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Tuesday, 6 October, 2026
होमदेशहिंदुत्व ‘इन्फ्लुएंसर’ स्वतंत्र भारद्वाज को जंतर-मंतर मारपीट मामले में रेगुलर जमानत

हिंदुत्व ‘इन्फ्लुएंसर’ स्वतंत्र भारद्वाज को जंतर-मंतर मारपीट मामले में रेगुलर जमानत

भारद्वाज को जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान दलित छात्र-कार्यकर्ता के पिता के साथ कथित मारपीट के मामले में 5 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था. पिछले महीने उसे अंतरिम जमानत दी गई थी.

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नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को खुद को ‘हिंदुत्व इन्फ्लुएंसर’ बताने वाले स्वतंत्र भारद्वाज को जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान एक दलित छात्र-कार्यकर्ता के पिता के साथ कथित मारपीट के मामले में रेगुलर जमानत दे दी.

पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ने यह राहत दी. अदालत ने कहा कि 15 सितंबर को तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत मिलने के बाद भारद्वाज ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया.

दिल्ली में 23 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान कथित मारपीट के मामले में भारद्वाज को 5 सितंबर को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से गिरफ्तार किया गया था. अदालत से अंतरिम राहत मिलने से पहले वह न्यायिक हिरासत में था.

मामला शुरू में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की उन धाराओं के तहत दर्ज किया गया था, जो चोट पहुंचाने और गलत तरीके से रोकने से जुड़ी हैं. उस समय भारद्वाज को गिरफ्तार नहीं किया गया था और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत नोटिस मिलने के बाद वह जांच में शामिल हुआ था.

बाद में यह मामला अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत भी आया. शिकायतकर्ता ने अपने एक अतिरिक्त बयान में बताया कि वह अनुसूचित जाति से हैं और आरोप लगाया कि उनके और उनकी नाबालिग बेटी के खिलाफ जाति को लेकर टिप्पणियां की गई थीं. इसके बाद एससी/एसटी अधिनियम की संबंधित धाराएं और बीएनएस की एक और धारा जोड़ी गईं. इसके बाद भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया.

एक दूसरी एफआईआर में प्रदर्शनकारी की शिकायत के आधार पर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 की धाराएं और आपराधिक धमकी की धाराएं जोड़ी गईं. प्रदर्शनकारी ने शिकायत में आरोप लगाया था कि उसे भारद्वाज के समर्थकों की ओर से बलात्कार की धमकियां मिली थीं.

जांच में कमियां

अंतरिम जमानत देते समय अदालत ने जांच के कई पहलुओं पर सवाल उठाए थे और जांच अधिकारी को स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था.

जिन मुद्दों पर सवाल उठाए गए, उनमें प्रदर्शन वाली जगह की निगरानी का फुटेज, दिल्ली पुलिस के कर्मचारियों की ओर से बनाई गई रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और लोकेशन डेटा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से मिली सामग्री और गवाहों के बयान शामिल थे. अदालत ने पुलिस को मामले में इस्तेमाल किए गए वीडियो और एक पॉडकास्ट की असलियत की भी जांच करने का निर्देश दिया था. जहां जरूरी हो, वहां फॉरेंसिक जांच कराने को भी कहा गया था.

अंतरिम जमानत के आदेश में भारद्वाज पर कड़ी पाबंदियां लगाई गई थीं. उसे मामले, अपने बचाव या शिकायतकर्ता और उसके परिवार जुड़ा कोई सार्वजनिक बयान देने या शेयर करने, सोशल मीडिया पोस्ट करने, इंटरव्यू देने, पॉडकास्ट करने या ऐसी कोई दूसरी सामग्री जारी करने से रोक दिया गया था.

भारद्वाज को शिकायतकर्ता, उनकी नाबालिग बेटी, परिवार के सदस्यों या अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क करने या उन्हें धमकाने या प्रभावित करने की कोशिश करने से भी मना किया गया था.

पहले राहत देते समय अदालत ने कहा था कि शिकायतकर्ता की सुरक्षा और आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. अदालत ने कहा था कि जून की घटना से जुड़े आरोपों का फैसला सार्वजनिक बयानों या सोशल मीडिया के बजाय सबूतों के आधार पर अदालत में किया जाना चाहिए.

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी ज़िक्र किया था, जिसमें हत्या के एक आरोपी पर रिहाई के बाद विजय जुलूस निकालकर जश्न मनाने का आरोप था. अदालत ने कहा था, “जमानत अदालत के भरोसे की अभिव्यक्ति है और इसे दिखाने के लिए ट्रॉफी नहीं माना जाना चाहिए.”

मंगलवार के आदेश के बाद भारद्वाज अब रेगुलर जमानत पर हिरासत से बाहर रहेगा. विस्तृत आदेश में अदालत के फैसले की वजह और जमानत से जुड़ी शर्तें साफ होने की उम्मीद है.

आदित्य इदरा दिप्रिंट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल दिप्रिंट में इंटर्न हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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