अधिकारी), यानी संबंधित क्षेत्र का अधिकारी, दोबारा टैक्स जांच के नोटिस जारी करने का सही अधिकारी होगा, न कि फेसलेस असेसमेंट सिस्टम.

बेंच ने सरीन और दूसरे याचिकाकर्ताओं को धारा 148 के तहत भेजे गए दोबारा टैक्स जांच के नोटिस रद्द कर दिए. कोर्ट ने कहा कि इन नोटिस में उस फेसलेस और रैंडम सिस्टम को दरकिनार किया गया था, जिसे टैक्स विभाग ने खुद लागू किया था.

मामला कैसे शुरू हुआ

सरीन ने सितंबर 2020 में असेसमेंट ईयर 2020-21 के लिए अपना टैक्स रिटर्न दाखिल किया था. मार्च 2024 में उन्होंने इनकम टैक्स बिजनेस एप्लीकेशन पोर्टल पर एक नोटिस देखा, जिसमें उनसे दोबारा रिटर्न दाखिल करने को कहा गया था.

नोटिस में कहा गया था कि यह कार्रवाई एक्ट की धारा 132 के तहत उनसे जुड़े ठिकानों पर की गई तलाशी के बाद शुरू हुई थी. लेकिन उन्हें कभी नहीं बताया गया कि तलाशी कहां की गई थी या उनके टैक्स मामले की दोबारा जांच क्यों की जा रही थी.

नोटिस में यह भी कहा गया था कि चंडीगढ़-I के प्रधान आयकर आयुक्त से पहले मंजूरी ली गई थी. लेकिन सरीन ने कहा कि उन्हें ऐसी कोई मंजूरी कभी दिखाई नहीं गई.

उन्होंने इस नोटिस को चुनौती दी. जुलाई 2024 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की एक दूसरी डिवीजन बेंच ने यह नोटिस रद्द कर दिया. इसकी वजह यह थी कि उनका नोटिस उनके संबंधित Assessing Officer ने जारी किया था, न कि उस फेसलेस और रैंडम सिस्टम के जरिए, जिसे टैक्स विभाग ने मार्च 2022 में इनकम टैक्स एक्ट की धारा 151A के तहत लागू करने की जानकारी दी थी.

टैक्स असेसमेंट और दोबारा असेसमेंट को “फेसलेस” सिस्टम में बदलने की व्यवस्था 2019 में लागू की गई थी. इसमें मामलों को एक केंद्रीय सेल के जरिए रैंडम तरीके से अधिकारियों को दिया जाता है. अधिकारी और टैक्स देने वाले व्यक्ति के बीच सीधा संपर्क नहीं होता, ताकि अधिकारी के पास मनमानी करने की गुंजाइश और संभावित गलत इस्तेमाल कम हो.

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 147A क्या कहती है

धारा 147A छोटी सी धारा है, लेकिन इसमें एक बहुत व्यापक “non-obstante clause” (गैर-बाधा खंड) है. यह एक कानूनी शब्द है, जिसका मतलब है कि कहीं और कुछ भी कहा गया हो, यहां तक कि किसी अदालत का फैसला भी हो, फिर भी यह प्रावधान लागू रहेगा.

इसमें कहा गया है कि एक्ट की धारा 148 और 148A के लिए “Assessing Officer” का मतलब हमेशा ऐसा अधिकारी रहा है जो फेसलेस National Assessment Centre (राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र) का हिस्सा नहीं है.

इसका मतलब यह हुआ कि 1 अप्रैल 2021 से पिछली तारीख से लागू मानते हुए, संबंधित क्षेत्र के अधिकारी, न कि फेसलेस सिस्टम, हमेशा से दोबारा टैक्स जांच के नोटिस जारी करने के सही अधिकारी थे.

इसे वित्त विधेयक 2026 के जरिए जोड़ा गया था. सरकार ने कहा था कि इसका मकसद भ्रम की स्थिति को खत्म करना था, क्योंकि नया इनकम टैक्स एक्ट, 2025, इसी साल 1 अप्रैल से लागू होने वाला था.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह असली कानून को स्पष्ट करने की कोशिश नहीं थी. बल्कि इसका मकसद उन कई हाई कोर्ट के फैसलों को बेअसर करना था, जो इनकम टैक्स विभाग के खिलाफ गए थे. इन फैसलों को बदलने के लिए असली कानून, यानी धारा 151A और फेसलेस असेसमेंट स्कीम, में कोई बदलाव नहीं किया गया था.

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 151A केंद्र सरकार को असेसमेंट और दोबारा असेसमेंट के लिए फेसलेस स्कीम लागू करने की अनुमति देती है. आयकर अधिकारियों की फेसलेस क्षेत्राधिकार योजना मार्च 2022 में लागू हुई थी.

पहले के फैसले

गुरुवार के फैसले में कोर्ट की सोच इस बात पर काफी हद तक आधारित थी कि दूसरे हाई कोर्ट पहले इसी मुद्दे को किस तरह समझ चुके हैं.

कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के हेक्सावेयर टेक्नोलॉजीज लिमिटेड और कैरोस प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड मामलों में दिए गए पोस्ट से सहमति व्यक्त की. उसने अपने ही पहले के जतिंदर सिंह भंगू और जसजीत सिंह मामलों के पोस्ट से भी सहमति व्यक्त की.

इसके अलावा राजस्थान, मद्रास, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गौहाटी हाई कोर्ट के फैसलों से भी सहमति जताई गई. इन सभी अदालतों ने कहा था कि धारा 148 के नोटिस केवल फेसलेस और रैंडम सिस्टम के जरिए ही जारी किए जा सकते हैं.

डिवीजन बेंच ने कहा कि वह दिल्ली, गुजरात और कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसलों से सम्मानपूर्वक असहमत है. इन अदालतों ने इसके उलट राय दी थी.

संवैधानिक सवाल

मुख्य संवैधानिक सवाल पर बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों पर भरोसा किया, जो शक्तियों के बंटवारे यानी separation of powers से जुड़े थे.

इनमें तमिलनाडु राज्य बनाम केरल राज्य (2014) और NHPC लिमिटेड बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2023) के फैसले शामिल थे.

इन फैसलों में कहा गया था कि संसद किसी ऐसे कानून को फिर से वैध बनाने की कोशिश कर सकती है, जिसे अदालत ने रद्द किया हो, लेकिन इसके लिए संसद को उस असली कमी को दूर करना होगा, जिसे अदालत ने पहचाना था. संसद सिर्फ यह कहकर अदालत के फैसले को गलत नहीं बता सकती कि अदालत गलत थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कानून बनाकर किसी अंतिम अदालत के फैसले को सिर्फ इसलिए हटाया जाता है, क्योंकि संसद उससे सहमत नहीं है, और कानून की असली कमी को ठीक नहीं किया जाता, तो यह संसद के न्यायपालिका की भूमिका में आने जैसा होगा. केवल इसी आधार पर ऐसा कानून रद्द किया जा सकता है.

सरकार की दलील और कोर्ट में वह क्यों नहीं चली

भारत सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने दलील दी कि धारा 147A जरूरी थी ताकि स्थिति साफ हो सके और मुकदमों को खत्म किया जा सके.

उन्होंने यह भी कहा कि 2014 की दो अधिसूचनाओं ने संबंधित क्षेत्र के अधिकारियों को ऐसे नोटिस संभालने की ताकत दी थी और यह ताकत कभी वापस नहीं ली गई थी.

लेकिन बेंच ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया.

कोर्ट ने कहा कि धारा 147A ने धारा 151A या 2022 की फेसलेस स्कीम में कोई कमी दूर नहीं की. इसने सिर्फ उन अदालत के फैसलों को दरकिनार किया, जो इन्हीं प्रावधानों के आधार पर दिए गए थे. कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने वाली संस्था ऐसा नहीं कर सकती.

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि इसी मुद्दे पर अलग-अलग अपीलें पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित थीं, जब संसद ने धारा 147A लागू की. कोर्ट को यह समय महत्वपूर्ण लगा.

बेंच ने यह भी कहा कि अगर धारा 147A को वैध मान भी लिया जाए, तब भी ये नोटिस रद्द करने पड़ेंगे. इसकी वजह यह है कि ये नोटिस संबंधित क्षेत्र के अधिकारियों ने जारी किए थे, जबकि 2022 की स्कीम के मुताबिक उन्हें रैंडम और फेसलेस सिस्टम के जरिए जारी किया जाना चाहिए था.

सीनियर एडवोकेट डॉ. संजय बंसल ने इस मामले और इससे जुड़े मामलों में सरीन और दूसरे याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी की.

इस फैसले के बाद करीब 695 जुड़े हुए मामलों में याचिका दायर करने वाले करदाताओं के धारा 148 के नोटिस रद्द हो गए हैं. ये याचिकाएं 2023, 2024, 2025 और 2026 में दायर की गई थीं.

टैक्स विभाग को इन मामलों की दोबारा जांच करने से रोका नहीं गया है. लेकिन अगर विभाग ऐसा करता है, तो उसे धारा 151A के तहत जरूरी फेसलेस सिस्टम के जरिए ही यह कार्रवाई करनी होगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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