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Monday, 15 July, 2024
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हिंदू राइट प्रेस ने कहा—सभी अंतर्धार्मिक विवाह लव जिहाद नहीं, लेकिन ‘कठोर तथ्यों’ को नकार नहीं सकते

हिंदुत्व समर्थक मीडिया ने पिछले कुछ हफ्तों में विभिन्न खबरों और सामयिक मुद्दों को कैसे कवर किया और उन पर क्या संपादकीय रुख अपनाया, इसी पर दिप्रिंट का राउंड-अप.

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने विवादास्पद फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ के बचाव में कहा, हर अंतरधार्मिक विवाह ‘लव जिहाद’ का मामला नहीं हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसा आंदोलन मौजूद नहीं है. फिल्म केरल की महिलाओं की दुर्दशा को उजागर करने का दावा करती है, जिनका इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए कथित तौर पर ब्रेनवॉश किया गया था.

ऑर्गनाइज़र ने अपने संपादकीय में कहा है कि फिल्म “व्यवस्थित ग्रूमिंग, धोखे से धर्मांतरण और मानव तस्करी” की समस्या पर प्रकाश डालती है.

इसने कहा, “प्रेम कोई अपराध नहीं है और अंतर-विश्वास या अंतर-जातीय विवाह सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दे सकता है.” आगे कहा गया है, लेकिन इसके अपवाद भी हैं.

संपादकीय में पूछा, “क्या यह धोखे से किया जा सकता है, जहां एक आदमी अपनी धार्मिक पहचान या वैवाहिक स्थिति को छुपाता है? क्या ऐसी शादियां सामान्य हैं अगर लड़कियों को जबरन धर्मांतरित किया जाता है और कुछ इस्लामिक आतंकवादी संगठनों में शामिल होने के लिए तस्करी की जाती है?”

संपादकीय में आगे दावा किया गया है कि केरल में “धर्म-आधारित जनसांख्यिकीय असंतुलन और कट्टरता” एक “सच्ची वास्तविकता” है, जो कुछ “कठोर तथ्यों” को बयां करती है.

इसने कहा, “स्वतंत्रता-पूर्व काल में कांग्रेस ने खिलाफत के नाम पर हिंदुओं के इस्लामी नरसंहार पर लीपापोती करने की कोशिश की. कम्युनिस्टों ने इसे वर्ग संघर्ष के रूप में और रंग दिया. तब से, मालाबार इस्लामी कट्टरता का अड्डा बन गया है. न तो फिल्म और न ही सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर डालने वाले मुद्दे को उठाना केरल राज्य के खिलाफ है.”

हालांकि, ‘द केरला स्टोरी’ को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई भाजपा शासित राज्यों में कर-मुक्त घोषित किया गया है और यहां तक कि एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसका ज़िक्र किया है, इस फिल्म को झूठी सूचनाओं के प्रचार और प्रोपगेंडा के लिए आलोचना का भी सामना करना पड़ा है.

हिंदू दक्षिणपंथी लेखकों और स्तंभकारों द्वारा कवर किए गए अन्य विषयों में कर्नाटक में भाजपा की चुनावी संभावनाएं, कांग्रेस पार्टी का कथित “हिंदू विरोधी” रुख, मणिपुर हिंसा और मुफ्त उपहार और राज्य ऋण के बीच संबंध शामिल हैं.


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कर्नाटक बजरंग दल विवाद

कर्नाटक चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने वादा किया था कि अगर वो सत्ता में आई, तो हिंदुत्व युवा संगठन बजरंग दल और अन्य संगठनों पर प्रतिबंध लगाएगी जो कथित तौर पर “नफरत को बढ़ावा देते हैं”. इसके तुरंत बाद, पार्टी ने राज्य भर में बजरंग (हनुमान) मंदिरों के निर्माण और नवीनीकरण का वादा किया.

आरएसएस के हिंदी मुखपत्र पाञ्चजन्य के अनुसार, आरएसएस और संबद्ध बजरंग दल की पार्टी की “गहरी नफरत” के बावजूद “हिंदू चेतना की जीत” का संकेत देते हैं.

संपादकीय में कहा गया है, “जबरदस्त तुष्टिकरण” में लगी कांग्रेस और टाडा और पोटा जैसे आतंकवाद विरोधी कानूनों को खत्म करने वाली कांग्रेस अब “बजरंग बली का मंदिर बनाने का वादा करने के लिए मजबूर है, तो इसके पीछे जरूर कुछ है”.

लेख में आरएसएस के प्रति कांग्रेस की शत्रुता पर भी खेद व्यक्त किया गया और दावा किया था कि यही कारण है कि वह कर्नाटक में बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाना चाहती थी.

संपादकीय में कहा, “(कांग्रेस के) इस नफरत भरे प्रचार की जड़ यह है कि बजरंग दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा है. कांग्रेस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति गहरी नफरत रखती है, जो हर आपात स्थिति में समाज और राष्ट्र के साथ खड़ी रहती है और राष्ट्र के उत्थान और निर्माण के लिए काम करती है. लोकतंत्र इस घृणा के परिणामों के बारे में सबक सिखाने में सक्षम है और (कांग्रेस) को यह सबक सिखाया जाना चाहिए.”


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मणिपुर हिंसा: हिंदू ‘आसान निशाना’

3 मई से पूरे मणिपुर में फैली जातीय हिंसा पर ऑर्गनाइज़र के एक लेख में दावा किया गया है कि आज़ादी से पहले से ही प्रमुख मैतेई समुदाय, ज्यादातर हिंदू, मिशनरियों सहित विभिन्न ताकतों के लिए राज्य में एक आसान लक्ष्य रहे हैं.

हिंसा, जिसमें कम से कम 60 लोग मारे गए और हज़ारों लोग विस्थापित हुए, लेख में राज्य के अल्पसंख्यक आदिवासी समूहों को सीधे तौर पर दोषी ठहराया गया, जो मुख्य रूप से ईसाई धर्म का पालन करते हैं और एक रैली जो उन्होंने अपने अधिकारों के लिए सुरक्षा की मांग के लिए पिछले हफ्ते निकाली थी.

लेख में कहा गया है, “संघर्ष का कारण वह रैली है जो संभावित सांप्रदायिक हिंसा की आशंका में जिला प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद आयोजित की गई थी.”

इसने आगे कहा, “तथाकथित शांति रैली (एटीएसयूएम का ट्राइबल सॉलिडेरिटी मार्च) के दिन रैली करने वाले हिंसक हो गए और चार फॉरेस्ट कार्यालयों को जला दिया. उन्होंने वन कार्यालयों को निशाना क्यों बनाया? इसका उत्तर बहुत आसान है; वे वनों पर सरकारी नियंत्रण नहीं चाहते हैं. जंगलों और उनके संसाधनों के रूप में यह उन्हें बड़े पैमाने पर अवैध अफीम के बागानों को लगाने से रोकेगा.”

लेख में आरोप लगाया गया है कि उग्रवादी समूहों ने राज्य में बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की नशीले पदार्थों पर कार्रवाई, म्यांमार से अनिर्दिष्ट प्रवासियों की जांच करने के कदमों और अवैध चर्चों के विध्वंस की प्रतिक्रिया के रूप में हिंसा का नेतृत्व किया था.

इसके विपरीत, भाजपा के आठ सहित 10 कुकी विधायकों ने 12 मई को एक प्रेस बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि हिंसा “बहुसंख्यक मैतेई समुदाय द्वारा की गई थी और मणिपुर की मौजूदा सरकार द्वारा चिन-कुकी-मिज़ो-ज़ोमी के खिलाफ मौन का समर्थन किया गया था.”


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कर्नाटक में ‘मोदी मैजिक’

दक्षिणपंथी पत्रकार हरि शंकर व्यास ने हिंदी के दैनिक अखबार नया इंडिया में अपने कॉलम में तर्क दिया कि कर्नाटक चुनाव मोदी और उनके “जादू” के लिए एक परीक्षा है.

उन्होंने लिखा कि अगर मोदी की “कड़ी मेहनत” के बावजूद बीजेपी नहीं जीती, तो इसके कुछ घातक परिणाम हो सकते हैं.

व्यास ने तर्क दिया, “सबसे पहले दक्षिण भारत में बीजेपी की एंट्री बंद की जाएगी. दूसरे, क्षेत्रीय क्षत्रपों को ताकत मिलेगी. स्थानीय नेताओं पर भाजपा आलाकमान की निर्भरता बढ़ेगी. बीजेपी को उन्हें दरकिनार करने और मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का फैसला करने से पहले दस बार सोचना होगा.”

व्यास ने जोर देकर कहा कि अगर भाजपा चुनाव हार जाती है, तो मीडिया और पार्टी खुद प्रधानमंत्री मोदी को दोष देने से परहेज़ करेगी. हालांकि, वे मोदी के कथित जादू को जीती गई सीटों का श्रेय देंगे.

इस बीच, दक्षिणपंथी झुकाव वाले जेएनयू के प्रोफेसर मकरंद परांजपे ने न्यूज़18 में लिखे एक ओपिनियन में तर्क दिया कि उन्हें क्यों लगता है कि बीजेपी कर्नाटक में सत्ता बरकरार रखेगी.

परांजपे ने स्वीकार किया कि “डबल इंजन सरकार” उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई होगी, लेकिन कांग्रेस की “तुष्टीकरण की राजनीति”, विशेष रूप से बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का वादा, पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. परांजपे ने कहा कि जिस किसी को भी हिंदू विरोधी माना जाता है, उसके पास भारत में जीतने का मौका नहीं है.

उनके अनुसार, कर्नाटक में भाजपा के सत्ता में बने रहने के लिए “दो संभावित परिदृश्य” हैं.

उन्होंने लिखा, “पहली और सबसे अलग बात यह है कि वो (भाजपा) अपने दम पर जीतेगी. त्रिमूर्ति मोदी-शाह-नड्डा द्वारा अंतिम धक्का कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों को फिनिश लाइन से आगे धकेलने के लिए प्रेरित करेगा. यदि उन्हें 113 सीटें या इससे अधिक मिलती हैं, तो वे खुशी-खुशी एक नए मुख्यमंत्री, शायद वोक्कालिगा को अपने कर्णधार के रूप में स्थापित करेंगे. प्रशासन को कड़ा किया जाएगा, भ्रष्टाचार को कम किया जाएगा और पार्टी 2024 के आम चुनावों की तैयारी में अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा को मजबूत करेगी.”

दूसरा परिदृश्य तब होगा जब पार्टी आधे रास्ते से आगे नहीं बढ़ पाएगी, उन्होंने कहा, “अगर यह केवल कुछ सीटों की बात है, तो पार्टी बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में विधायकों को जीतने में सरकार सक्षम है.”

एसजेएम कर्ज में डूबा हुआ है

आरएसएस से संबद्ध स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) के सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने इस सोमवार को अपनी वेबसाइट पर पोस्ट किए गए एक लेख में इस बात पर प्रकाश डाला कि “मुफ्त उपहारों” पर अधिक खर्च करने वाले राज्यों पर भारी कर्ज का बोझ है.

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, महाजन ने लिखा, “पंजाब में सरकार की उधारी 9.6 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में क्रमशः 6.1 और 6.0 प्रतिशत है. इसके अलावा हरियाणा में यह 5.3 फीसदी और केरल में 5.1 फीसदी है.”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जबकि केंद्र सरकार के घाटे और देनदारियां पारदर्शी हैं और गलत तरीके से पेश किए जाने की संभावना नहीं है, वही राज्य सरकारों की देनदारियों के लिए नहीं कहा जा सकता है.

उन्होंने लिखा, “गौरतलब है कि कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) के आकलन के मुताबिक, आम कर्ज उन राज्यों में ज्यादा है, जहां मुफ्त की योजनाओं पर ज्यादा खर्च किया जा रहा है. इसमें पंजाब और आंध्र प्रदेश शीर्ष पर हैं जहां कुल राजस्व का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं पर खर्च किया जाता है. आंध्र प्रदेश के अलावा, तमिलनाडु एक और दक्षिणी राज्य है जो मुफ्त योजनाओं पर अधिक खर्च करता है.”

उन्होंने कहा, “हालांकि, दिल्ली मुफ्त योजनाओं में बहुत आगे है, लेकिन इस कर्ज के कारण दिल्ली नहीं बढ़ती है क्योंकि राज्य का प्रति व्यक्ति राजस्व राष्ट्रीय व्यवस्था से लगभग दोगुना है.”

(संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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